प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केदारनाथ में दिए भाषण के दौरान जिस वेश-भूषा और मुद्रा में नज़र आए, उससे उनके ‘परिधान-प्रेम’ को लेकर चर्चाएं हो रही हैं. हालांकि इस तरह की चर्चाएं नई नहीं हैं, और नरेंद्र मोदी ख़ुद भी निःसंकोच कहते रहे हैं कि उन्हें अच्छा दिखना पसंद है. केदारनाथ की तस्वीरों में ललाट पर त्रिपुंड तिलक और गले में रुद्राक्ष की माला के साथ आंखों पर काले सनग्लासेज़ लगाए मोदी मानो पूछना चाह रहे थे कि ‘ज़रा बताओ, मैं कैसा दिखता हूं!’

गूगल पर सर्च करें तो पता चलता है कि बतौर राजनेता नरेंद्र मोदी अपने फ़ैशन स्टाइल के लिए दुनिया में मिसाल बन चुके हैं. पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा तक ‘मोदी स्टाइल’ को कॉपी करने की बात कह चुके हैं. वे नये-नये कपड़ों के इतने शौक़ीन हैं कि गूगल आदि के जरिये आपको यह जानने के लिए ख़ासी मेहनत करनी पड़ सकती है कि उन्होंने किसी ख़ास मौक़े पर पहनी कोई ख़ास डिज़ाइनर ड्रेस दोबारा कब पहनी थी.

यह सादगी कौन सी चिड़िया है?

चीन में ईसा से कोई 550 साल पहले एक महान दर्शनशास्त्री हुए कोंग च्यू. उनका ‘कन्फ्यूशस’ नाम ज़्यादा प्रचलित है. कन्फ़्यूशस ने कहा, ‘जीवन सच में बड़ा सरल है, लेकिन हम उसे जटिल बनाने में लगे रहते हैं.’ 15वीं सदी के इटली के महान चित्रकार लियोनार्दो द विंची ने अपनी कला के संबंध में सादगी को ‘परम परिष्करण’ (बनावट) बताया. महान साहित्यकार लियो टॉल्स्टॉय ने कहा कि जहां सादगी (अच्छाई और सच) नहीं है वहां कोई महानता नहीं होती. महान वैज्ञानिक ऐल्बर्ट आइंस्टाइन के काम करने के तीन महत्वपूर्ण नियमों में से एक सरलता थी. ऐपल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स का मानना था कि साधारण चीज़ को समझना किसी जटिल चीज़ की अपेक्षा ज़्यादा मुश्किल हो सकता है. दुनिया को ज्ञान देना हो तो हमारे यहां बुद्ध का ज़िक्र सबसे पहले ज़बान पर आता है जिन्होंने सादगी को मानव जीवन का महत्वपूर्ण अंग बताया. महान शायर फ़िराक़ गोरखपुरी शेर-ओ-सुख़न में मामूली भाषा के आगे आलिमाना ज़ुबान की हैसियत ‘मक्खी के बराबर’ मानते थे. उनकी जीवन शैली भी इसी सोच से मुतअस्सिर रही. भारतीय राजनीति में भी सादगी, सरलता जैसी मिसालों की कमी नहीं है. सामाजिक और राजनीतिक जीवन में व्यक्ति का रहन-सहन कैसा हो, इसके लिए महात्मा गांधी से बड़ा उदाहरण और क्या होगा. लेकिन आज की राजनीति पहले जैसी नहीं है. अब ज्यादातर बार ‘परवाह न करने’ को आत्म-विश्वास का प्रतीक मान लिया जाता है.

अच्छा दिखने की नरेंद्र मोदी की प्रवृत्ति केवल उनके अपनी छवि को लेकर नहीं है, बल्कि वे मानते हैं कि भारत को भी अगर विश्व शक्ति बनना है तो उसे ख़ुद को ताक़तवर दिखाना होगा.  

अपने आपको ‘फ़क़ीर आदमी’ बता चुके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक कह सकते हैं कि अब लोगों को उनके कपड़े पहनने से भी दिक़्क़त हो रही है. मोदी के वस्त्रों पर टिप्पणी करने वालों के लिए शायद वे कहें, ‘...तो भाई क्या चाहते हो. प्रधानमंत्री कहीं जाए तो फटे-पुराने, मैले-कुचैले कपड़े पहनकर जाए?’ लेकिन इन्हीं समर्थकों को उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बीएसपी की मुखिया मायावती का महंगा गुलाबी कपड़ा और सोने के झुमके पहनना शायद न सुहाता हो. इस सियासी फ़ितरत पर मुज़फ़्फ़र वारसी का शेर वाक़ई मौज़ूं है: औरों के ख़यालात की लेते हैं तलाशी/और अपने गिरेबां में झांका नहीं जाता.

पीटीआई
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ऐसा नहीं है कि सुख-साधन संपन्न होना या विशिष्ट जीवन जीने की इच्छा रखना कोई ग़लत बात है. आम जीवन में अलग-अलग अवसरों पर सरलता और विशिष्टता दोनों की ही ज़रूरत पड़ती रहती है. जैसी ज़रूरत हो वैसा होने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन तब तक ही जब तक कि ऐसा होने का आपका प्रयास वाक़ई में ग़ैरज़रूरी न लगने लगे. फिर नरेंद्र मोदी कोई आम व्यक्ति भी नहीं हैं और न ही उनका जीवन मामूली रहा है. ऐसे में अगर उनकी सार्वजनिक छवि उन चीज़ों से प्रभावित दिखती है जिनका महान नेताओं, साहित्यकारों, कलाकारों, वैज्ञानिकों, दर्शनशास्त्रियों और धार्मिक प्रवर्तकों ने मज़ाक़ उड़ाया है तो सवाल उठेंगे ही.

क्या मोदी दिखावे में विश्वास करते हैं?
नरेंद्र मोदी मानते हैं कि भारत को भी अगर विश्व शक्ति बनना है तो उसे ख़ुद को ताक़तवर दिखाना होगा. दिखाने के लिए दिखावे की ज़रूरत होती है. एक पुराने भाषण में नरेंद्र मोदी कहते हैं, ‘हमें बहुत बड़ा सोचना चाहिए. मैंने एक दिन प्रधानमंत्री (मनमोहन सिंह) से बात की. मैंने कहा कि देखिए साहब, पूरे चीन की चर्चा कहीं नहीं हो रही. वो भी दुनिया को केवल शंघाई दिखाते हैं. पूरा चाइना थोड़े न दिखाते हैं. इसलिए हमें भी अपनी ताक़त दिखाने के लिए कुछ चीज़ें करनी चाहिए.’ वह आगे कहते हैं, ‘मैंने कहा कि अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन चालू करवाइए. दुनिया को हमारी ताक़त का परिचय होगा.’

मेरे शरीर पर आपको ऐसी कोई भी चीज़ नज़र नहीं आएगी जिसमें सादगी न हो... मुझे नहीं लगता कि मैंने कभी कोई महंगी चीज़ ख़रीदी हो. मेरे शरीर पर कोई महंगी चीज़ नहीं दिखेगी.  

नरेंद्र मोदी

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यही नीति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लिए भी तय की हुई है? वे अच्छा दिखना चाहते हैं, इसका ज़िक्र उन्होंने बहुत पहले एक इंटरव्यू में बिना किसी संकोच के किया था. इंटरव्यू लेने वाले राजीव शुक्ला ने जब उनसे पूछा, ‘बीजेपी के सभी पदाधिकारियों में सबसे टिप-टॉप... स्मार्ट कपड़ों से, चश्मे से, पेन से, वेशभूषा से आप ही रहते हैं?’ तो नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘अगर ऐसी बात है तो मुझे अच्छा लगेगा. लेकिन मैं रहना चाहता ज़रूर हूं. मैं मानता हूं कि बहुत अच्छे ढंग से रहना चाहिए.’ इस पर राजीव शुक्ला ने पूछा, ‘यह पार्टी की संस्कृति के थोड़ा विरुद्ध तो नहीं है, क्योंकि पार्टी में सादगी पर बड़ा ज़ोर है?’ इस पर मोदी का जवाब था, ‘मेरे शरीर पर आपको ऐसी कोई भी चीज़ नज़र नहीं आएगी जिसमें सादगी न हो... मुझे नहीं लगता कि मैंने कभी कोई महंगी चीज़ ख़रीदी हो. मेरे शरीर पर कोई महंगी चीज़ नहीं दिखेगी.’

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लेकिन ये नरेंद्र मोदी के पुराने विचार थे. पुराने इसलिए क्योंकि अब लगता नहीं कि नरेंद्र मोदी अच्छे, लेकिन सादे और सस्ते कपड़े पहनते हैं. उनके पुराने दिनों के बारे में बताते हुए पत्रकार, व्यंग्यकार और लेखक राकेश कायस्थ कहते हैं कि कैसे 1999 के लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी ‘गुजराती बनियान पर सिर्फ़ एक कुर्ता डालकर’ ड्राइंग रूम में इंटरव्यू देने आ गये थे. लेकिन जैसे-जैसे नरेंद्र मोदी राजनीतिक सफलता प्राप्त करते गए, वैसे-वैसे यह पीछे छूटता चला गया. अब वे अच्छा दिखना चाहते थे और चाहते थे कि पूरी दुनिया भी उन्हें उनके सबसे अच्छे रूप में देखे. उनके प्रधानमंत्री बनने के कुछ समय बाद तहलका पत्रिका में प्रकाशित एक लेख में स्वतंत्र फ़ोटो पत्रकार सुमित दयाल नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री वाले दिनों को याद करते हैं. वे बताते हैं कि वे टाइम मैगज़ीन के लिए सीएम नरेंद्र मोदी का फ़ोटोशूट करने के लिए उनके पास गए थे. सुमित सोच रहे थे कि जाने कितना समय मिले मुख्यमंत्री से. वे लिखते हैं, ‘मैंने उनसे पूछा, ‘सर, आपके पास समय कितना होगा? इसके जवाब में वे (नरेंद्र मोदी) हौले से मुस्कुराए और कहा- पूरा दिन है, आप लोगों के पास. जो-जो करना चाहो करो. जैसे-जैसे कहोगे मैं वैसे-वैसे करूंगा. इस जवाब की मुझे रत्ती भर भी उम्मीद नहीं थी. मुझे लगा था कि दस-बीस मिनट से ज़्यादा तो मिलेगा ही नहीं. लेकिन यहां तो मोदी जी ने हमें अपना पूरा दिन दे दिया था.’

पिछले कुछ समय में ऐसे मौक़े भी आए जब लगा कि अच्छा दिखने के लिए प्रधानमंत्री अति कर रहे हैं. उनके परिधान पर एक बड़ा विवाद उस समय खड़ा हुआ जब जनवरी 2015 में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आए थे. उस दौरान पीएम नरेंद्र मोदी ने बंद गले का एक शानदार सूट पहना जिसमें सुनहरे धागे से उनके नाम वाली धारियां बनाई गई थीं. राजनीतिक विरोधियों ने दावा किया था कि पीएम के उस सूट की क़ीमत ‘दस लाख’ रुपये थी और उसे यूनाइटेड किंगडम में बनवाया गया था. लेकिन बाद में एक एनआरआई हीरा व्यापारी रमेशकुमार भीकाभाई वीरानी सामने आए. उन्होंने दावा किया कि मोदी ने जो सूट पहना था वह दरअसल उन्होंने प्रधानमंत्री को तोहफ़े में दिया था. वीरानी ने यह भी बताया कि जितनी क़ीमत सूट की बताई जा रही है, असल में वह उतना महंगा है नहीं. हालांकि उन्होंने यह भी नहीं बताया कि सूट की असल क़ीमत क्या थी.

एक दिन में तीन परिधान

सूट की क़ीमत जो भी थी, उससे ज़्यादा दिलचस्प प्रधानमंत्री का बार-बार कपड़े बदलना था. 25 जनवरी, 2015 को सुबह 9.40 मिनट के आसपास राष्ट्रपति ओबामा भारत पहुंचे. एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके स्वागत के लिए मौजूद थे. उस समय उन्होंने कुरते पर नेहरू जैकेट पहना हुआ था, और एक सुंदर शाल डाली हुई थी. वहीं, राष्ट्रपति ओबामा ने काले रंग का सूट और भूरे (शायद) रंग की टाई पहनी हुई थी. वहां से वे औपचारिक स्वागत के लिए राष्ट्रपति भवन निकल गए. वहां पहुंचने पर पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने ओबामा का स्वागत किया. यहां भी ओबामा ने वही सूट और टाई पहने हुए थे, लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी का गेट-अप बदल चुका था. वे ‘नरेंद्र मोदी’ की धारियों वाला वही सूट पहने दिख रहे थे जिसका ज़िक्र ऊपर किया गया है. शाम को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति भवन में दावत दी. राजनीति के अलावा अन्य क्षेत्रों के लोग भी इसमें शामिल हुए. जब बराक ओबामा पहुंचे तो उस समय भी उनके सूट और टाई वही थे जो उन्होंने सुबह से पहन रखे थे, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कपड़े फिर बदल गए. इस बार वे बंद गले के एक और सूट में दिखाई दिए.

पेटी डिसूज़ा/वाइट हाउस
पेटी डिसूज़ा/वाइट हाउस

अगले दिन गणतंत्र दिवस की परेड थी. राष्ट्रपति ओबामा को परेड में बतौर विशेष अतिथि आमंत्रित किया गया था. इस बार उन्होंने अपना लिबास बदल लिया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वेश-भूषा भी चौथी बार बदल गई थी. अब वे काले रंग के जयपुरी सूट और सिर पर एक रंगीन पगड़ी पहने नज़र आ रहे थे. इसके बाद शाम को दोनों नेताओं ने अपने-अपने देशों के कई सीईओ से बातचीत की. वहां भी बराक ओबामा ने सुबह वाले कपड़े ही पहन रखे थे, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लिबास पांचवीं बार बदल चुका था. कहने को तो इसमें भी क्या ग़लत है. लेकिन सवाल वही है कि इसकी कितनी जरूरत थी?

सितंबर 2015 में एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा था कि उनका कोई फ़ैशन डिज़ाइनर नहीं है जो उनके लिए कपड़े डिज़ाइन करे. इससे क़रीब पांच महीने पहले आई एक ख़बर के मुताबिक़ जब आरटीआई के ज़रिए प्रधानमंत्री के डिज़ाइनर कपड़ों के ख़र्च के बारे में प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से जानकारी मांगी गई तो पीएमओ ने जवाब में कहा कि उसके पास ऐसी कोई जानकारी नहीं है. पीएमओ ने इतना ज़रूर बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कपड़ों का ख़र्च सरकार के कोष से नहीं दिया जाता.

ओडिशा के एक स्टूडेंट ने यह जानकारी मांगी थी. उसने यह भी पूछा था कि मोदी के कपड़े डिज़ाइन करने वालों को कितना पैसा दिया जाता है. इनमें मुंबई के फैशन डिज़ाइनर ट्रॉय कोस्टा का भी नाम शामिल था जो बॉलीवुड सुपरस्टारों के महंगे कपड़े डिज़ाइन करने के लिए जाने जाते हैं. 2014 में पीएम मोदी छह दिन के लिए अमेरिका गए थे. ख़बरों के मुताबिक़ उस दौरे के लिए ट्रॉय ने ही प्रधानमंत्री के कपड़े डिज़ाइन किए थे. इस बारे में जब उनसे संपर्क किया गया तो उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया.

पीआईबी
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बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ‘नरेंद्र मोदी: द मैन, द टाइम्स’ किताब के लेखक निलांजन मुखोपाध्याय बताते हैं कि एक भारतीय नेता के रूप में नरेंद्र मोदी का पहनावा अभूतपूर्व है. वहीं ‘द मोदी इफ़ेक्ट’ नाम की किताब लिखने वाले लांस प्राइस से बात करते हुए मोदी ने कहा था, ‘हां, मुझे बढ़िया कपड़े पहनना और साफ़ रहना पसंद है. भगवान ने मुझे रंगों का मिश्रण करने और उनका मिलान करने की समझ दी है, इसलिए मैं ऐसा ख़ुद ही कर लेता हूं. चूंकि भगवान ने ही मुझे ये प्रतिभा दी है, इसलिए मैं हर चीज़ में फ़िट हो जाता हूं. मेरे पास कोई फ़ैशन डिज़ाइनर नहीं है, लेकिन मैं यह सुनकर ख़ुश होता हूं कि मैं बढ़िया कपड़े पहनता हूं.’