राजस्थान सरकार के नए अध्यादेश के मुताबिक लोकसेवकों और न्यायधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत होने पर बिना सरकार की अनुमति के एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकेगी. क्या इस तरह आप भ्रष्टाचार के पक्ष में खड़ी नहीं हो रही हैं?

सिर्फ खड़ी कहां, मैं तो उनके लिए दंडवत हो रही हूं! अऽअ ...मेरा मतलब कि भ्रष्ट लोगों को किसी के साथ खड़े होने या न होने से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. फर्क हमें पड़ता है. यह ठीक वैसे ही है कि हममें से कोई भ्रष्टाचार में योगदान दे या न दें, भ्रष्टाचार हममें से हर एक के जीवन में अहम भूमिका निभाता है...शरद जोशी भी तो कह गए हैं, ‘हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे!’ जिंदगी, खासतौर से राजनीति के इस अनन्य हिस्से को भला मैं कब तक अनेदखा कर सकती हूं.

इसी अध्यादेश के मुताबिक राज्य सरकार लोकसेवकों और न्यायधीशों के खिलाफ जांच की अनुमति देने के लिए छह महीने का समय ले सकती है. सिर्फ एक अनुमति के लिए यह कुछ ज्यादा समय नहीं है?

इससे कम समय में कोई अपने काले कारनामे ठीक से नहीं छिपा सकता, इसलिए! अब्ब्ब...मेरा मतलब कि शुक्र मनाइये कि छह महीने का ही समय लिया है.

विपक्ष और कुछ नागरिक संगठन तो आपके इस निर्णय को तानाशाही भरा बता रहे हैं.

(मुस्कुराते हुए) विपक्ष की बातों को इतना सीरियसली नहीं लेना चाहिए, क्योंकि कुर्सी बदलते ही उनका स्टैंड भी बदल जाता है. इसे तानाशाही भरा निर्णय वे सिर्फ तभी तक कहेंगे, जब तक कि विपक्ष में हैं. सत्ता में आते ही वे इसका भारी समर्थन करने लगेंगे. रही बात नागरिक संगठनों की, तो वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि यह अध्यादेश भी कुछ नागरिकों के भले के लिए ही है. आखिर लोकसेवक क्या इस देश के नागरिक नहीं हैं. उनके लिए खड़ा होने वाला कोई नागरिक संगठन नहीं है तो क्या मैं भी उनके साथ न खड़ी होऊं! वैसे भी यह तानाशाही तो तब होती जब मैं यह कहती कि लोकसेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच होगी ही नहीं. अब जांच होगी, पर जरा संभलने की पूर्व चेतावनी के साथ!

इस अध्यादेश के चलते कुमार विश्वास ने आपको तुगलक महारानी कहा, इस पर क्या कहेंगी?

(मुस्कुराते हुए) राजकवि का दर्जा न मिलने के कारण वे ऐसा कह रहे हैं!

आपका कार्यकाल काफी मुश्किलों भरा रहा है. आपकी सबसे बड़ी चुनौती क्या रही?

कुर्सी बचाना!...अरे मेरा मतलब कि कोई एक चुनौती हो तो बताऊं...पर जैसे-तैसे कट गया. अब चिंता की कोई बात नहीं, क्योंकि अमित शाह मेरी पीठ थपथपा गए हैं. फिलहाल तो मेरे सामने असली चुनौती अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में अपना नेतृत्व बचाये रखने की है.

वसुंधरा जी, क्या आपको नहीं लगता कि पिछले दो-तीन सालों में किसी एक समुदाय के प्रति हिंसा कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है?

(चिढ़ते हुए) हिंसा सिर्फ खून बहाकर नहीं, काली स्याही बहाकर भी होती है... आप लोगों ने सारे राज्यों में भाजपा की सरकारों के प्रति जो हिंसक रुख अपनाया हुआ है, उसके बारे में आपका क्या ख्याल है?

आजकल गोरक्षकों द्वारा हिंसा की कई घटनाएं हो रही हैं, इस पर क्या कहेंगी?

(खीजते हुए) गोरक्षकों के हमले से कहीं ज्यादा तो किसानों की आत्महत्या हुई है इन सालों में. लेकिन उसकी रिपोर्टिंग तो नहीं की आप लोगों ने. क्यों भला? गोरक्षकों से ज्यादा तो आप मीडिया वाले गायों को लेकर ऑबसेस्ड हो चुके हैं... पिछले 70 सालों में आप लोगों ने गाय शब्द को इतनी बार नहीं लिखा होगा, जितना कि इन दो-तीन सालों में लिखा है. गायों पर उतने कार्टून कभी नहीं बनाए गए, जितने कि अभी बनाए जा रहे हैं. गायों के न तो फोटो कभी अखबारों में छपे और न उतने वीडियो ही कभी अपलोड हुए होंगे...अब आप बताइये कि गायों को लेकर कौन ज्यादा पागल है, गोरक्षक या आप मीडिया वाले?

अच्छा यह बताइये कि आपने इतिहास की किताबों में इतने बदलाव क्यों करवाए हैं?

क्योंकि मैं भूगोल नहीं बदल सकती इसलिए सोचा इतिहास ही बदल दूं!

भीड़ की हिंसा को लेकर आपने अपनी वेबसाइट पर साहित्यिक अंदाज में काफी प्रभावित करने वाला एक लेख लिखा है. क्या आपकी इच्छा लेखिका बनने की भी है?

मोदी जी के राज में पता नहीं कब कौन रिटायर हो जाए, सो मैं साइड बाइ साइड ये भी आजमा रही हूं... ओह्ह्ह... मेरे कहने का अर्थ है कि हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले.

सुनने में आया है कि आपने जाति के आधार पर मंत्रियों की बैठकें की थीं. ऐसा क्यों?

मैं पहली मुख्यमंत्री हूं जिसने जाति की सच्चाई को पूरी कड़वाहट से... मतलब कि गहराई से स्वीकार किया और उससे उसी के अंदाज में निपटा भी है. सहिष्णुता-सहिष्णुता बोलने से समाज में सहिष्णुता नहीं आ जाती. शांति लाने का यह भी एक तरीका है कि जो लोग एक-दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर सकते, उन्हें एक-दूसरे के सामने लाया ही न जाए!

लेकिन क्या इससे जातिवाद को बढ़ावा नहीं मिलेगा?

70 सालों में आज तक किसी ने जाति आधारित मंत्रियों की बैठक नहीं की. क्या इससे जातिवाद बढ़ने से रुक गया? वैसे जतिवाद के बढ़ने की गुजांइश बची कहां है अपने देश में! नामकरण और नौकरी से लेकर, वोटों के देने-लेने का सारा कारोबार तो जाति के नाम पर ही हो रहा है. फिर बचा क्या...,देखिये कबूतर के आंखें मूंद लेने से बिल्ली नहीं चली जाती. हम चाहें तो जाति की अनदेखी कर सकते हैं, पर जाति हमारी अनदेखी कभी नहीं करती! इस देश में जातिवाद की जड़ें भाजपा से भी ज्यादा पुरानी हैं.

वसुंधरा जी, राजस्थान के किसान संगठनों का कहना है कि आपने भी मध्य प्रदेश की तर्ज पर सिर्फ राष्ट्रीय स्यवंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े भारतीय किसान संघ को ही वार्ता के लिए बुलाया और उनसे समझौता कर लिया. आपने ऐसा क्यों किया?

भाजपा की सरकारें आरएसएस से जुड़े किसान संगठन से समझौता नहीं करेंगी, तो क्या दारूल उलूम से जुड़े किसानों से करेंगी! अऽअ... मेरा मतलब कि किसान तो किसान हैं, फिर वे चाहे आरएसएस के सिद्धांतों की खेती करें या फिर फसलों की,... मेरा कहने का अर्थ सिर्फ इतना है कि हमने सभी किसानों की बात सुनी है और उसके हिसाब से ही फैसले किये हैं.

लेकिन मध्य प्रदेश में तो भारतीय किसान संघ से समझौते के बाद ही किसानों का आंदोलन और ज्यादा हिंसक हुआ था. यदि राजस्थान में भी आने वाले समय में ऐसा हुआ तो क्या करेंगी?

हम भी शिवराज सिंह जी की तरह उसे विपक्ष की साजिश बता देंगे और क्या!..अब्ब्ब.. मतलब कि उससे सख्ती से निपटा जाएगा.

क्या आप शिवराज सिंह को किसी मामले में अपना रोल मॉडल मानती हैं?

क्या रोल मॉडल बनने के लिए भाजपा में कोई और नहीं बचा है! अऽअ...मेरा मतलब कि तीन बार मुख्यमंत्री बनने के मामले में तो वे रोल मॉडल हैं ही.

ललित मोदी के साथ आपके कैसे संबंध हैं?

मोदी राज में मोदी से संबंध कैसे हो सकते हैं भला! (हंसते हुए)

आपके हिसाब से भाजपा को विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ना चाहिए या हिंदुत्व के मुद्दे पर?

विकास और हिंदुत्व का नंबर तो तब आयेगा, जब नोटबंदी और जीएसटी के फैले रायते को समेंटेंगे! अब्ब्ब...मेरे कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि मुद्दे तो मुद्दे हैं. जब, जहां, जो गोटी फिट बैठती हो, उसको ही लगा लेना चाहिए,...मेरे कहने का अर्थ है कि हमें किसी एक के बजाय सभी मुद्दों को साथ लेकर चलना चाहिए.

अलगे साल आपके राज्य में भी चुनाव है, आप कौन-से मुद्दे पर चुनाव लड़ना चाहेंगी, हिंदुत्व या विकास?

पहले जरा गुजरात और हिमाचल में देख लें. वहां जिस मुद्दे का सिक्का जमेगा, फिर हम भी वही सिक्का उछाल देंगे.