यश चोपड़ा के बड़े भाई बलदेव राज चोपड़ा (बीआर चोपड़ा) को फिल्मों में ‘नया दौर’ (1957) ने स्थापित किया था. दिलीप कुमार और वैजयंती माला अभिनीत इस फिल्म ने न सिर्फ अपने दौर में गोल्डन जुबली मनाई थी, बल्कि आज भी इसे हिंदी की महान फिल्मों में गिना जाता है. बनने के 50 साल बाद 2007 में इसका रंगीन संस्करण थियेटरों में रिलीज हुआ था और तब भी उसने दर्शकों को लुभाकर साबित किया था कि आदमी और मशीन के बीच की लड़ाई की कहानी आज भी पहले जितनी ही मौजू है.

लेकिन ‘नया दौर’ की नायिका के रोल के लिए वैजयंती माला निर्देशक बीआर चोपड़ा की पहली पसंद नहीं थीं. बलदेव राज चोपड़ा ने तो दिलीप कुमार के अपोजिट उस वक्त उनकी प्रेमिका रहीं मधुबाला को साइन किया था. मधुबाला ने फिल्म के लिए तकरीबन 10 दिन की शूटिंग भी की थी और फिल्म के संगीत निर्देशक ओपी नैय्यर ने खास उनको ध्यान में रखकर आशा भोंसले की आवाज में ‘इक दीवाना आते-जाते हमसे छेड़ करे, सखी री वो क्या मांगे’ के मुखड़े वाला गीत रचा था. लेकिन इनडोर शूटिंग पूरी होने के बाद जब बीआर चोपड़ा एक लंबे आउटडोर शूटिंग शेड्यूल के लिए भोपाल से सटे ग्रामीण इलाके बुधनी में जाने की तैयारी कर रहे थे, तभी मधुबाला के पिता ने उनकी नायिका को साथ भेजने से साफ इंकार कर दिया.

यह वो दौर था जब दिलीप कुमार और मधुबाला का रोमांस परवान चढ़ रहा था और मधुबाला के पिता अताउल्ला खान इस रिश्ते से बेहद खफा थे. इसी के चलते उन्होंने अपनी बेटी को अपनी निगरानी से बहुत दूर कई महीनों के आउटडोर शूटिंग शेड्यूल पर भेजने से मना कर दिया. वे यह भी जानते थे कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया और कई महीनों के लिए दोनों को अकेला छोड़ दिया, तो फिर उनके लिए दिलीप-मधुबाला का रिश्ता तोड़ना नामुमकिन हो जाएगा.

इतिहास जानता ही है कि भविष्य में उनकी मर्जी का ही हुआ, लेकिन उस वक्त बीच भंवर में फंसे बीआर चोपड़ा ने उन्हें लाख मनाने की कोशिशें करने के बाद झुंझलाकर मधुबाला की जगह वैजयंती माला को साइन कर लिया. मधुबाला के पिता को उनका यह निर्णय भी पसंद नहीं आया – क्योंकि वे चाहते थे कि पूरी फिल्म इनडोर ही मुंबई में शूट की जाए – और उन्होंने बीआर चोपड़ा के खिलाफ कोर्ट में केस दर्ज कर दिया.

जैसा कि बीआर चोपड़ा ने बहुत बाद में दिए साक्षात्कारों में बताया कि फिल्म बनने के साथ-साथ ही इस मामले की सुनवाई भी हुई और जज साहब ने उनसे यह भी पूछा कि क्या वे इस फिल्म को सिर्फ इनडोर ही नहीं शूट कर सकते, ताकि मधुबाला भी फिल्म का हिस्सा बनी रहें. अपनी फिल्म के प्रति पूरी तरह ईमानदार बीआर चोपड़ा ने साफ इंकार कर दिया और दिलीप कुमार ने भी उनके पक्ष में ही गवाही दी. इसके बाद बनकर जिस दिन फिल्म रिलीज हुई, उस दिन जज साहब फिल्म देखकर बीआर चोपड़ा के पास आए और कहा कि वे सही थे, यह फिल्म सिर्फ आउटडोर लोकेशन पर ही बन सकती थी. इस तरह बीआर चोपड़ा अपने खिलाफ दायर केस जीते और बाद में मधुबाला ने उनके घर आकर माफी भी मांगी कि वे मजबूर थीं, इसलिए कुछ कर नहीं पाईं.

अगर कर पातीं, तो शायद ‘नया दौर’ के इस कालजयी गीत में आज हम दिलीप कुमार के साथ मधुबाला को देखने का सुख उठा रहे होते.

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