यूरोपीय देशों के व्यंजनों में आलू का वही स्थान है, जो भारतीय व्यंजनों में चावल का है. यूरोप की जलवायु चावल की खेती के बिल्कुल उपयुक्त नहीं है, जबकि आलू का वहां अंबार लगा रहता है. इसी कारण यूरोपवासी पांच-छह दशक पहले तक चावल से उसी तरह अपरिचित थे, जिस तरह आज भी आम या अमरूद से शायद ही परिचित हैं. लेकिन, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की इसी अवधि में आयी खुशहाली यूरोपवासियों के रहन-सहन में जो भारी परिवर्तन लाई है उनमें देश-विदेश के व्यंजनों के प्रति उनका बढ़ता हुआ लगाव संभवतः सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाला है.

यूरोप के छोटे-बड़े शहरों में ही नहीं, दूर-दराज़ के गांवों तक में भी इस बीच चीनी रेस्त्रां खुल गये हैं, गांवों में न सही, पर शहरों में तुर्की, अरबी, थाई या भारतीय रेस्त्रां भी आसानी से मिल जायेंगे. विदेशी रेस्त्राओं की बढ़ती हुई लोकप्रियता का ही परिणाम है कि उनके कारण चावल की, और चावलों में भी लंबे दानों वाले सुगंधित बासमती चावल की मांग तेज़ी से बढ़ी है. इससे बासमती चावल के भारतीय निर्यातकों को सबसे अधिक लाभ पहुंचा है.

भारत बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक

दुनिया के 70 प्रतिशत बासमती चावल की उपज भारत में ही होती है. भारत के बाद पाकिस्तान का नंबर आता है. भारत ही यूरोपीय संघ और शेष विश्व में बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है. 2015-16 में भारत ने 22,727 करोड़ रुपये मूल्य के बराबर 40,05,000 टन बासमती चावल का निर्यात किया जिसमें से 1,930 करोड़ रुपये (तीन अरब डॉलर) मूल्य के बराबर 3,80,000 टन यूरोपीय संघ के देशों में गया.

लेकिन यह यूरोपीय बाज़ार, नववर्ष की पहली सुबह के साथ ही, भारत के हाथ से यदि हमेशा के लिए नहीं, तब भी कम से कम 2019 तक के लिए छिन जायेगा. इससे पाकिस्तान की बांछें खिल जायेंगी, क्योंकि उसके बासमती चावल की मांग बहुत बढ़ जायेगी.

यूरोपीय संघ भारत के लिए इस अपूर्व आघात का बहाना बासमती की ‘पीबी1’ और ‘पूसा 1410’ नाम की क़िस्मों की एक ऐसी बीमारी को बना रहा है, जिसकी रोकथाम के लिए भारत में इस्तेमाल होने वाली दवा पाकिस्तान की ‘सुपर’ बासमती क़िस्म के लिए या तो इस्तेमाल नहीं होती या वहां उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ती. अंग्रेज़ी में “ब्लास्ट” कहलाने वाली इस बीमारी को हिंदी में झुलसा रोग, झोंका रोग या प्रध्वंस भी कहा जाता है. धान का यह अत्यंत विनाशकारी रोग ‘पिरीकुलेरिया ओराइजी’ नामक कवक (फफूंद) द्वारा फैलता है. धान की पत्तियों और उनके निचले भागों पर छोटे और नीले धब्बे बन जाते हैं, जो बढ़कर नाव के आकार की तरह हो जाते हैं. इस रोग के लक्षण सर्वप्रथम पत्तियों पर दिखाई देते है, लेकिन इसका आक्रमण जडों को छोड़ कर पूरे पौधे पर भी होता है.

फफूंद नाशक बला बन गया

झुलसा रोग की रोकथाम के लिए भारत में ‘ट्राइसाइक्लाज़ोल’ नामक जिस फफूंद नाशक (फंगीसाइड) का सबसे अधिक उपयोग किया जाता है, उसे अमेरिकी कंपनी ‘डॉव केमिकल्स’ बनाती है. यह दवा सस्ती, इस्तेमाल में सरल और बहुत कारगर मानी जाती है. पर, उसकी एक बहुत ही क्षीण मात्रा बासमती चावल के दानों के भीतर पहुंच कर अवशेष के रूप में रह जाती है. अब तक नियम यह था कि दानों में यह अवशेष 1.0 पीपीएम (पार्टिकल पर मिलियन / प्रति 10 लाख पर 1 कण) से अधिक नहीं होना चाहिये.

तीन साल पहले यूरोपीय संघ के कार्यकारी आयोग ने तय किया कि 1 जनवरी 2018 से यह अधिकतम सीमा 0.01 पीपीएम हो जायेगी, जो अब तक की सीमा से सौ गुना कम (प्रति 10 करोड़ सामान्य कणों पर 1 कण) है. तभी से बासमती चावल के भारतीय निर्यातक और सरकारी अधिकारी यूरोपीय संघ के अधिकारियों को समझा-बुझा कर मना रहे थे कि ‘ट्राइसाइक्लाज़ोल’ का कोई बेहतर विकल्प पाने के लिए उन्हें कम से कम एक साल का और समय दिया जाये. भारत सरकार के ‘कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण’ (एपीईडीए) के अधिकारी तथा ‘अखिल भारतीय चावल निर्यातक संघ’ (एआइआरईए) के पदाधिकारी इस साल जुलाई में एक बार फिर ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के वरिष्ठ अधिकारियों से मिले, पर उन्हें मना नहीं सके.

भारत को कोई रियायत नहीं

सूत्रों का कहना है कि यूरोपीय आयोग ने कोई रियायत देने से साफ़ मना कर दिया. भारत से कहा गया कि अन्य देशों की तरह उसे भी नये मानदंड को स्वीकार करना होगा. इसके बाद भारत सरकार ने भी, अगस्त में, बासमती चावल के निर्यातकों से कहा कि वे यूरोपीय संघ के नये मानदंड का पालन करें और सरकारी मान्यता प्राप्त किसी भारतीय प्रयोगशाला से अपने चावल के विधिवत परीक्षण द्वारा इस मानदंड की पुष्टि का प्रमाणपत्र प्रप्त कर, 1 नवंबर 2017 से पहले, अपना फिर से पंजीकरण करायें. इस तारीख़ के बाद नये सिरे से पंजीकृत केवल ऐसे निर्यातक ही यूरोपीय संघ की दिशा में अपने चावल का निर्यात कर सकते हैं, जो संघ के नये मानदंड को पूरा करेंगे.

यूरोप में प्रतिकूल जलवायु के कारण चावल की खेती नहीं होती. तब भी, इस बीच इटली, स्पेन और पुर्तगाल तीन ऐसे अपवाद हैं, जहां कुछ वर्षों से बासमती चावल की एक जापानी क़िस्म जापोनीका की सीमित पैमाने पर खेती होने लगी है. तीनों देशों की सम्मिलित उपज क़रीब दो लाख टन वार्षिक है. इन देशों के बासमती उत्पादक भी ‘डॉव केमिकल्स’ के ‘ट्राइसाइक्लाज़ोल’ का ही प्रयोग करते हैं. वे भी यूरोपीय आयोग के नये मानदंड का उसी तरह विरोध करते रहे हैं, जिस तरह भारतीय उत्पादक और निर्यातक कर रहे हैं. पर, उनकी भी नहीं सुनी गयी.

फफूंद नाशक से कैंसर होने का संदेह

यूरोपीय आयोग को संदेह है कि चावल के दानों में रह गये ‘ट्राइसाइक्लाज़ोल’ के अवशेष की अब तक की छूट वाली मात्रा से कैंसर होने का ख़तरा रहता है. सौ गुना कठोर नये मानदंड से यह ख़तरा नहीं रह जायेगा. लेकिन, इसका विरोध करने वाले इसे आयोग द्वारा थोपी जा रही की एक मनमानी सीमा बताते हैं.

‘ट्राइसाइक्लाज़ोल’ को बनाने वाली अमेरिकी कंपनी ‘डॉव केमिकल्स’ का दावा है कि झुलसा रोग की रोकथाम करने वाली वही इस समय उपलब्ध सबसे निरापद कारगर दवा है. उसका कहना है कि 2011 में उसने अमेरिका की पर्यावरण-रक्षा एजेंसी ‘ईपीए’ को जो वैज्ञानिक और तकनीकी प्रमाण दिये, उन्हीं के आधार पर वहां बासमती चावल में ‘ट्राइसाइक्लाज़ोल’ के अवशिष्ट की सीमा 3.0 पीपीएम और जापान में तो 10 पीपीम तय की गयी. ये दोनों सीमाएं यूरोपीय संघ में अब तक प्रचलित 1.0 पीपीएम की अपेक्षा तीन से 10 गुना अधिक छूट के बराबर हैं. तब भी अमेरिका और जापान में या भारत में भी बासमती चावल खाने से कैंसर होने की शिकायत नहीं सुनने में आयी है. यही बात ‘अखिल भारतीय चावल निर्यातक संघ’ (एआइआरईए) के कार्यकारी निदेशक राजन सुंदरेसन भी कहते हैं. बासमती चावल के निर्यातकों का एक प्रतिनिधिमंडल लेकर वे स्वयं ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के वरिष्ठ अधिकारियों से मिले थे.

कोई तर्क सुनने के मूड में नहीं

जर्मनी के कोलोन शहर में हर दो वर्ष पर अनूगा नाम का संसार का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय आहार मेला लगता है. बीते अक्टूबर में लगे इस बार के मेले में अपने 111 प्रदर्शकों के साथ भारत साझीदार देश था. मेले में ‘अखिल भारतीय चावल निर्यातक संघ’ का भी एक स्टेंड था. वहां राजन सुंदरेसन ने एक बातचीत में हमें बताया कि ब्रसेल्स में बासमती चावल वाले मामले से संबंधित जिन दो वरिष्ठ अधिकारियों से वे मिले, वे कोई तर्क सुनने के मूड में नहीं थे.

सुंदरेसन के अनुसार इन अधिकारियों का कहना था कि उन पर इस कीटनाशक को रोकने और उसके उपयोग को हतोत्साहित करने का दबाव है. उन्होंने बताया, ‘हमने कहा कि हम इस क़दम के विरुद्ध नहीं हैं. हम एक सही विकल्प पाने के लिए समय चाहते हैं. यह डॉव की बनाई दवा है तो उसे ही सिद्ध करने दें कि वह हानिकारक नहीं है. वर्ना तो आप अपने ही किसानों और चावल के अपने मिल-मालिकों को नुकसान पहुंचायेंगे.’ यूरोपीय संघ के देशों को निर्यात होने वाला अधिकतर भारतीय बासमती चावल चोकर-सहित भूरे रंग का चावल होता है, जिसे यूरोपीय मिलों में पॉलिश कर सफ़ेद बनाया जाता है. चोकर वाले चावल पर आयात शुल्क नहीं लगता.

भारत के राजदूत का पत्र

बेल्जियम में भारत के राजदूत ने भी यूरोपीय आयोग के नाम एक पत्र में लिखा कि आयोग ने अपना निर्णय ‘ट्राइसाइक्लाज़ोल’ के कैंसरजनक प्रभावों के बारे में कुछ जाने बिना ही सतर्कता के तौर पर लिया है. उनका कहना था कि यूरोपीय संघ के इस निर्णय से भारत के जिन निर्यातकों ने चार दशकों में बासमती चावल के भारतीय ब्रैंड विकसित किये हैं, उन्हें यूरोपीय संघ के बाज़ार से बहिष्कृत किया जा रहा है.

चावल निर्यातक संघ (एआइआरईए) के कार्यकारी निदेशक राजन सुंदरेसन का कहना था कि उनके प्रतिनिधिमंडल की जिन दो अधिकारियों से बात हुई, उन्होंने उन्हें बताया कि बासमती चावल में पाये जाने वाले अवशेष के मानदंड को और कड़ा बनाने की प्रक्रिया 2008 में ही शुरू हो गयी थी. यूरोपीय आयोग ‘डॉव केमिकल्स’ से तभी से कह रहा था कि वह इस विषय से संबंधित अपने सारे परीक्षण और शोधपत्र उसे प्रदान करे. लेकिन ‘डॉव केमिकल्स’ वाले हर साल अपने यहां (काम के बोझ की) आपातस्थिति बता कर बात टालते रहे. अतः आयोग ने तय किया कि अब लगाम कसनी ही होगी, वर्ना ये लोग इसी तरह हर साल आपातस्थिति बताते रहेंगे.

भारत बलि का बकरा!

यदि यूरोपीय आयोग के अधिकारियों की यह बात सच है, तो सारा मामला यूरोपीय आयोग और अमेरिका की ‘डॉव केमिकल्स’ के बीच रस्साक़शी का मामला है, जिसमें भारत को बलि का बकरा बनाया जा रहा है. सुंदरेसन का कहना था कि ‘डॉव केमिकल्स’ वाले अब ओवरटाइम काम करते हुए अपनी रिपोर्ट तैयार करने में लगे हैं. रिपोर्ट का एक हिस्सा उन्होंने पिछले सितंबर में सौंप भी दिया. उन्होंने यूरोपीय संघ के लिए एक भय-निवारण समीक्षा भी तैयार की है. तब भी, संकेत यही हैं कि यूरोपीय आयोग बासमती चावल संबंधी अपने नये मानदंड पर अडिग रहना चाहता है.

भारत के सामने अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि बासमती चावल में ‘ट्राइसाइक्लाज़ोल’ के अवशिष्ट का स्तर घटा कर यदि 0.01 पीपीएम पर नहीं लाया जा सकता, तो क्या कोई दूसरा ऐसा कीटनाशक या फफूंद नाशक है, जिसका उपयोग हो सके? राजन सुंदरेसन कहते हैं, ‘वास्तव में नहीं. कम से कम उतना कारगर तो नहीं ही, जितना कारगर ‘ट्राइसाइक्लाज़ोल’ है. कुछ लोग ‘आइसोप्रोथियोलेन’ इस्तेमाल करते हैं, कुछ दूसरे ‘कार्बेनडैज़िम’ लेते हैं. लेकिन इन दोनों पर अमेरिका में प्रतिबंध है. हम भी भारत में ‘कार्बेनडैज़िम’ पर प्रतिबंध लगवाने के लिए प्रयत्नशील हैं. उसकी तुलना में ‘आइसोप्रोथियोलेन’ कहीं बेहतर है, पर उससे उपचारित चावल का अमेरिका को निर्यात नहीं किया जा सकता. हम किसानों से यह नहीं कह सकते कि आप फलां धान अमेरिका के लिए और फलां यूरोप के लिए उगाएं. यह संभव नहीं है.’

यूरोपीय बाज़ार हमेशा के लिए हाथ से निकल जायेगा?

तो क्या अब बासमती चावल का यूरोपीय बाज़ार भारत के हाथ से हमेशा के लिए निकल जायेगा? सुंदरेसन कहते हैं, ‘यूरोपीय संघ के अधिकारी बासमती चालल की जिन क़िस्मों के पीछे पड़े हैं, वे पीबी 1 और पूसा 1401 हैं. भारत में उनकी कटाई अक्टूबर के अंत में होती है. यदि कटाई के बाद के सारे काम तेज़ी हो जायें, तो उनका 31 दिसंबर 2017 से पहले निर्यात हो सकता है, उसके बाद नहीं. कटाई के बाद का जो काम 2017 के अंत से पहले पूरा नहीं हो पायेगा, वह 2018 में पूरा होगा, और जो कटाई 2018 में होगी, उसका काम 2019 में पूरा होगा. लेकिन, 2018 के अंत तक, यानी अब से एक साल के बाद, हम (समुद्री) ज्वार को झेल चुके होंगे.’

सुंदरेसन आशावादी हैं कि दो साल के भीतर उनके पास बासमती चावल की ऐसी क़िस्में होंगी, जो ब्लास्ट रोग (झुलसा रोग) प्रतिरोधी होंगी. वे कहते हैं, ‘तब न तो किसी फफूंद नाशक की ज़रूरत पड़ेगी और न दानों में कोई अवशेष रहेगा.’ भारतीय कृषि शोध परिषद (आईसीएआर) और कुछ दूसरे शोध संस्थान भी बासमती चावल की ऐसी नस्लें विकसित करने में व्यस्त हैं, जिन्हें झुलसा रोग हो ही नहीं.

पाकिस्तान देर तक ताली नहीं बजा सकेगा

आम तौर पर तो सही परिणाम पाने में समय लगता है. पर, चावल नियातक संघ के कार्यकारी निदेशक राजन सुंदरेसन यदि यह परिणाम दो साल के भीतर ही पा जाने के प्रति आश्वस्त हैं, तो उनके पास ज़रूर इसका कोई आधार होगा. उनका यह भी कहना था कि भारत में कुछ ऐसे शोधकार्य भी प्रकाशित हुए हैं, जिनसे पता चलता है कि कटाई से 30 दिन पहले धान की फसल पर ‘ट्राइसाइक्लाज़ोल’ का छिड़काव करने से चावल के दानों में कोई अवशिष्ट नहीं मिलता. कठिनाई यही है कि भारत के किसानों से इस समयबद्धता की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं होगा.

नववर्ष की पहली सुबह के साथ ही यूरोपीय देशों में भारतीय बासमती चावल का आना लगभग ठप्प ज़रूर पड़ जायेगा, जिससे पाकिस्तानी बासमती चावल की मांग और क़ीमत बढ़ जायेगी. लेकिन, पाकिस्तान न तो उस कमी को अकेले पूरा कर सकता है, जो भारतीय बासमती के नहीं होने से पैदा होगी, और न ही लंबे समय तक तालियां बजा सकता है. भारत जल्द ही किसी नयी किस्म के साथ पुनः अखाड़े में उतर जायेगा.