कश्मीर में शांति की प्रक्रिया शुरू करने के लिए मोदी सरकार ने बीती 23 अक्टूबर को खुफिया ब्यूरो के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा को वार्ताकार नियुक्त किया है. गृह मंत्रालय का कहना है कि उन्हें कश्मीर मुद्दे पर सभी पक्षों से बातचीत करने की आजादी होगी. इस बारे में दिनेश्वर शर्मा ने बताया कि वे उन सभी पक्षों से बात करना चाहते हैं, जो संवाद की इच्छा रखते हैं. केंद्र की इस महत्वपूर्ण पहल का जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती सहित विपक्षी पार्टियों ने स्वागत किया है. हालांकि, वार्ताकार संबंधित पक्षों से बातचीत करने के बाद इसके आधार पर कब अपनी रिपोर्ट सौंपेंगे, इसके लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है.

इससे पहले बीती 20 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) एसपी वैद ने भी घाटी में अशांति की स्थिति से निपटने के लिए राजनीतिक समाधान पर जोर दिया था. हालांकि, इसके बाद भारतीय सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत का कहना था कि इसका असर सैन्य अभियान पर नहीं पड़ेगा. इस मसले का राजनीतिक पक्ष देखें तो भाजपा ने पीडीपी के साथ गठबंधन करने के लिए कश्मीर समस्या से जुड़े सभी पक्षों के साथ बातचीत के लिए हामी भरी थी. इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस साल लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए कहा था, ‘कश्मीर समस्या न गोली से सुलझेगी न गाली से, बल्कि कश्मीर समस्या सुलझेगी कश्मीरियों को गले लगाने से.’

देश के अधिकतर प्रमुख अखबारों ने केंद्र की इस पहल का स्वागत करते हुए अपनी बात रखी है. इनमें अधिकांश ने कश्मीर स्थित अलगाववादी पार्टियों के साथ बातचीत का समर्थन किया है. साथ ही, कुछ अखबारों ने कश्मीर समस्या के स्थायी समाधान के लिए इससे सबसे अधिक प्रभावित आम लोगों को भी संवाद प्रक्रिया में शामिल करने की वकालत की है.

द हिंदू ने केंद्र के इस कदम को काफी देर से उठाया गया बताया है. साथ ही, दिनेश्वर शर्मा कश्मीर स्थित संगठनों से बातचीत के दौरान कितना लचीला रुख अपना सकते हैं, इस पर भी स्थिति साफ करने की जरूरत पर जोर दिया है. बीती 25 अक्टूबर को प्रकाशित संपादकीय में अखबार कहता है, ‘बीते दिनों राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा अलगाववादी नेताओं के खिलाफ की गई कार्रवाई इनके साथ संवाद की कोशिशों को प्रभावित कर सकती है. इन परिस्थितियों में वार्ताकार को कश्मीरी लोगों के हितों को सुनिश्चित करने के लिए अपनी कार्ययोजना को विस्तार रूप से तैयार करना चाहिए.’

उधर, हिंदुस्तान टाइम्स का मानना है कि बीते साल बुरहान वानी के मारे जाने के बाद होने वाली घटनाएं फिर हुईं तो पिछले कुछ महीनों में जो भी कुछ हासिल हुआ है, वह खत्म हो सकता है. अखबार ने इस लिहाज से वार्ताकार की नियुक्ति को सही दिशा में उठाया गया कदम बताया है. बीते मंगलवार को प्रकाशित अपने संपादकीय में अखबार ने यह भी जिक्र किया है कि लश्कर-ए तैयबा के दो आतंकियों- अबू दुजाना और बशीर लश्करी- के मारे जाने पर लोग उनके जनाजे में इकट्ठे तो हुए लेकिन, किसी तरह की हिंसक घटना नहीं हुई. हिंदुस्तान टाइम्स का आगे कहना है कि इस बारे में केंद्र सरकार की पहल कितनी कामयाब होती है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह सभी पक्षों को एक साथ लाने को लेकर कितनी गंभीर है. अखबार का मानना है कि विपक्षी पार्टियों को भी देशहित में कश्मीर मुद्दे के समाधान के लिए आगे बढ़कर नेतृत्व करना चाहिए. अखबार के मुताबिक पार्टियों की एकता ही कश्मीर में राजनीतिक और भावनात्मक दरार को भरने का काम कर सकती है.

उधर, द टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस पहल का स्वागत करते हुए कश्मीर समस्या के समाधान के लिए सैन्य कोशिशों को नाकाफी बताया है. उसने इस बहाने मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की मुश्किलों का भी जिक्र किया है. बीते बुधवार को संपादकीय के जरिए अखबार ने कहा है कि सैन्य अभियानों और कर्फ्यू की वजह से मुख्यमंत्री को आम कश्मीरी लोगों की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है और अब केंद्र के इस कदम के बाद वे राहत की सांस ले सकती हैं. इसमें आशंका जताई गई है कि हुर्रियत पाकिस्तान की इच्छा के बगैर बातचीत के लिए तैयार नहीं हो सकती. अखबार के मुताबिक हालांकि उम्मीद है कि कश्मीर स्थित अन्य समूह और लोग इसके लिए आगे आ सकते हैं. इन सब बातों को देखते हुए भी कश्मीर में शांति के लिए केंद्र के पास कोशिश जारी रखने के और कोई विकल्प नहीं है.

द इकनॉमिक टाइम्स ने भी बुधवार को ही प्रकाशित संपादकीय में कहा है कि वार्ताकार नियुक्त करने के बावजूद यह साफ है कि घाटी स्थित आतंकियों के खिलाफ सैन्य अभियान जारी रहेगा. अखबार का आगे कहना है कि कश्मीर में आतंकी फंडिंग करने वाले संदेहास्पद व्यक्तियों के खिलाफ लगातार छापामारी की जा रही है. बीते मंगलवार को हिजबुल मुजाहिदीन के मुखिया सैयद सलाहुद्दीन के बेटे को मनी लॉन्डरिंग के मामले में गिरफ्तार किया गया. हालांकि, अखबार ने इस बात पर जोर दिया है कि किसी भी चुनी हुई सरकार को नाखुश लोगों के साथ राजनीतिक संवाद करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए.

उधर, द इंडियन एक्सप्रेस ने कश्मीर में शांति सुनिश्चित करने के लिए वार्ताकार की नियुक्ति को मोदी सरकार के उस रुख से अलग बताया है, जिसमें कहा गया था कि घाटी में आतंकवाद जारी रहने पर कोई बातचीत नहीं होगी. अखबार ने बुधवार को अपने संपादकीय में कहा है कि अब सरकार को महसूस हो रहा है कि केवल सैन्य ताकत के जरिए स्थिति में सुधार नहीं हो सकता. इसके अलावा इस पहल को विश्वसनीय बनाने के लिए हुर्रियत के शीर्ष नेताओं को इसमें शामिल करने पर जोर दिया गया है. अखबार का आगे कहना है कि राज्य में निर्वाचित प्रतिनिधि भी मानते हैं कि उनके साथ बातचीत किए बिना किसी भी पहल का कोई नतीजा नहीं निकलने वाला.

हिंदी के अखबारों की बात करें तो दैनिक जागरण के मुताबिक इस कदम ने साफ कर दिया है कि केंद्र सरकार कश्मीर समस्या के स्थायी समाधान के लिए प्रतिबद्ध है. हालांकि, हुर्रियत नेताओं के साथ बातचीत के बारे में अखबार का मानना है कि यह इस पर निर्भर करेगा कि हुर्रियत कान्फ्रेंस जैसे अलगाववादी और पाकिस्तानपरस्त संगठनों के नेता अपना रुख और रवैया बदलने के लिए तैयार होते हैं या नहीं. बीते मंगलवार को प्रकाशित अपने संपादकीय में अखबार ने इस पर जोर दिया है कि वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा को अलगाववादी तत्वों को यह संदेश देना होगा कि सरकार और देश की जनता कश्मीर की आजादी का बेसुरा राग सुनने के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं है.

दैनिक भास्कर ने इसे कश्मीर पर सरकार की बदली हुई नीति का नतीजा बताया है. बीते मंगलवार को आए अपने संपादकीय में अखबार कहता है कि मोदी सरकार को अब महसूस हुआ है कि सुरक्षा बलों की सख्ती और नोटबंदी से आगे का रास्ता संवाद ही है. साथ ही, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला की इस बात को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि समाधान के लिए पाकिस्तान से भी बातचीत की जानी चाहिए. आखिर में अखबार यह भी कहता है कि केंद्र के वार्ताकार इस समस्या पर पहले गठित की गई समितियों और वार्ताकारों की रिपोर्टों की मदद भी ले सकते हैं.

राजस्थान पत्रिका ने समस्या के समाधान के लिए राजनीतिक पार्टियों और अलगाववादियों के बजाय आम लोगों को तवज्जो देने पर जोर दिया है. इस मसले पर संपादकीय में अखबार लिखता है कि बाकी लोग अपने स्वार्थों से ऊपर उठते ही नहीं जकि दूसरी ओर घाटी में आतंकवाद से सबसे अधिक नुकसान आम लोगों को उठाना पड़ा है. अखबार का आगे कहना है कि कश्मीर एक बार देश की मुख्यधारा से जुड़ जाए तो अनेक समस्याओं का समाधान खुद ही निकल आएगा. हालांकि, उसके मुताबिक ऐसा उस वक्त ही संभव है जब इससे जुड़े सभी पक्ष अपने संकुचित दायरे से बाहर आने का साहस दिखाएं.

उधर, जनसत्ता का कहना है कि अलगाववादी नेताओं को बातचीत में शामिल करने के लिए केंद्र की हरी झंडी भी जरूरी होगी. अखबार ने संपादकीय में कश्मीर समस्या से संबंधित इतिहास को याद करते हुए कहा है कि वाजपेयी सरकार के समय राज्य की सभी राजनीतिक पार्टियों और सामाजिक संगठनों के साथ हुर्रियत नेताओं को भी बातचीत में शामिल किया गया था. जनसत्ता का मानना है कि सरकार के लिए इससे जुड़ी सबसे बड़ी चुनौती युवाओं का विश्वास जीतना है और इसके लिए जरूरी है कि इस समस्या को राज्य के साथ-साथ बाकी देश में भी हिंदू-मुस्लिम नजरिए से न देखा जाए.