युधिष्ठिर के लिए तीन यक्ष प्रश्नों के उत्तर देना भी शायद उतना मुश्किल न रहा हो, जितना कई महिलाओं के लिए अपनी सुरक्षा के प्रश्नों से जूझना है. खास तौर से यदि दिल्ली की सड़कों पर रात में अकेले होने की बात की जाए, तो यह लड़कियों के लिए अक्सर ही रूह कंपाने वाला अनुभव होता है. देर रात...बल्कि देर भी क्या, कुछ जगहों पर तो महज रात के आठ-नौ बजे निकलना भी, जान हथेली पर होने जैसा अनुभव करा देता है.

रात के समय दिल्ली की सड़कों पर अकेले होने का अनुभव पढ़ी-लिखी हो या अनपढ़, नौकरीशुदा या बेरोजगार, किशोरी या उम्रदराज, झुग्गी की या फिर दक्षिणी दिल्ली के बड़े से घर वाली, परंपरिक या अत्याधुनिक हर तरह की लड़कियों/महिलाओं को एक समान खौफनाक स्थिति में रखता है. ज्यादातर लड़कियां किसी मजबूरी में ही यहां देर रात को घर से बाहर निकलने के बारे में सोचती हैं. और जब तक वे सुरक्षित घर नहीं पहुंच जातीं, उनके और परिवार वालों के दिमाग सिर्फ इसी उधेडबुन में रहते हैं कि ‘कहीं ये न हो जाए, कहीं वो न हो जाए’!

कुछ साल पहले रात के करीब दस बजे मैं मोतीबाग से दिल्ली विश्वविद्यालय जाने के लिए एक बस में बैठी थी. बस में लड़कों को एक ग्रुप भी था. ये लड़के आपस में कभी बात, कभी इशारे और कभी कुछ अजीब से भावों का आदान-प्रदान कर रहे थे और बीच-बीच में मुझे देख भी रहे थे. बस में मेरे अलावा कोई और महिला यात्री नहीं थी और इस समूह के अलावा इक्का-दुक्का लोग ही थे. इस वजह से बार-बार यही खयाल दिमाग में चल रहा था, कि यदि ये लड़के आपस में मिल गए, तो बस को कहीं भी रूकवाकर, मेरे साथ कुछ भी कर सकते हैं.

एक खयाल ने दूसरे को जन्म दिया और फिर में बार-बार यह सोचने लगी कि यदि ये लोग मेरा रेप करने की कोशिश करें तो मुझे क्या करना होगा - मुझे इसका विरोध करना चाहिए या फिर सरेंडर करके खुद को किसी भी हाल में जिंदा रखने की कोशिश? बेहद थकाने वाली जद्दोजहद से निकलकर मैं इस नतीजे पर पहुंची कि मुझे हर हाल में खुद को जिंदा रखने की कोशिश करनी है बस!…लगभग डेढ़-दो घंटे तक इसी तरह की दिमागी उधेड़बुन में रहने के बाद मैं सुरक्षित डीयू तो पहुंच गई लेकिन कई दिनों तक उस खौफ से बाहर नहीं निकल पायी.

मैं अक्सर सोचती हूं कि मेरे सिवाय उस वक्त बस में बैठे किसी भी व्यक्ति के लिए कोई खौफ या इमरजेंसी जैसे हालात नहीं थे. लेकिन एक लड़की होने के कारण, उन बेहद सामान्य से दिखने वाले हालात में भी मेरा दिमाग असुरक्षा के चरम को जी रहा था.

असुरक्षा के खयालों में, बदतमीजी, छेड़खानी, पकड़ लेने, दबोच लेने, यौन हिंसा तो हैं ही लेकिन एक लड़की के दिमाग में सबसे ज्यादा घूमता रहने वाला डर रेप या गैंग रेप का है. यहां शारीरिक और मानसिक हिंसा के साथ-साथ समाज में इज्जत खराब होने, कोर्ट-कचहरी और पुलिस के चक्कर लगाने का भी मसला रहता है. यानी कि दिल्ली की सड़कों पर देर रात को बिताये गये सिर्फ चंद मिनट ही किसी लड़की को इतने मानसिक तनाव में ला सकते हैं जिसकी कल्पना उस स्थिति में कभी न पहुंचे लोग कर ही नहीं सकते.

दिल्ली में ज्यादातर लड़कियां देर रात को ऑटो या शेयरिंग कैब लेने से बचती हैं. टैक्सी की तुलना में उन्हें अक्सर बस ज्यादा सुरक्षित लगती है. लेकिन जैसाकि मैंने ऊपर लिखा है बहुत बार बस भी असुरक्षित लगने लगती है. सत्याग्रह की एक सहयोगी नीतू कुमार अपना अनुभव बताते हुए कहती हैं - ‘एक बार पंजाबी बाग से नोएडा आने में मुझे रात के नौ बज गए. ऑटो के बजाय बस को सुरक्षित समझकर मैं उसमें बैठ तो गई, लेकिन कम मुसाफिरों और ऊपर से अकेली महिला सवारी होने के कारण ऐसा महसूस नहीं कर पा रही थी. कंडक्टर भी जब-तब मुझे घूर रहा था. बहुत थकी हुई थी लेकिन एक पल के लिए भी अपनी आंख बंद नहीं कर पा रही थी क्योंकि मन में लगातार यही चल रहा था कि कुछ गड़बड़ न हो जाए. बस में किसी खराबी के चलते बस वाले ने मुझे नोएडा के शुरू में ही उतार दिया. लगभग रात के सवा दस बज चुके थे. सुनसान सड़क पर मुझे अकेली देखते ही, बहुत सारे कार वाले अचानक ही मददगार बनने लगे थे! मेरे बिना कहे ही वे गाड़ियां रोककर मुझे मेरी जगह छोड़ने के ऑफर देने लगे. कोई कार का म्यूजिक तेज करके मुझे बुला रहा था’.

‘मेरी सांसें तब तक अटकी रहीं जब तक मुश्किल से मिले एक रिक्शे में बैठकर मैं अपने घर नहीं पहुंची. देर रात अकेले होने की तो बात ही छोड़ो, सिर्फ रात के नौ बजे भी यदि दिल्ली-नोएडा की किसी सड़क पर अकेले होती हूं, तो बेहद असहज और असुरक्षित महसूस करती हूं...बल्कि सच कहूं, तो दिल्ली और एनसीआर में तो दिन के वक्त भी किसी सुनसान सड़क पर डर ही लगता है.’

रात में दिल्ली की सड़कों पर लड़कियों और महिलाओं के डर का आलम यह है कि वे न सिर्फ सुनसान या कम भीड़ वाली जगहों पर असुरक्षित महसूस करती हैं, बल्कि अपनी कार में होने पर उन्हें एक दूसरे ही तरह का तनाव घेरे रहता है. मीडिया प्रोफेशनल आशिता बताती हैं - ‘ऑफिस की पार्टी में रात के नौ बजते ही मेरे पति के फोन आने शुरू हो गए थे कि अब मुझे निकल जाना चाहिए. लेकिन मैं दस बजे ही निकल सकी. अपनी बेटी के साथ मैं कार से निकली तो पूरे रास्ते मैं सिर्फ यही सोचती रही, कि कहीं कार का टायर पंक्चर हो गया तो! या किसी कारण से कार खराब हो गई तो! कहीं ऐसा कुछ न हो जाए कि रात को मुझे कार से बाहर निकलना पड़े! किसी सुनसान रास्ते पर देर रात में कार ड्राइव करते समय शीशे में पीछे देखती रहती हूं कि कहीं कोई पीछा तो नहीं कर रहा. कोशिश करती हूं कि ऑफिस से रोज एक ही रास्ते से घर वापस ना जाऊं.’

यों तो अक्सर सड़क पर बाईं तरफ पैदल चलने को कहा जाता है. लेकिन बहुत सारी लड़कियां अपने अनुभव से ठीक इसके उल्टी यानी दाई तरफ चलने को ज्यादा सुरक्षित मानती हैं. मतलब कि जिस दिशा में वाहन आपके सामने से आ रहे हैं, वह पैदल चलने के लिए ज्यादा सुरक्षित है, फिर चाहे दिन हो या रात. ऐसा करने से सामने से आने वाले वाहनों पर नजर रखी जा सकती है. वाहन की गति की दिशा में चलने पर अक्सर बहुत सारी लड़कियों को पीछे से अचानक से धक्का देने, दबोचने, या सिर्फ मजे लेने के लिए बहुत पास पहुंच कर डराने जैसी हरकतों का सामना करना पड़ता है. वाहनों की दिशा में चलने पर पीछे से आने वाली हर गाड़ी की हेडलाइट्स एक अजीब सा भय भी साथ लेकर आती हैं.

देर रात में अकेले घर से बाहर होने पर लड़कियों का सारा समय सिर्फ यह सोचने में ही निकलता है कि क्या करें, कैसे करें कि सुरक्षित घर पहुंच जाएं. ऐसे में लड़कियों का दिमाग अक्सर बहुत अलर्ट हो जाता है और सुरक्षा की कोई न कोई तरकीब निकालने में ही लगा रहता है. एचसीएल में काम करने वाली प्रिया बताती हैं - ‘एक बार नोएडा के एक मेट्रो स्टेशन पर उतरने के बाद बहुत देर तक मैं यही सोचती रही कि अब पीजी तक कैसे जाऊं, क्योंकि कैब अवेलबल नहीं थी, और ऑटो या शेयर टैक्सी मुझे सेफ नहीं लग रहा था.’

‘मजबूरी में ऑटो पकड़ा और फिर लगातार अपने किसी न किसी दोस्त से फोन पर बात करती रही और उन्हें अपनी लोकेशन बताती रही. बहुत बार ऐसा भी होता है कि झूठमूठ ही फोन पर बात करने का दिखावा करती रहती हूं. बहुत बार तो ये भी लगता है की कहीं ऑटो या कैब वाला गलत रास्ते से तो नहीं ले जा रहा. हालांकि अभी तक दिल्ली में ऑटो या कैब वालों के साथ मेरे अनुभव अच्छे ही रहे हैं, लेकिन फिर भी दिमाग अक्सर ही अनसेफ फील करता है.’

देर रात अकेले निकलने को मना करने संबंधी किसी भी सलाह को महिला अधिकारों का सवाल बना कर हम उस पर लाख हो-हल्ला मचा लें लेकिन हकीकत यही है कि आज के माहौल में हम खुद देर रात में बाहर निकलने से बेहद डरती हैं. सुरक्षा का सवाल आजादी से पहले है. निःसंदेह देर रात को किसी भी सड़क पर जब मन करे निकल जाने की आजादी, हमारे लिए भी उतना ही खूबसूरत और एक्साइटिंग सपना है, जितना किसी लड़के के लिए. सोच, ख्यालों, और जीने के मामले में हम कितना भी मॉडर्न हों, पर देर रात दिल्ली की सड़कों पर अकेले निकलने के मामले में बिंदास होना उतना आसान नहीं है.