बात हाल की ख़बर से शुरू करते हैं. चीन ने संयुक्त राष्ट्र में जैश ए मोहम्मद के सरगना मसूद अज़हर के नाम को वैश्विक आतंकियों की सूची में डाले जाने की प्रक्रिया में फिर अड़ंगा लगा दिया है. यह भारत के लिए बहुत बड़ा झटका है. मसूद अहजर को बीते साल पठानकोट स्थित वायु सेना के बेस पर हुए हमले का मास्टरमाइंड माना जाता है. चीन का कहना है कि अभी इस मसले पर आम सहमति नहीं बनी है.

हालांकि यह कोई पहली बार नहीं है जब चीन ने भारत पर चोट की है. दोनों देशों के रिश्ते यूं तो ईसा पूर्व तक जाते हैं, लेकिन हम बहुत पीछे नहीं जायेंगे. सिर्फ़ 50 के दशक तक ही. बात करते हैं उस साल की जब भारत और चीन के बीच ‘पंचशील’ समझौता हुआ था. यानी, साल 1954 की.

जब मशहूर इतिहासकार वर्तमान नहीं देख पाए

मई 1950 में मशहूर इतिहासकार कावालम माधव पणिक्कर चीन में नियुक्त होने वाले सबसे पहले राजदूत थे. जवाहरलाल नेहरू के विश्वस्त इस दिग्गज की हिंदुस्तान के एकीकरण में भी अहम भूमिका थी. पणिक्कर चीनी नेता माओ त्से तुंग से बेहद प्रभावित थे. अपनी किताब ‘इन टू चाइनास’ में उन्होंने माओ की नेहरू से तुलना की थी. ज़ाहिर है ऐसे में माओ की हर नीति उन्हें नेहरू की नीति ही लगी थी और वो माओ को नेहरू के चश्मे से देख रहे थे.

पांच महीने बाद, यानी अक्टूबर 1950 में चीन ने तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया था. चीन में रहते हुए, यह खबर पणिक्कर को रेडियो से मिली थी. जवाहरलाल नेहरू ने बहुत साफ़ शब्दों में इसकी ख़िलाफ़त नहीं की थी और न ही उन्हें ऐसा लगा था कि देश को चीन से कोई ख़तरा है. पर एक शख्स था जिसने चीन की रणनीति को भांप लिया था.

सरदार पटेल ने चेताया था

सरदार वल्लभभाई पटेल ने नेहरू को आगाह किया कि चीन पर भरोसा नहीं किया सकता और न ही हिंदुस्तान को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य के तौर पर चीन की दावेदारी को बढ़ावा देना चाहिए. पटेल के इस ख्याल को नेहरू ने तरजीह नहीं दी. उनका मानना था कि चीनी साम्यवाद का मतलब यह नहीं हो सकता कि वह भारत की तरफ कोई दुस्साहस करेगा. उन्होंने, तिब्बत हादसे के बावजूद चीन से गहरे रिश्ते बनाने पर जोर ही दिया.

दिसम्बर 1950 में सरदार पटेल चल बसे. चीन पर नेहरू को घेरने वाला अब नहीं रहा था. उधर, चीन ने हिंदुस्तान और उसके बीच मैकमहोन रेखा को विवादास्पद करार दे दिया. उसे यह बात समझ आ रही थी कि जम्मू कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक जाती सीमा रेखा पर भारत की पकड़ नहीं है. उसने ‘भाईचारे’ की रणनीति अपनाकर पैर पसारने शुरू कर दिए. इसी दौरान जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित चीन के दौरे पर गयीं.

विजयलक्ष्मी पंडित और चीनी ‘गांधी’

नेहरू पर अपनी बहन का काफी असर था. ये वही थीं जो हमेशा मानती रहीं कि कमला कौल, जो बाद में कमला नेहरू बनीं, उनके भाई के लिए नहीं बनी थीं. खैर, जब वे चीन गयीं तो माओ और चाऊ-एन-लाई से मिलीं और ख़ासी प्रभावित हुईं. माओ में उन्हें गांधी नज़र आये. दोनों चीनी नेताओं ने उनके सामने एक ऐसा भेष ओढ़ रखा था जिसके पार वे देख ही नहीं पा रहीं थी. उन्होंने नेहरू से ज़िक्र भी किया कि कभी-कभी माओ उन्हें गांधी लगते है और रूसी तानाशाह जोसफ़ स्टॅलिन.

क्या पाकिस्तान भी एक वजह थी?

1948 में देश कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान से दो-दो हाथ कर बैठा था. जवाहरलाल नेहरू पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान से दूरी बनाकर चल रहे थे. सरदार पटेल गुट निरपेक्षता के सिद्धान्त के पक्ष में नहीं थे और न ही रूस के समाजवाद से सहमत. नेहरू को लिखे एक ख़त में उन्होंने कहा था कि अब वक़्त आ गया है जब उन्हें पश्चिम के मुल्कों के साथ अपने ठंडे पड़े रिश्तों की तरफ देखना होगा.

रामचन्द्र गुहा अपनी किताब ‘इंडिया आफ्टर किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि अमेरिका का झुकाव पाकिस्तान की तरफ़ हो रहा था तो संभव है कि नेहरू इस बात से भी कुछ डर रहे थे और ऐसे में चीन में उन्हें अपना साथी नज़र आ रहा था. संभव है. वरना क्या बात थी कि तिब्बत पर चीन की सीनाज़ोरी को नज़रंदाज़ करके वे उससे दोस्ताना ताल्लुक बनाना चाहते थे?

चीन की बौद्ध धर्म के प्रति आस्था क्या इसका कारण थी?

बोद्ध धर्म की उत्पत्ति हिंदुस्तान से हुई थी और हो सकता है कि नेहरू मानते हों कि शांति और भाईचारे के प्रतीक इस धर्म के अनुयायी शायद जंग जैसी बात नहीं सोचेंगे. पर, दूसरी तरफ यह एक दूर की कौड़ी भी लगती है क्यूंकि नेहरू यह भी जानते थे कि चीन के पड़ोसी मंगोलिया से चंगेज़ खान और उसके वंशज भी थे जो बौद्ध धर्म की एक शाखा ‘शमैनिस्म’ के अनुयायी थे. जब चंगेज़ खान दुनिया भर में आतंक मचा सकता है तो बौद्ध धर्म वाले भी ऐसा कर सकते थे.

नेहरू के लिए फ़ैसले की घड़ी थी. उन्होंने पटेल की राय को दरकिनार कर दिया और अपनी बहिन, इतिहासकार पणिक्कर की बात मानकर और पाकिस्तान को देखते हुए चीन के साथ पंचशील के सिद्धान्त पर समझौता कर लिया

पंचशील

अप्रैल 1954 में भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मानते हुए चीन के साथ ‘पंचशील’ के सिद्धांत पर समझौता कर लिया. इस सिद्धांत के मुख्य बिंदु थे:

(1) सभी देशों द्वारा अन्य देशों की क्षेत्रीय अखंडता और प्रभुसत्ता का सम्मान करना

(2) दूसरे देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना

(3) दूसरे देश पर आक्रमण न करना

(4) परस्पर सहयोग एवं लाभ को बढ़ावा देना

(5) शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की नीति का पालन करना

इस सिद्धांत को जोर शोर से प्रचारित किया गया और कई देशों ने इसे मानने की प्रतिबद्धता दिखाई. हालांकि तत्कालीन विदेश सचिव गिरिजा शंकर बाजपेई ने इसकी मुखालफ़त की थी. उन्होंने नेहरू को आगाह किया कि चीन के सामय्वाद और रूस के समाजवाद में कोई ख़ास अंतर नहीं है और दोनों ही विस्तारवाद में यकीन करते हैं. नेहरू ने इस राय को भी अनसुना किया और 1954 में चीन की यात्रा पर निकल पड़े.

चीन द्वारा नेहरू का छद्म स्वागत

जब जवाहरलाल नेहरू चीन पहुंचे तो उनका भव्य स्वागत हुआ. चीनी सरकारी तंत्र ने उनके स्वागत में ज़बरदस्त भीड़ जुटाई जिसे देखकर नेहरू अभिभूत हो गए. वापस आकर उन्होंने देश को यकीन दिलाया कि चीन हिंदुस्तान पर किसी भी प्रकार का आक्रमण नहीं करेगा. चीन को उन्होंने भारत का स्वाभाविक दोस्त बताया.

दो साल बाद चीनी प्रीमियर चाऊ-एन-लाई भारत आये तो उनके साथ तो ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा बुलंद किया गया. चाऊ के साथ तिब्बत के दलाई लामा भी आये थे. उन्होंने नेहरू को तिब्बत में बिगड़ते हालात की जानकारी दी और कहा कि संभव है उन्हें भारत में शरण लेनी पड़े. नेहरू ने जब चाऊ से इस मुद्दे पर बात की तो उन्होंने तिब्बत में हो रही घटनाओं पर ध्यान देने का वादा किया. नेहरू संतुष्ट हो गए.

अक्साई चिन : चीन का कब्ज़ा सच्चा, भारत का दावा झूठा

अक्टूबर 1957 में चीनी अखबार कुंग मिन-जिह-पाओ ने ख़बर छापी कि ‘दुनिया का सबसे ऊंचा राजमार्ग सिनकियांग –तिब्बत हाईवे’ बनकर तैयार हो गया है. इसमें लिखा था कि 20 भारी ट्रक साज़ो-सामान के साथ इसके परीक्षण के लिए तिब्बत की तरफ दौड़े चले जा रहे हैं.

अक्साई चिन को 1842 में ब्रिटेन ने जम्मू-कश्मीर का हिस्सा घोषित किया था. यहां बनी सड़क का मतलब था कि चीन अब हिंदुस्तान के इलाके में से होकर तिब्बत तक जा सकता था. कुछ-कुछ डोकलाम जैसे हालात. जब तक भारत सरकार जागती, देर हो चुकी थी. चीनी सेना ने किलेबंदी कर ली थी. नेहरू ने तब भी कोई विशेष विरोध नहीं जताया. बस जम्मू-कश्मीर के कुछ नक़्शे चीन भेजकर अपनी दावेदारी पेश की. वे शायद भूल गए कि कब्ज़ा सच्चा होता है और दावा झूठा.

दलाई लामा का भारत आना

1959 आते-आते तिब्बत में हालात बिगड़ चुके थे. चीनी सरकार ने दलाई लामा को बातचीत करने के लिए राजधानी पेकिंग बुलाया. दलाई लामा समझ गए कि उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा. अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए की मदद से मार्च 1959 में दलाई लामा अपने कुछ विश्वस्त सैनिकों के साथ भेस बदलकर हिंदुस्तान की सीमा में दाख़िल हो गए. चीन इस बात पर ख़फ़ा हो गया. उसने नेहरू से अपनी नाराज़गी भी ज़ाहिर कर दी. हिंदुस्तान का दलाई लामा को शरण देना चीन से बर्दाश्त नहीं हुआ. ‘पंचशील’ का सिद्धांत ख़तरे में पड़ गया और 1962 आते आते चीन ने देश पर हमला बोल दिया.

इस युद्ध में भारत की करारी हार हुई. साथ ही न सिर्फ अक्साई चिन बल्कि अरुणाचल प्रदेश भी विवाद का विषय बन गया. पंचशील का सिद्धांत औंधे मुंह गिर गया था.