2014 के मई महीने में जब नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा चुनावों में स्पष्ट बहुमत मिला तो उस वक्त कई लोगों ने यह कहा कि अगले दस सालों तक मोदी को चुनौती दे पाना मुश्किल है. कई विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत से इस धारणा को और मजबूती मिली. हालांकि, दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनावों ने इस धारणा को थोड़ा कमजोर जरूर किया था, लेकिन जिस तरह से दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल लगातार गलत वजहों से खबरों में रहने लगे और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक बार फिर से भाजपा के पाले में आ गए, उससे लगा कि फिलहाल मोदी को कोई चुनौती नहीं दे पाएगा. विपक्ष के तौर पर कांग्रेस के लचर रवैये ने भी इस बात को मजबूती देने का काम किया.

लेकिन पिछले कुछ समय के दौरान कई ऐसी चीजें हुई हैं, जिनके आधार पर ऐसा लग रहा है कि नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री अपने कार्यकाल के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर में हैं. नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी ताकत रही है उनकी वह पहचान जो विकास के साथ जुड़ती है. 2014 के चुनावों में जिस तरह से देश के कारोबारी घरानों ने उनका साथ दिया, वह उनके आर्थिक मोर्चे पर लोकप्रियता को दिखाता है.

1-आर्थिक मोर्चे पर मुश्किलें

इसके बावजूद मोदी सरकार अब आर्थिक मोर्चों पर ही घिरती नजर आ रही है. पिछले साल लिया गया नोटबंदी का फैसला इस सरकार की गले की फांस बनते-बनते रह गया था. लोगों को परेशानी हुई, लेकिन फिर भी बहुत लोगों को यह यकीन था कि इससे फायदा होगा. हालांकि, अर्थव्यवस्था पर इसकी जो मार पड़ी, उसके प्रारंभिक संकेत ही उपलब्ध हैं और आर्थिक जानकारों का एक वर्ग यह मानता है कि इसका असर लंबे समय तक रहेगा.

लेकिन मोदी सरकार की असल फांस बन गया वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी. पहली जुलाई को बड़े उत्सवी माहौल में सरकार ने इसे लागू कराया. इसके अवधारणा और क्रियान्वयन में खामियों का जिक्र करने वालों को पहले मोदी सरकार राजनीतिक भावना से प्रेरित बताकर खारिज किया. लेकिन जब बाद में उसके समर्थक कारोबारी वर्ग और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से दबाव बढ़ा तो जीएसटी में कुछ सुधार किए गए. अब तो खुद राजस्व सचिव और जीएसटी के क्रियान्वयन का जिम्मा उठा रहे हसमुख अधिया ने यह मान लिया है कि जीएसटी से छोटे कारोबारियों को दिक्कत हो रही है और सरकार इसे दूर करने की कोशिश करेगी.

नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात में कारोबारियों ने जीएसटी का जमकर विरोध किया है. सूरत के कपड़ा कारोबारियों को समझाने-बुझाने में केंद्र सरकार ने केंद्रीय मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों को लगा रखा है. कुल मिलाकर स्थिति यह है कि जीएसटी से खुश होने वाले खोजे नहीं मिल रहे और नाराज होने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है.

गुजरात में विधानसभा चुनाव भी होने हैं. इसलिए नरेंद्र मोदी हर हाल में वहां के व्यापारियों को मनाना चाहते हैं. गुजरात की पहचान कारोबारी राज्य की रही है. ऐसे में खुद नरेंद्र मोदी के लिए यह डर है कि कहीं जीएसटी चुनावी मुद्दा न बन जाए. वैसे भी कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी गुजरात में जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स कहकर प्रचारित कर रहे हैं. इसी तर्ज पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री इसे ग्रेट सेलफिश टैक्स करार दे रही हैं.

2-गुजरात में कांग्रेस की नई ताकत

गुजरात में नरेंद्र मोदी और भाजपा बेहद मजबूत रहे हैं. लेकिन इस बार ऐसा लग रहा है कि उन्हें चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर की चुनौती तो पहले से थी ही लेकिन कांग्रेस भी वहां नई ताकत के साथ खड़ी होती दिख रही है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह द्वारा पूरी ताकत लगाने के बाद जिस तरह से राज्यसभा चुनावों में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल जीत गए उसके बाद माना जा रहा है कि कांग्रेस गुजरात में उत्साहित हो गई है.

हाल में जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद हर हफ्ते नई योजनाओं की घोषणा करने गुजरात पहुंचते दिखे, उसे गुजरात में भाजपा के समक्ष पैदा हुई चुनौतियों से भी जोड़कर देखा जा रहा है. विपक्ष चुनाव आयोग द्वारा गुजरात चुनावों की तारीखों की घोषणा करने में की गई देरी को केंद्र सरकार के दबाव का नतीजा बता रहा है.

3-सोशल मीडिया पर पलटती बाजी

सोशल मीडिया भी नरेंद्र मोदी की बड़ी ताकत रही है. हाल तक सोशल मीडिया पर मोदी के अनुकूल माहौल रहा है और राहुल गांधी जैसे विपक्षी नेताओं का मजाक बनाया जाता रहा है. लेकिन सोशल मीडिया पर भी अब बाजी पलट रही है. गुजरात में कांग्रेस का अभियान ‘विकास पागल है’ बेहद लोकप्रिय हो रहा है. ऐसे ही राहुल गांधी को भी सोशल मीडिया में अब तवज्जो मिलने लगी है. वहीं दूसरी तरफ भाजपा और नरेंद्र मोदी का मजाक उड़ाने वाली पोस्ट भी लगातार बढ़ रही हैं. आलम यह है कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बीते दिनों कहना पड़ा कि कार्यकर्ता सोशल मीडिया में फैल रहे दुष्प्रचार से प्रभावित न हों.

4-जय शाह मामला

नरेंद्र मोदी के हनुमान की पहचान रखने वाले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी विवादों में घिर गए हैं. मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अमित शाह के बेटे जय शाह की कंपनी का कारोबार कई गुना बढ़ने की खबर से भाजपा अध्यक्ष भ्रष्टाचार के मसले पर पहले की तरह आक्रामक शायद ही रह पाएं. अब जब भी वे या उनकी पार्टी दूसरों के भ्रष्टाचार का मामला उठाएंगे, तब जय शाह का मामला भी विपक्ष की ओर से उछाला जाएगा. हालांकि अमित शाह बार-बार यह तर्क देकर इसे खारिज करते रहे हैं कि अगर आरोपों में दम होता तो जय शाह ने यह खबर छापने वाली वेबसाइट पर 100 करोड़ का मुकदमा क्यों किया होता. लेकिन इससे स्थिति में कोई खास फर्क पड़ता नहीं दिखता. गुजरात चुनाव के लिए प्रचार अभियान के दौरान इन दिनों राहुल गांधी ‘शाह-जादा’ शब्द का इस्तेमाल कर भाजपा पर खूब हमले कर रहे हैं.

5-गुरदासपुर लोकसभा उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार की बड़ी हार

ऐसे ही पंजाब के गुरदासपुर लोकसभा उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार की 1.93 लाख वोटों से हार और इस सीट पर कांग्रेस की जीत भी नरेंद्र मोदी के लिए ठीक संकेत नहीं है. 2014 में यह सीट भाजपा के विनोद खन्ना ने जीती थी. लेकिन उनके निधन के बाद यहां चुनाव कराना पड़ा. 2014 में भाजपा द्वारा जीती गई सीट पर इतनी बड़ी हार से कांग्रेस में जहां उत्साह का माहौल है, वहीं भाजपा के लिए यह चिंता बढ़ाने वाली घटना है.

कुल मिलाकर जब नरेंद्र मोदी 2019 लोकसभा चुनावों से तकरीबन डेढ़ साल और अपने गृह राज्य गुजरात में बेहद अहम माने जा रहे विधानसभा चुनावों से महज महीने भर की दूरी पर खड़े हैं तो उन्हें बतौर प्रधानमंत्री सबसे चुनौतीपूर्ण राजनीतिक माहौल का सामना करना पड़ रहा है.