भारतीय जनता पार्टी आगरा के ताजमहल से जुड़े विवाद (कि वह पहले शिवमंदिर था या नहीं) को भुनाने में लगी है. वहीं केंद्र की नरेंद्र मादी सरकार आगरा को उज़्बेकिस्तान के शहर समरकंद की तरह विकसित करने में लगी है.

सूत्रों के हवाले से आई खबरों की मानें तो जिस तरह उत्तर प्रदेश के वाराणसी को जापान के क्योटो शहर की तरह विकसित किया जा रहा है वैसी ही योजना आगरा के संबंध में है. बताया जाता है कि आगरा की इमारतों और बाग-बागीचों को समरकंद की तरह विकसित करने की योजना पर काम भी शुरू हो चुका है. पिछले हफ्ते ही भारत में पदस्थ उज़्बेक राजदूत फ़रहोद अर्ज़ीव इस सिलसिले में बातचीत के लिए आगरा के दौरे पर गए थे.

इस दौरान उनकी आगरा के महापौर इंद्रजीत बाल्मीकि और नगर निगम के अफसरों से योजना पर विस्तृत बातचीत हुई है. उन्होंने इन बैठकों में इस तथ्य पर ख़ास जोर दिया कि ताजमहल का निर्माण करने वाले 20 हजार कारीगरों और मजदूरों में से बड़ी तादाद समरकंद और ताशकंद से आए लोगों की भी थी. बाल्मीकि ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि आगरा ही नहीं सिकंदरा और फ़तेहपुर सीकरी को भी इस योजना में शामिल किया जाएगा.

ख़बरों के मुताबिक यह योजना इन तथ्यों के आधार पर बनाई गई है कि आगरा और उसके आसपास मौजूद मुग़लकालीन इमारतों और बाग-बागीचों आदि के स्थापत्य का मूल उज़्बेकिस्तान के शहर समरकंद में बताया जाता है. भारत में मुग़ल सल्तनत की स्थापना करने वाले शासक ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर की सत्ता का केंद्र बिंदु भी समरकंद ही था. बाबर इसी शहर से करीब 500 किलोमीटर दूर फ़रग़ना घाटी में पैदा हुआ था.