बीते हफ्ते दो नवंबर एक और वर्षगांठ का दिन था. लेकिन अपने आप में डूबे और खुद से जूझ रहे भारतवासियों को उसकी सुध न रहना स्वाभाविक ही था. सौ साल पहले ब्रिटेन के विदेश सचिव आर्थर जेम्स बेल्फर ने लार्ड रोथ्सचाइल्ड को एक ख़त लिखा. इस खत ने अरब का और खासकर फिलिस्तीन का नक्शा बदल दिया. यह ख़त आज लाखों फिलिस्तीनियों की ज़लावतनी के लिए जवाबदेह है और कई और लाख फिलिस्तीनियों पर इस्राइल के द्वारा हो रह जुल्म के लिए भी जिम्मेवार है.

बेल्फर ने इस ख़त में लिखा कि हिज मेजेस्टी की सरकार फिलिस्तीन में यहूदियों के लिए एक राष्ट्रीय निवास के पक्ष में है और इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेगी. हालांकि इसमें यह भी कहा गया कि ऐसा करते हुए इसका ख्याल रखा जाएगा कि फिलिस्तीन में रहने वाले गैर यहूदियों के नागरिक और धार्मिक अधिकारों को कोई नुकसान न पहुंचे और दूसरे मुल्कों में रह रहे यहूदियों के अधिकारों और राजनीतिक अवस्था पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े.

यह ज़िओनवादियों (फिलिस्तीन में इस्राइल बनाने के लिए आंदोलन चलाने वाले) को ब्रिटेन का खुला समर्थन था. इस ख़त के चार दशक बाद फिलस्तीन पर ‘नकबा’ या कहर टूटा जिसने उन्हें अपने ही वतन में बेगाना बना दिया और वहां इस्राइल नामक राष्ट्र का निर्माण हुआ. उस समय से आज तक फिलिस्तीनी अपनी ही ज़मीन पर एक स्वायत्त राष्ट्र की तरह रहने के हक के लिए लड़े आ रहे हैं लेकिन इस्राइल लगातार उन्हें पश्चिमी तट से भी बेदखल करता जा रहा है.

यहूदियों और इस्राइल का मानना है कि बेल्फर के इस पत्र ने सिर्फ उनके उस अधिकार को स्वीकार किया जो इस भूमि पर हजारों वर्षों से उनका रहा है क्योंकि यह उनकी पवित्र भूमि है.

इस गुजरे दो नवंबर को इस्राइल के प्रधानमंत्री ब्रिटेन पहुंचे और इस ख़त की शताब्दी का जश्न मनाया गया. क्यों न हो, क्योंकि इस ख़त के बिना इस्राइल का वजूद शायद मुमकिन न होता. लेकिन दूसरी तरफ फिलिस्तीनियों ने मांग की है कि ब्रिटेन इस ख़त के चलते ही उन पर जो ज़ुल्म फिछले सत्तर बरस से होता आ रहा है, उसके गुनाह में शरीक ठहरता है. और इसके लिए उसे माफी मांगनी चाहिए.

ब्रिटेन में भी बेल्फर के इस ख़त के खिलाफ एक जनमत है. लेकिन ब्रिटेन में इस्राइल के राजदूत कहना है कि जो भी बेल्फर के इस ख़त की आलोचना करता है वह इन्तिहापसंद है, दूसरे शब्दों में दहशतगर्द है. उनका कहना है कि इस ख़त के विरोध का अर्थ है यहूदियों के राष्ट्रीय निवास का विरोध जिसका सीधा मतलब है इस्राइल के अस्तित्व को अमान्य करना. उन्होंने चेतावनी दी कि यही रुख इरान का और हेज्बुल्लाह का भी है.

ब्रिटेन में ही ब्रिटेन के नागरिकों के खिलाफ इस तरह की जुबान के इस्तेमाल पर ब्रिटिश सरकार ने खामोशी साध ली. पत्रकार रॉबर्ट फिस्क ने अपनी सरकार की खामोशी को शर्मनाक बताते हुए कहा कि इस्राइली राजदूत के मुताबिक़ जो भी बेल्फर के इस पत्र का आलोचक है, वह आतंकवादी, यहूदी-विरोधी या नाजी मान लिया जाना चाहिए और उसे हमास का समर्थक घोषित कर दिया जाना चाहिए.

फिस्क ने याद दिलाया की इस पत्र में एक धोखाधड़ी है और वह यह कि यह यहूदियों के राष्ट्रीय निवास की तो बात करता है लेकिन उस वक्त 60000 यहूदियों के मुकाबले 700000 अरब लोगों के राष्ट्र के अधिकार की कोई चर्चा नहीं करता. वे ध्यान दिलाते हैं कि जहां यहूदी लफ्ज़ का इस्तेमाल है, वहीं न तो अरब और न मुसलमान शब्द का कोई उल्लेख इस पत्र में है. उन्हें सिर्फ ‘पहले से मौजूद समुदाय’ कहकर निपटा दिया गया है.

फिस्क पूछते हैं कि क्या यह बेईमानी न थी कि एक तरफ तो ब्रिटेन अपनी ज़मीन से दूर फिलस्तीन में यहूदियों के राष्ट्र की बात कर रहा था, दूसरी ओर खुद रूस और पूर्वी यूरोप से ब्रिटेन में यहूदियों के आने पर पाबंदी लगाने वाला क़ानून बना रहा था ! क्या बेल्फर यह चाहते थे कि ठन्डे और उदास ब्रिटेन की जगह यहूदी गर्म और उजले अरब प्रदेश का आनंद लें!

क्या यह भी सच नहीं कि हिटलर के कहर से बचकर भाग रहे यहूदियों को पनाह देने की उदारता ब्रिटेन ने न दिखाई, बल्कि उनसे पिंड छुड़ाने के लिए उन्हें फिलस्तीन का रास्ता दिखाया?

क्या यह भी सच नहीं कि पारंपरिक रूप से अरब मुसलमान और यहूदी फिलिस्तीन में शांति से रहते आए थे और अरब मुसलमानों ने उन्हें कभी बेदखल करने की कोशिश नहीं की थी. लेकिन यहूदियों ने अरब मुसलमानों की ज़मीन हड़प कर उन्हें खदेड़ने के लिए क्रूरता और हिंसा का लगातार सहारा लिया?

इस्राइल का यह ख्याल है कि फिलिस्तीनी उसके अस्त्तित्व को मिटा देना चाहते हैं और इसलिए आत्मरक्षा में उसे पहले से हमलावर कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है. अमरीका के खुले समर्थन के चलते अब तक सीनाजोरी के साथ वह फिलिस्तीनियों की ज़मीन पर कब्जा करता जा रहा है. बावजूद अंतर्राष्ट्रीय जनमत के इसके खिलाफ होने के वह ढिठाई से गाजा पट्टी या पश्चिमी तट पर नई-नई यहूदी बस्तियां बसाता जा रहा है. गाजा पट्टी में रह रहे फिलस्तीनी दूसरे दर्जे के इंसानों की तरह किसी तरह अपनी ज़िंदगी बसर कर रहे हैं. लेकिन इस्राइल से दोस्ती करने को बेताब मुल्क अब उनकी चीख या कराह सुनना नहीं चाहते.

इस्राइल एक अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त राष्ट्र है और उसे नक़्शे से मिटाना मुमकिन नहीं. लेकिन वह खुद एक दूसरे राष्ट्र का एक-एक चिह्न मिटाने की जो बेरहमी कर रहा है, क्या वह उसे कभी चैन से बैठने देगी? वह हमेशा ही एक जंग की हालत में रहने को मजबूर है और यह उसने खुद पर ओढ़ा है.

बेल्फर के ऐलान की शतवार्षिकी के मौके पर ब्रिटेन की प्रधानमंत्री ने कहा कि इस ऐलान पर हमें गर्व करना चाहिए. इसके जवाब में फिलिस्तीनी राजनेता हनान अशरावी ने ठीक ही लिखा कि यह ऐलान एक औपनिवेशिक अहंकार का नमूना है जो हजारों मील दूर की भूमि और उस पर रहे लोगों के भाग्य का फैसला करने का अधिकार खुद अपने पास रखता है. इस ऐलान ने यहूदियों के अलावा, जो उस वक्त सिर्फ 11फीसदी थे और जिनकी ज़मीन की मिलकियत 1947 तक सिर्फ सात फीसदी थी, वहां रह रहे मुसलमानों और ईसाईयों को गैर-यहूदी कहकर दूसरे दर्जे पर ढकेल दिया.

बेल्फर के पत्र या ऐलान का विरोध भारत को भी करना ही चाहिए क्योंकि हम उसी ब्रिटिश औपनिवेशिक अहंकार का शिकार रहे हैं, जो फिलिस्तीनियों की विपदा का कारण है. लेकिन आज हम फिलिस्तीन की आज़ादी की चाहत को भूल गए, उसे देखना नहीं चाहते और हथियारबंद इस्राइल के साथ मुस्कराते हुए तस्वीर खिंचाने को बेताब हैं!