पिछला महीना यानी अक्टूबर इस बार जर्मनी में बहुत ही विध्वंसकारी सिद्ध हुआ. तीन ही सप्ताहों के भीतर दो ऐसे ज़ोरदार तूफ़ान आये कि क़रीब दस लोगों के प्राण तो गये ही, पूरे उत्तरी जर्मनी में हर प्रकार का यातायात कई-कई दिनों तक अस्त-व्यस्त रहा. दोनों बार जर्मनी के बर्लिन, हैम्बर्ग, फ्रैंकफ़र्ट, कोलोन, डोर्टमुन्ड जैसे अनेक बड़े-बड़े शहरों के बीच सारी रेल सेवायें दो-तीन दिनों तक पूरी रह ठप्प रहीं. हज़ारों लोग रेलवे स्टेशनों पर फंसे रहे. तब उन लोगों को भी जलवायु परिवर्तन के सत्य को स्वीकार करना पड़ा, जो अब तक उसे कुछ स्वार्थी तत्वों का खड़ा किया हुआ बखेड़ा बता कर झुठलाया करते थे.

दूसरे तूफ़ान के दो ही सप्ताह बाद, जर्मनी की गंगा के समान ‘राइन’ नदी पर बसे बॉन में, राइन के ही ठीक बायें तट पर, संयुक्त राष्ट्र का 23वां जलवायु सम्मेलन हो रहा है. विश्व भर की सरकारों सहित अनेक ग़ैर सरकारी संगठनों के क़रीब 25 हजार प्रतिनिधि, पत्रकार और प्रदर्शनकारी 6 से 17 नवंबर तक चलने वाले इस महामिलन के लिए बॉन में होंगे.

बॉन संयुक्त राष्ट्र का नया परिसर बना

मात्र तीन लाख की जनसंख्या वाला यह वही बॉन शहर है, जो ढाई दशक पूर्व तक विभाजित जर्मनी के पश्चिमी हिस्से की राजधानी हुआ करता था. इस समय वह जेनेवा ओर पेरिस के बाद यूरोप में संयुक्त राष्ट्र संघ का तीसरा ऐसा अड्डा है, जहां इस विश्व संस्था के 19 विभिन्न अंगों के कार्यालय केंद्रित हैं. इन में से एक, जलवायु परिवर्तन संबंधी संयुक्त राष्ट्र समझौतों (यूएनएफसीसीसी) का सचिवालय भी है. वही इस 23 वें जलवायु सम्मेलन का आयोजक है.

यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि 12 दिसंबर 2015 का दिन एक ऐतिहासिक दिन था. उस दिन, आशाओं-निराशाओं के कई हिचकोलों के बीच पेरिस में विश्व के 197 देशों ने जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के उद्देश्य से तय किया कि 21वीं सदी का अंत आने तक वैश्विक तापमान में वृद्धि को दो नहीं, बल्कि यथासंभव 1.5 डिग्री सेल्सियस तक ही सीमित रखना होगा. देखने में यह लक्ष्य जितना तुच्छ लगता है, तापमान बढ़ने के अनगित वैज्ञानिक कारणों के बारे में सोचने पर उतना ही दूभर प्रतीत होता है.

वैश्विक तापमान में वृद्धि रोकनी होगी

संयुक्त राष्ट्र अंतरशासकीय पैनल के वैज्ञानिकों ने 2009 में सिफ़ारिश की थी की थी कि जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में भीषण प्राकृतिक आपदाएं अगर टालनी हैं, तो 21वीं सदी का अंत आने से पहले ही वैश्विक औसत तापमान, 20वीं सदी की शुरुआत के औसत की तुलना में, दो डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं बढ़ना चाहिये. उदाहरण के लिए, पूरी 20वीं सदी का औसत वैश्विक तापमान 14 डिग्री सेल्सियस था, जबकि इस समय वह बढ़ कर 15 डिग्री हो गया है.

दूसरे शब्दों में, इस सदी के बाकी बचे 83 वर्षों के दौरान पृथ्वी पर औसत तापमान यथासंभव एक डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिये. यह काम कितना कठिन हो सकता है, इसका अनुमान अमेरिकी अंतरिक्ष अधिकरण नासा और वहां के महासागरीय-वायुमंडलीय अधिकरण एनओएए (नेशनल ओशन ऐंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन) के इस अध्ययन से लगाया जा सकता है कि पिछले 35 वर्षों के 17 सबसे गरम वर्षों में से 16 वर्ष 2001 के बाद गिने गये हैं! यानी, 2001 के बाद से हर बीत गया वर्ष और भी गरम सिद्ध हुआ है. वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी थमने का नाम ही नहीं ले रही है.

बिजली उत्पादन में कोयले की खपत घटी

इस बीच केवल इतना ही हुआ है कि ऊर्जा उत्पादन के कारण तापमानवर्धक गैसों का विश्वव्यापी उत्सर्जन 2014 से 2016 के बीच बढ़ा नहीं है. कहा जा रहा है कि एक ऐसे समय में, जब किसी आर्थिक संकट के कारण औद्योगिक उत्पादन घट नहीं रहा हो, 18वीं सदी के उत्तरार्ध में शुरू हुई औद्योगिक क्रांति के बाद से पहली बार यह ठहराव देखने में आया है. संभवतः इसलिए, क्योंकि 2015 के बाद से बिजली उत्पादन के लिए कोयले की खपत, 2016 तक, क़रीब 6 प्रतिशत घट गयी थी.

चीन और भारत ने कोयले से चलने वाले कुल 86 गीगावाट (1गीगावाट =1000000 किलोवाट) के बराबर उत्पादन क्षमता के पुराने तापबिजलीघर बंद किये हैं. अमेरिका और यूरोपीय संघ के देशों ने भी कोयले पर आधारित अपने जिन बिजलीघरों को बंद कर दिया है, उनकी क्षमता 64 गीगावाट के बराबर बतायी जा रही है. कोयले से चलने वाले बिजलीघर तापमान बढ़ाने वाली कार्बन-डाई-ऑक्साइड गैस के मुख्य उत्सर्जक हैं.

जर्मनी अपने लक्ष्य से पिछड़ा

संसार के 30 देशों में सौर और पवन ऊर्जा से बिजली बनाना इस इस बीच तेल, गैस या कोयले से बिजली पैदा करने की अपेक्षा सस्ता पड़ने लगा है. पर वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में अगुआ जर्मनी में, 2009 के बाद से, तापमानवर्धक गैसों का उत्सर्जन घटने की जगह बढ़ रहा है. कोयला आधारित बिजलीघरों को बंद करने में टालमटोल और वाहन यातायात में हो रही बेलगाम बढ़ोतरी के कारण जर्मनी अपने इस स्वघोषित लक्ष्य से पिछड़ने लगा है कि कार्बन-डाई-ऑक्साइड का उसका उत्सर्जन, 1990 की तुलना में, 2020 तक 40 प्रतिशत कम हो जायेगा. फिलहाल वह 30 प्रतिशत के आस-पास अटका हुआ है.

जर्मनी के ही समान बहुत से अन्य देश भी अपने स्वघोषित लक्ष्यों से पीछे ही चल रहे हैं, जबकि 2015 वाले पेरिस समझौते के प्रावधान 2020 से लागू हो जाने हैं. 2020 में सभी देशों की सरकारों को तापमानवर्धक गैंसों के उत्सर्जन में कटौती के ठोस इरादे बताने होंगे. हर पांच वर्ष बाद इन इरादों को और कसना होगा. 2023 से उत्सर्जन में कटौती के नए लक्ष्यों के साथ-साथ उस वित्तीय सहायता का भी हिसाब-किताब देना होगा, जो उदाहरण के लिए विकासशील या अविकसित देशों को मिलेगी.

बॉन सम्मेलन का मकसद

बॉन सम्मेलन को वे व्यावहारिक उपाय सुझाने हैं, जो समझौते को इस तरह लागू करने का मार्ग प्रशस्त कर सकें कि वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को सदी के अंत तक यदि 1.5 नहीं, तब भी अधिकतम दो डिग्री पर रोका जा सके. यदि ऐसा नहीं हो सका, तो न केवल ग्रीनलैंड या ध्रुवों पर की बर्फ पिघल कर समुद्री जलस्तर को ख़तरनाक ठंग से बढ़ाती जायेगी, भयंकर आंधी-तूफानों की बाढ़ आ जायेगी, दक्षिणी अमेरिका के अमेज़न जंगलों का और भारतीय उपमहाद्वीप पर होने वाली मानसूनी वर्षा का संतुलन भी बुरी तरह से बिगड़ जायेगा.

बॉन सम्मेलन को यह भी सुझाव देना है कि जिस भावी जलवायुरक्षा कोष के लिए 2020 से औद्योगिक देश प्रतिवर्ष कुल मिलाकर जो 100 अरब डॉलर अनुदान देंगें, अविकसित और विकासशील देशों को उसका वितरण कैसे किया जाये. इस कोष का निर्माण इन देशों को जलवायु परिवर्तन झेलने लायक बनाने, उनकी ऊर्जा उत्पादन क्षमता को जलवायु-सम्मत ढंग से बढ़ाने और उन्हें जलवायु परिवर्तन के ख़तरों के प्रति संवेदनशील बनाने के उद्देश्य से किया जा रहा है.

फ़िजी को सम्मेलन की अध्यक्षता

इसी को ध्यान में रखते हुए पहली बार प्रशांत महासागर के फ़िजी द्वीप समूह के प्रधानमंत्री फ्रैंक बैनिमारामा को इस जलवायु सम्मेलन का अध्यक्ष बनाया गया है. समुद्री जलस्तर ऊपर उठने से जो देश डूब जाने के सबसे अधिक ख़तरे का सामना करेंगे, उनमें फ़िजी भी शामिल होगा. वहां की कुल लगभग नौ लाख की जनसंख्या में तीन लाख से अधिक हिंदी भाषी भारतवंशी हैं. फ़िजी को 2016 में 320 किलोमीटर प्रतिघंटे तक की गति वाले ‘विन्स्टन’ नाम के भयंकर चक्रवाती तूफ़ान ने एक अरब डॉलर के बराबर नुकसान पहुंचाया था.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पेरिस समझौते को नहीं मानने की घोषणा भले ही कर दी है, पर यह बात 2020 से पहले प्रभावी नहीं हो सकती. अमेरिका के नहीं रहने से तापमानवर्धक गैसों के उत्सर्जन को घटाने का मुख्य भार अब यूरोपीय संघ, चीन और भारत के कंधों पर आ जायेगा. इन देशों में प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष उत्सर्जन की मात्रा अमेरिका से भले ही कहीं कम है, तब भी अपनी अधिक जनसंख्या के कारण उनकी समग्र उत्सर्जन मात्रा अन्य देशों से कहीं अधिक है.

अमेरिका में भी सभी लोग ट्रंप से सहमत नहीं हैं. अमेरिका में कैलिफ़ोर्निया राज्य के गवर्नर जेरी ब्राउन और पूर्व उपराष्ट्रपति एल गोर ने बॉन आने की घोषणा की है. जेरी ब्राउन दो डिग्री से कम तापमान-वृद्धि के अंतरराष्ट्रीय समर्थकों के एक गठबंधन (अंडर 2 डिग्री कोएलिशन) का प्रतिनिधित्व करेंगे. यह गठबंधन विश्व के 188 क्षेत्रों और बड़े-बड़े शहरों के एक अरब 20 करोड़ लोगों की आवाज़ है.

जर्मनी लाव-लश्कर के साथ

सम्मेलन के उद्घाटन के लिए जर्मनी के राष्ट्रपति फ्रांक-वाल्टर श्टाइनमायर, चांसलर अंगेला मेर्कल और पूरे जर्मन प्रतिनिधिमंडल के साथ बर्लिन से एक विशेष ट्रेन द्वारा बॉन पहुंचेंगे. इसे कार्बन-डाई-ऑक्साइड का उत्सर्जन घटाने के स्वघोषित लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाने और कोयले वाले तापबिजलीघरों को बंद करने में जर्मनी के अनमनेपन पर राजकीय लाव-लश्कर का पर्दा डालने के रूप में भी देखा जा सकता है. बॉन सम्मेलन शासनाध्यक्षों का शिखर सम्मेलन नहीं है, हालांकि फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों भी उसे संबोधित करने वाले हैं.

भारत की तैयारियां भी काफ़ी पीछे

जहां तक भारत का प्रश्न है, उसकी भी तैयारियां समय से काफ़ी पीछे ही चल रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नवीकरणीय या अक्षय ऊर्जा के स्रोतों का दोहन करते हुए जलवायु परिवर्तन की रोकथाम करने की शुरू से ही बातें करते रहे हैं. 2022 तक सौर ऊर्जा की सहायता से 100 गीगावाट बिजली पैदा करने का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है. पर, ‘सौ दिन चले अढ़ाई कोस’ की भारत में हमेशा से जो आदत रही है, उसके चलते 2017 के मध्य तक भारत केवल 13 गीगावाट सौर ऊर्जा क्षमता ही विकसित कर पाया था.

13 मेगावाट भी स्थापित क्षमता है, न कि वास्तविक खपत. भारत में सौर ऊर्जा वाली बिजली को संचित करने या सार्वजनिक बिजली संजाल (ग्रिड) से जोड़ कर बड़े पैमाने पर सुलभ करने की कारगर व्यवस्था नहीं होने से केवल 20 प्रतिशत बिजली का ही वास्तविक उपयोग हो पाता है. 80 प्रतिशत क्षमता अनुपयुक्त रह जाती है.

भारत पांच सबसे बड़े देशों की पांत में

इसलिए तापमानवर्धक गैसों को घटाने की दृष्टि से नवीकरणीय ऊर्जा का भारत में वह दूरगामी प्रभाव नहीं हो पा रहा है, जो होना चाहिये. तब भी यह एक चमत्कार ही होगा, यदि अगले चार वर्षों में भारत 100 गीगावाट सौर बिजली का लक्ष्य प्राप्त कर लेता है. यदि सौर और पवन ऊर्जा की भारत की सम्मिलित क्षमता को देखें, तो वह भी इस समय केवल 58 गीगावाट है. इसके बावजूद इस मामले में भारत संसार के पांच सबसे बड़े देशों में गिना जाता है.

भारत ने वादा किया है कि उसकी बिजली उत्पादन क्षमता में नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा 2030 तक 40 प्रतिशत हो जायेगा. इस समय यह केवल 18 प्रतिशत है. इसलिए हो सकता है कि भारत को बॉन में दो वर्ष पूर्व के अपने लक्ष्य को घटाने के लिए सौदेबाज़ी करनी पड़े. भारत को अपने यहां वाहन यातायात को नियंत्रित करने के उपाय भी गंभीरता से सोचने होंगे. चार पहियों वाला हर वाहन तय की गई हर किलोमीटर दूरी पर कम से कम 120 ग्राम कार्बन-डाई-ऑक्साइड हवा में उछालता है, यानी हर दस किलोमीटर पर क़रीब सवा किलो कार्बन-डाई-ऑक्साइड हवा में फूंकी जाती है. कह सकते हैं कि जलवायु परिवर्तन पर लगाम लगाने का प्रयास केवल सरकारों का ही नहीं, कार-चालकों का भी, बल्कि हर नागरिक का दायित्व है.

हमारा अंतिम ‘बजट’

वैज्ञानिकों ने हिसाब लगाया है कि जलवायु परिवर्तन को पूरी तरह अनियंत्रित हो जाने से बचाने के लिए वैश्विक तापमान को यदि अधिकतम दो डिग्री वृद्धि पर रोकना है, तो वायुमंडल में कुल मिलाकर 3000 गीगाटन से अधिक कार्बन-डाई-ऑक्साइड गैस नहीं होनी चाहिये.

2000 गीगाटन मानव जाति अब तक हवा में उड़ा चुकी है. केवल 1000 गीगाटन की गुंजाइश बच रही है. यही है हमारा अंतिम ‘बजट.’ इससे अधिक हम ख़र्च नहीं कर सकते. यह बजट भी, आज की गति नहीं बढ़ने पर भी, अगले 30 व्रषों में ही चुक जायेगा. ठीक इस समय हम वर्ष-प्रतिवर्ष 36 गीगाटन कार्बन-डाई-ऑक्साइड हवा में उछाल रहे हैं, इससे न केवल तापमान बढ़ रहा है, सांस लेने की हवा भी प्रदूषित हो रही है.