बीते बुधवार को उत्तर प्रदेश के रायबरेली स्थित ऊंचाहार नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी) संयंत्र में बॉयलर पाइप फटने से बड़ा हादसा हुआ. इस हादसे में अपनी जान गंवाने वाले कामगारों की संख्या 32 हो चुकी है. साथ ही, 100 से अधिक लोगों के घायल होने की भी खबर है. इसके अलावा कई ऐसे मजदूर लापता बताए गए हैं, जो हादसे के वक्त काम कर रहे थे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पीड़ितों के परिजनों का आरोप है कि मृतकों और घायलों के सरकारी आंकड़े सही नहीं हैं.

केंद्र सरकार ने मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये और घायलों को 50-50 हजार रुपये की आर्थिक मदद देने की बात कही है. केंद्र के साथ उत्तर प्रदेश सरकार ने भी इन्हें इतनी ही रकम देने की घोषणा की है. साथ ही, इस हादसे की जांच के आदेश भी दिए गए हैं. उधर, बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक मजदूरों ने बताया है कि इकाई में अलार्म सिस्टम भी ठीक से काम नहीं कर रहा था, जिससे वक्त रहते मजदूरों को खतरे की जानकारी नहीं मिल पाई.

इस भयानक हादसे ने औद्योगिक इकाइयों में सुरक्षा मानकों की बदहाली को एक बार फिर सामने ला दिया है. साथ ही, यह हादसा बताता है कि भोपाल गैस कांड में हजारों लोगों की मौत के तीन दशक बाद भी हमारी सरकारों ने कोई सबक नहीं सीखा है. देश के अलग-अलग इलाकों में लगातार औद्योगिक इकाइयों में हादसों की वजह से कामगारों की मौत की खबरें लगातार सामने आती रहती हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े भी इनकी पुष्टि करते हैं. साल 2015 के दौरान पूरे देश में औद्योगिक हादसों में 299 लोगों को जान गंवानी पड़ी थी. इनमें 61 लोगों की मौत बॉयलर और सिलिंडर फटने की वजह से हुई थी.

इस हादसे पर देश के प्रमुख अखबारों ने औद्योगिक इकाइयों में सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किए जाने की ओर ध्यान दिलाया है. संयंत्र परिसर के आसपास आपात चिकित्सा की व्यवस्था न किए जाने को लेकर एनटीपीसी सहित सरकारों की मंशा पर भी सवाल उठाया गया है. इस अहम मुद्दे को अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी के अखबारों ने अधिक जगह दी है. हालांकि, अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी के भी कई बड़े अखबारों के संपादकीय में इसे जगह नहीं मिल पाई है.

बीते शुक्रवार को अमर उजाला ने इस हादसे पर कहा कि 2019 तक हर घर में बिजली पहुंचाने के सरकारी लक्ष्य को देखते हुए एनटीपीसी पर पड़ने वाले दबाव को समझा जा सकता है. अखबार ने संपादकीय में इस सवाल को उठाया है कि इसकी कीमत मजदूरों को अपनी जान देकर क्यों चुकानी चाहिए. मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से इसमें कहा गया है कि प्रभावित इकाई में सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए गए थे. अखबार के मुताबिक बीते कुछ दशकों से श्रम सुधारों पर काफी जोर दिया जा रहा है, लेकिन इसमें मजदूरों की सुरक्षा की चिंता कम ही नजर आती है.

हिन्दुस्तान ने इस हादसे के जरिए औद्यौगिक इकाइयों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी की ओर ध्यान दिलाने की कोशिश की है. बीती तीन नवंबर को प्रकाशित संपादकीय में अखबार लिखता है कि यह इस तरह का कोई अकेला मामला नहीं है. आमतौर पर देश में हर औद्योगिक इकाई के साथ ऐसा ही होता रहा है. इसके अलावा जब विकास तेजी पर हो, तो पहली शर्त यह होनी चाहिए कि हम किसी भी तरह की चूक से होने वाली जानमाल की हानि को कम से कम करने पर सोचें. संपादकीय के आखिर में इस हादसे की स्वतंत्र जांच की पैरवी भी की गई है.

प्रमुख कारोबारी अखबार द इकनॉमिक टाइम्स ने एनटीपीसी इकाई में इस्तेमाल किए जाने वाले कोयले की गुणवत्ता पर सवाल उठाया है. बीते शनिवार को संपादकीय में अखबार का सवाल है कि क्या एनटीपीसी कोयला आपूर्तिकर्ताओं द्वारा निर्धारित की गई गुणवत्ता पर भरोसा कर सकता है. अखबार के मुताबिक कोल इंडिया के खिलाफ खराब कोयले (जिसमें राख की मात्रा अधिक होती है) की आपूर्त्ति करने की शिकायतें सामने आई हैं. बताया जाता है कि प्रभावित इकाई की बॉयलर में राख जमा होने की वजह से यह विस्फोट हुआ. इसके आखिर में अखबार ने एनटीपीसी द्वारा अपनी इकाइयों में संभावित जोखिम और गुणवत्ता मानदंडों का स्वतंत्र मूल्यांकन करवाने पर जोर दिया है.

द हिंदू ने देश में औद्योगिक नियमन को कारोबार करने के रास्ते में एक बाधा माने जाने पर सवाल उठाया है. बीती चार नवंबर को प्रकाशित संपादकीय में अखबार का मानना है कि इसके नतीजे के तौर पर औद्योगिक इकाइयों की अकुशलता और भ्रष्टाचार के मामले सामने आते हैं. साथ ही, अहम सुरक्षा मानकों के मामले सरकारों द्वारा ढिलाई बरतने के मामले भी दिखाई देते हैं. अखबार ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि कारोबार को आसान करने के उपायों का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि इसका नतीजा इकाइयों के नियमन की कमी और लोगों की जिंदगी को खतरे में डालने के तौर पर सामने आए.

जनसत्ता का इस हादसे को लेकर कहना है कि औद्योगिक देशों में उत्पादन की हर प्रक्रिया में सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन किया जाता है. बीते शुक्रवार को संपादकीय में अखबार कहता है कि अपने देश में औद्योगिक इकाइयों में इनकी अनदेखी की जाती है, जिसका उदाहरण ताजा हादसा है. इसके साथ ही कुछ और भी सवाल भी उठाए गए हैं, मसलन- आधी-अधूरी तैयारियों के साथ प्रभावित इकाई को शुरू करने की इतनी हड़बड़ी क्यों थी. अखबार के मुताबिक यदि मान लें कि इसकी पूरी जांच किए जाने और इससे संतुष्ट होने के बाद ही इसे चालू किया गया तो इसके कुछ ही वक्त बाद इतना बड़ा हादसा कैसे हो गया. अखबार लिखता है कि ये सारे सवाल संबंधित अधिकारियों को बेहद असहज करने वाले हैं, जिनका जवाब देना उनके लिए आसान नहीं है.