तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ती हुई नजर आ रही हैं. शुक्रवार को पार्टी के संस्थापकों में शामिल और ममता बनर्जी के करीबी रहे मुकुल रॉय औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल हो गए हैं. इस मौके पर उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ काम करना उनके लिए गर्व की बात है. उधर, वरिष्ठ भाजपा रविशंकर प्रसाद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा, ‘रॉय का अनुभव हमें (भाजपा) को फायदे पहुंचाएगा, ऐसा मुझे पूरा विश्वास है.’

यानी मुकुल रॉय अब पश्चिम बंगाल में भाजपा नेता के रूप में अपनी पुरानी पार्टी और सत्ताधारी टीएमसी को चुनौती देंगे. बीते कुछ समय से भाजपा पश्चिम बंगाल में अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है. लेकिन उसकी राह में एक बड़ी चुनौती थी किसी दमदार स्थानीय चेहरे का न होना. माना जा रहा है कि मुकुल रॉय के साथ आते ही उसकी एक बड़ी मुश्किल हल हो गई है. दूसरी ओर, रॉय जैसे संगठनकर्ता के पार्टी छोड़ने के बाद भाजपा में शामिल होने के बाद ममता बनर्जी के लिए नई चुनौतियां पैदा हो सकती हैं.

पर्दे के पीछे रहकर पार्टी को मजबूत करने के लिए माने जाने वाले 63 वर्षीय मुकुल रॉय ने बीते सितंबर में पार्टी से इस्तीफा दे दिया था. इससे पहले टीएमसी ने उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल रहने के आधार पर छह साल के लिए निष्कासित कर दिया था. मुकुल रॉय 1990 के दशक में उस वक्त ममता बनर्जी के साथ आए थे, जब वे युवा कांग्रेस के सदस्य थे. इसके बाद 1998 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था. वामपंथी पार्टियों के गढ़ में टीएमसी को खड़ा करने में मुकुल रॉय का बड़ा योगदान रहा है. पार्टी से अलग होने से पहले नई दिल्ली में टीएमसी का चेहरा रहे मुकुल रॉय पश्चिम बंगाल से बाहर पार्टी विस्तार का काम संभाल रहे थे. पार्टी में महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी संभालने वाले रॉय यूपीए सरकार-2 में रेल मंत्रालय की भी जिम्मेदारी संभाल चुके हैं.

बीते सितंबर में राज्य सभा से इस्तीफा देने के बाद मुकुल रॉय ने ममता बनर्जी पर जमकर निशाना साधा था. उनका कहना था कि टीएमसी केवल एक व्यक्ति की पार्टी है. बताया जाता है कि वे 2015 से ममता बनर्जी द्वारा उनके भतीजे और सांसद अभिषेक बनर्जी का पार्टी में कद बढ़ाने से नाराज चल रहे थे. ममता बनर्जी ने उस साल दिसंबर में मुकुल रॉय को पार्टी महासचिव के पद से हटा दिया गया था. हालांकि, 2016 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें पार्टी उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई. विधानसभा चुनाव में भारी जीत हासिल करने के एक साल बाद ममता बनर्जी ने सितंबर, 2017 में पार्टी उपाध्यक्ष का ही पद खत्म कर दिया. इसके जवाब में मुकुल रॉय ने राज्य सरकार द्वारा दी गई जेड श्रेणी की सुरक्षा सुविधा को वापस कर दिया था.

उधर, हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक तृणमूल कांग्रेस महासचिव पार्थ चटर्जी ने इस सबके पीछे केंद्रीय जांच एजेंसियों के होने की ओर संकेत किया है. उनका कहना है कि मुकुल रॉय ने केंद्रीय जांच एजेंसियों के दबाव में आकर पार्टी से अलग होने का फैसला किया है. पार्थ चटर्जी आगे कहते हैं कि बीते कुछ वर्षों से पार्टी को कमजोर करने की कोशिश के साथ ही मुकुल राय ने भाजपा से नजदीकियां बढ़ानी शुरू कर दी थीं.

भाजपा का संभावित चेहरा

2014 के चुनाव के बाद भाजपा पश्चिम बंगाल में अपनी पहुंच बढ़ाने की लगातार कोशिश में है. लेकिन पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती किसी मजबूत बंगाली मानुष का चेहरा न होने को लेकर है. मुकुल रॉय जैसे पके हुए नेता के पार्टी में शामिल होने के बाद माना जा रहा है कि भाजपा की यह मुश्किल भी खत्म हो सकती है और वे आगामी चुनावों में ममता बनर्जी के सामने भाजपाई चेहरा हो सकते हैं. इसके अलावा भाजपा को बोनस में और भी फायदे हासिल हो सकते हैं. मसलन, मुकुल रॉय अपने साथ तृणमूल कार्यकर्ता और समर्थकों को भाजपा के साथ जोड़ सकते हैं, जिससे पार्टी का आधार पहले के मुकाबले काफी बढ़ सकता है. इसके अलावा बीते सितंबर में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह राज्य में पार्टी के कामकाज से खुश नहीं दिखे थे. माना जा रहा है कि मुकुल रॉय के पार्टी में आने के बाद उनकी यह शिकायत भी दूर हो सकती है.

जानकार मानते हैं कि ऐसा होने पर भाजपा राज्य में जितनी मजबूत होगी, तृणमूल कांग्रेस उतनी ही कमजोर हो सकती है. 2014 के चुनाव से पहले ही भाजपा की विरोधी दल के नेताओं को पार्टी में शामिल करने की नीति रही है. इस नीति से उसे फायदा भी होता दिखा है. असम में हिमंता बिस्वा सरमा हों या मणिपुर में एन बीरेन सिंह, ये सभी भाजपा में शामिल होने से पहले कांग्रेस के प्रमुख नेता रह चुके हैं.

हालांकि, मुकुल रॉय को पार्टी में शामिल करने के बाद भाजपा को कुछ मोर्चों पर कठिनाई का भी सामना करना पड़ सकता है. मुकुल रॉय का नाम शारदा चिटफंड घोटाले के साथ नारदा स्टिंग ऑपरेशन में भी सामने आया है. इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह लगातार कहते रहे हैं कि शारदा और नारदा मामले में शामिल कोई भी नहीं बचेगा. अब यदि भाजपा मुकुल रॉय को पार्टी में शामिल करती है तो भ्रष्टाचार विरोधी मोर्चे पर पार्टी कमजोर दिखेगी. साथ ही, ममता बनर्जी भी इसे लेकर पलटवार कर सकती हैं. भाजपा के कुछ नेताओं ने भी नाम न बताने की शर्त पर इससे पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचने की बात कही है.

हालांकि जानकारों के मुताबिक ये नुकसान उन फायदों के सामने कुछ भी नहीं हैं, जो मुकुल रॉय के साथ आने से भाजपा को होने वाले हैं. इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि उनके टीएमसी से अलग होने के बाद भाजपा प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने भी मुकुल रॉय की तारीफ करते हुए उन्हें अच्छा संगठनकर्ता बताया था.

तृणमूल को कितना नुकसान?

राजनीति के गलियारों में माना जा रहा है कि मुकुल रॉय का भाजपा में शामिल होना ममता बनर्जी के लिए बहुत बड़ा झटका साबित हो सकता है. जानकार बताते हैं कि वे तृणमूल कांग्रेस को मजबूती से खड़ा कर सकते हैं तो इसे नीचे गिराने की भी काबिलियत उनमें है. साथ ही, वे तृणमूल की मजबूती और कमजोरियों को सबसे बेहतर तरीके से जानते हैं. यानी टीएमसी को टक्कर देने के मामले में वे भाजपा के लिए मजबूत हथियार बन सकते हैं. राज्य में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों के हाशिए पर जाने के बाद भाजपा पहले से ही तृणमूल को टक्कर देती हुई नजर आ रही है. मुकुल राय के उसके खेमे में आने की संभावना के बाद यह संभावना भी बनती दिख रही है कि आने वाले दिनों में दोनों के बीच यह टक्कर और जोरदार हो सकती है, जिसकी गूंज 1500 किमी दूर दिल्ली तक सुनाई दे सकती है.