29 अगस्त, 1947. तब का कलकत्ता. गांधी शहर में हैं. उस खूंरेजी को रोकने जो मुसलमानों और हिंदुओं पर सवार है. गांधी जहां भी हों, जिस हाल में भी, प्रार्थना सभा अवश्य होनी है. सो, इस वक्त भी जब खूनखराबा रोकने में गांधी का हरेक मिनट जा रहा है, प्रार्थना सभा होती है. बापू की प्रार्थना सभाओं में प्रायः भजन गाए जाते हैं. लेकिन 29 अगस्त की इस सभा में वंदे मातरम गाया जाता है. मंच पर उपस्थित सभी लोग उठ खड़े होते हैं. इनमें शहीद सुहरावर्दी भी हैं जो मुस्लिम लीग के नेता हैं और जल्दी ही नए मुल्क पाकिस्तान चले जाने वाले हैं. दूसरे मुसलमान भी खड़े होते हैं. लेकिन गांधी खुद बैठे रहते हैं.

प्रार्थना समाप्त होने के बाद गांधी अपने वक्तव्य में वंदे मातरम् गाए जाने के दौरान खड़े होने के लिए सुहरावर्दी और अन्य मुसलमानों की प्रशंसा करते हैं. लेकिन वे बताते हैं कि वे स्वयं जान-बूझकर बैठे रहे क्योंकि उन्हें यह मालूम है कि भारतीय संस्कृति में सम्मान प्रदर्शित करने के लिए किसी भजन या राष्ट्रीय गान के समय खड़े होने की कोई आवश्यकता नहीं है. इस रिवाज़ का अनावश्यक रूप से पश्चिम से आयात कर लिया गया है. ऐसे अवसरों पर मात्र एक सम्मानजनक मुद्रा पर्याप्त है. आखिरकार महत्वपूर्ण मानसिक रुख है न कि दिखावा.

जो लोग आज राष्ट्रगान के समय खड़े न होने पर आपका सर तोड़ दे सकते हैं, वे वही हैं जो भारत के पाश्चात्य संस्कृति से आक्रांत होने का रोना भी रोते हैं. वे वेलेंटाइंस डे पर डंडे लेकर घूमते हैं कि प्रेमियों को भारतीय संस्कृति का सबक सिखा दें. वे भारतीय संस्कृति को गांधी के बजाय पश्चिम से क्यों सीखना चाहते हैं.

गांधी का नज़रिया या उनकी पद्धति क्या है?

आज़ादी करीब आई और साथ ही ब्रिटिश भारत के भीतर से दो नए राष्ट्रों के वजूद में आने का वक्त भी आया. लेकिन कांग्रेस तो पूरे ब्रिटिश भारत में थी. वैसे ही मुस्लिम लीग भी. जो हिस्से पाकिस्तान में चले गए थे वहां अभी कांग्रेस के सदस्य मौजूद थे. वे आज़ादी के समय किस झंडे को अपनी सलामी दें, यह सवाल था. पूर्वी पाकिस्तान के खुलना से एक कांग्रेसी ने गांधी को अपनी यह उलझन लिख भेजी. गांधी ने मशविरा दिया कि उसे पाकिस्तान के चांद-सितारे वाले झंडे के प्रति सम्मान जाहिर करना चाहिए.

गांधी, जिनका संघर्ष जिन्ना से धर्म के आधार पर राष्ट्रीयता के प्रश्न पर था और जो इस संघर्ष में पराजित हो गए थे, न तो पाकिस्तान से नफरत कर सकते थे और न पाकिस्तान के किसी प्रतीक से.

पुलिस से या हमारी प्रारंभिक स्तर की अदालतों से उम्मीद करना कि इस इतिहास से उनकी वाकफियत होगी ज्यादती न होनी चाहिए. लेकिन अगर होती तो अभी कानपुर में बैलून विक्रेताओं को कानपुर की पुलिस इस जुर्म के आरोप में गिरफ्तार न करती कि वे ऐसे बैलून बेच रहे थे जिनपर “आई लव यू पाकिस्तान” और हबीबी छपा था. लव शब्द छपा न था, आई और पकिस्तान के बीच दिल का चित्र बना था. यह गिरफ्तारी उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के एक सदस्य की शिकायत पर की.

यह बात अपनी जगह है कि भारत में अब तक कोई क़ानून नहीं बना है जो पाकिस्तान या किसी और मुल्क से मुहब्बत जाहिर करने को अपराध ठहराता हो. सितारों और धारियोंवाले झंडे की कमीज या निकर या टोपी पहने लोग दिन दहाड़े घूमते फिरते हैं लेकिन उनसे किसी का दिल नहीं दुखता, फिर चांद सितारे और हरे रंग से ही क्यों परेशानी? हम उम्मीद कर सकते हैं कि उच्चतम न्यायालय फिर हस्तक्षेप करेगा और भारत की जनता को वह बताएगा जो बरसों पहले गांधी ने बताया था. वह यह कि भारतीय राष्ट्रवाद किसी दूसरे राष्ट्र से घृणा पर नहीं टिका है.

लेकिन यह बात भी ठीक है कि अमरीकी झंडे और पाकिस्तानी झंडे के साथ हमारे व्यवहार में तुलना नहीं हो सकती. पाकिस्तान से कई चोटें हमें मिली हैं और उनके दर्द को भुलाना आसान नहीं. यहां हम यह भी पूछ सकते हैं कि संकटपूर्ण क्षणों में पाकिस्तान का साथ देने वाले अमरीका को अपनी ओर खींचने की अपनी कोशिश का हमारा मनोविज्ञान क्या है? इसके बावजूद यह माना ही जाना चाहिए कि पाकिस्तान को लेकर हमारी कड़वाहट की जायज़ वजहें हैं. यह भी ठीक है कि पाकिस्तानी झंडे या उसके राष्ट्रीय प्रतीक को अगर कोई अपनाता है या उससे लगाव दिखाता है तो उसके पीछे उसका पाकिस्तानी जनता दूसरे से प्रेम उतना नहीं जितना भारत से अपनी चिढ़ जाहिर करना है. उसे पता है कि भारत के लिए पाकिस्तान-प्रेम दुखती रग है, उसे दबाने से भारत को तकलीफ होगी.

गांधी ने जब एक खुलना में छूट गए कांग्रेसी से सितारे और चांद वाले झंडे को सलाम करने को कहा था तो उसके मन में एक उम्मीद थी, वह यह कि दो मुल्क बन जाने और गर्द बैठ जाने पर दोनों देश परिपक्व पड़ोसियों की तरह एक दूसरे से पेश आएंगे. वह न हुआ. पाकिस्तान में भी प्रत्येक सत्ताधारी ने अपने वजूद को भारत के निषेध पर ही टिका बताया. भारत इस मामले में पाकिस्तान का अनुकरण न करे, यह उम्मीद तो की जा सकती है लेकिन निरंतर घृणा का सामना प्रेम से करने के लिए गांधी की तपस्या भी चाहिए.

पाकिस्तान और भारत दोनों के राजनीतिक दलों और नागरिक समाज के सामने यह चुनौती है कि वे खुद को पारस्परिक घृणा के ऐतिहासिक बोझ से आज़ाद करें. लेकिन यह हो सके इसके लिए ज़रूरी है कि राष्ट्रवादी बाध्यताओं से भिन्न एक उदार मानवीय सामाजिक व्यवहार का प्रस्ताव किया जाता रहे.

सबसे बड़ी अदालत से यह उम्मीद बंधी है, उसके हालिया रुख से. तीन न्यायमूर्तियों वाली पीठ ने सिनेमा घरों में राष्ट्रगान की अनिवार्यता के बारे में चल रहे मामले में कहा कि राष्ट्रवाद को माथे पर चिपकाकर चलने की ज़रूरत नहीं है. न्यायमूर्ति चंद्रचूड ने कहा कि सिनेमा घरों में लोग मनोरंजन के लिए आते हैं और उन्हें वही अनुभव वहां मिलना चाहिए. उसमें राष्ट्रवाद की मिलावट करने की आवश्यकता नहीं.

जहां लोग इकट्ठे हो जाएं वहां अपनी जबर्दस्ती के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए राष्ट्रवाद को राज्य उन पर थोप दे, यह अदालत को मंजूर नहीं. हम जानते हैं कि किस तरह से स्कूलों का इस्तेमाल राष्ट्रवाद के प्रचार के लिए किया जाता है. ये अधिकारहीन बच्चे हैं जिन्हें अपने सांचे में ढालने को धार्मिक संस्थानों की तरह ही राष्ट्र भी आमादा रहते हैं. इसीलिए वे हर ऐसी सार्वजनिक जगह पर नियंत्रण कर लेना चाहते हैं जहां व्यक्ति समूह की तरह एकत्र हों. वह स्कूल हो, या खेल का मैदान या सिनेमा घर.

अभी हाल में अमरीका के राष्ट्रपति ने उन सबकी भर्त्सना की थी जो राष्ट्रगान का खड़े होकर सम्मान नहीं करते. इस पर अमरीका में खेल के मैदान में खिलाड़ियों ने राष्ट्रगान के वक्त घुटने के बल बैठकर अपना प्रतिरोध जताया. उनमें से किसी को न तो गिरफ्तार किया गया और न सरकार के मंत्रियों ने उनपर हमला बोल दिया.

क्या ऐसी किसी स्थिति की भारत में कल्पना की जा सकती है? यहां तो वैसी जगहें भी जो सरकारी नियंत्रण से आज़ाद बनाई गई हैं, समर्पण करने को तैयार बैठी हैं. जैसे मीडिया या विश्वविद्यालय. लेकिन उच्चतम न्यायालय ने उन्हें एक इशारा किया है.

अदालत का यह रुख इसलिए उम्मीद दिलाता है कि इसने अपने ही साल भर पुराने फैसले को बदलने से इंकार नहीं किया है. आखिर यह आज के मुख्य न्यायाधीश ही थे जिन्होंने पिछले साल का वह निराश करने वाला हुक्म सुनाया था कि फिल्म शुरू होने के पहले हर सिनेमाघर या कोई भी और जगह, राष्ट्रध्वज को अकंपित दिखाते हुए राष्ट्र्गान बजाए और सारे लोग इन दोनों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने को अविचलित मुद्रा में सावधान खडे हों.

इस निर्णय ने पिछले एक वर्ष में राष्ट्र प्रेम में कितना इजाफा किया इसका अध्ययन तो नहीं हुआ है लेकिन यह मालूम है कि इसने मुसलमान विरोधी घृणा के लिए एक आड़ का काम किया. बेहतर हो कि आगे सुनवाई के दौरान अदालत उन सारे प्रसंगों को रिकॉर्ड करे जो राष्ट्र ध्वज या गान के नाम पर मुसलमानों, विकलांगों और दूसरे लोगों के खिलाफ हिंसा के हैं और उनसे क्षमा भी मांगे.

सरकारी वकील की यह दलील बिलुकल बचकानी है कि सिनेमाघर में राष्ट्र गान सुनकर निकल रहे लोग राष्ट्र के प्रति वफादारी और राष्ट्रीय एकता के भाव से सराबोर होंगे. क्या फिल्म के बाद राष्ट्रगान बजाकर फिल्म के प्रभाव से राष्ट्र प्रेम की प्रतियोगिता कराई जा रही है?

मालूम नहीं, न्यायमूर्तियों ने इन प्रश्नों पर विचार किया है या नहीं लेकिन यही क्या कम संतोष की बात है कि उन्होंने यह बताया है कि सुधार कोई भी, फिर वह सर्वोच्च ही क्यों न हो, कर सकता है. सुधार या संशोधन से प्रतिष्ठा घटती नहीं. तो हमारा राष्ट्रवाद भी संशोधनवादी हो तो क्या बुरा है?