देश के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने एक चिट्ठी लिखकर सुप्रीम कोर्ट और सभी 24 हाई कोर्टों से कहा है कि वे पांच साल से अधिक समय से लंबित मामलों की तेजी से सुनवाई कर फैसला सुनाएं. उन्होंने अदालतों से कहा है कि वे शनिवार के दिन पांच साल से ज्यादा वक्त से जेल में बंद लोगों की अपीलों पर सुनवाई करें. लंबित मामलों के निपटारे में देरी पर मुख्य न्यायाधीश का कहना था कि यह पूरी न्यायिक व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल है.

बीते मंगलवार सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एमबी लोकुर और न्यायाधीश दीपक गुप्ता की पीठ ने भी अंडर ट्रायल रिव्यू कमेटी के संबंध में कई दिशानिर्देश जारी किए. पीठ ने कहा है कि जेल अधिकारियों की इसमें भागीदारी सुनिश्चित करने के साथ ही इसकी संचालन प्रक्रिया सही की जाए. इस समिति का गठन हरेक जिले में अंडरट्रायल (सुनवाई का इंतजार कर रहे) कैदियों के बारे में सुझाव देने के लिए किया गया है. शीर्ष अदालत ने अंडरट्रायल मामलों को कैदियों के अधिकार का पूरा उल्लंघन बताया. उधर, केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल का कहना था कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जेलों के इंस्पेक्टर जनरल (आईजी) की 16 नवंबर को बैठक बुलाई है.

इससे पहले बीती 10 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से अंडरट्रायल कैदियों के बारे जवाब-तलब किया था. शीर्ष अदालत ने इनसे सवाल किया था कि आखिर जेल में बंद उन कैदियों की रिहाई क्यों नहीं हुई, जिन्हें रिहा करने की सिफारिश की गई थी. 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को ऐसे अंडरट्रायल कैदियों को रिहा करने का आदेश दिया था, जो उनके ऊपर लगे जुर्म के आरोपों के एवज में मिलने वाली आधी सज़ा काट चुके हैं, लेकिन उनकी सुनवाई शुरू नहीं हुई है. 10 अक्टूबर को शीर्ष अदालत ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि जेल में क्षमता से अधिक कैदी होने के बावजूद इन्हें रिहा नहीं किया जा रहा है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा बीते साल जारी आंकड़ों को देखें तो अंडरट्रायल मामले देश की न्यायिक व्यवस्था के लिए अभी भी एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं. ऐसे कैदियों के अधिकारों के उल्लंघन के साथ-साथ सजायाफ्ता कैदियों के भी कई अधिकारों का उल्लंघन होता हुआ दिखता है. देश की कुल 1401 जेलों की क्षमता 3.67 लाख कैदियों की है. लेकिन 2015 के आखिर तक के आंकड़े बताते हैं कि इनमें फिलहाल 4.2 लाख कैदी रह रहे हैं जो क्षमता से करीब 15 फीसदी अधिक है. इनमें अंडरट्रायल कैदियों की हिस्सेदारी 67 फीसदी (2.82 लाख) है.

अलग-अलग राज्यों में अंडरट्रायल कैदियों की संख्या | साभार : एनसीआरबी
अलग-अलग राज्यों में अंडरट्रायल कैदियों की संख्या | साभार : एनसीआरबी

एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है कि 31 दिसंबर, 2015 तक मुसलमान, दलित (एससी) और आदिवासी (एसटी) तबके से आने वाले अंडरट्रायल कैदियों की संख्या ऐसे कुल कैदियों की संख्या के आधे से भी अधिक है. देश की आबादी में इन तबकों की भागीदारी का आंकड़ा करीब 36 फीसदी है. मुसलमान अंडरट्रायल कैदियों की संख्या 20.9 फीसदी. दूसरी तरफ देश की आबादी में इस समुदाय की भागीदारी 13.4 फीसदी है. हिंदुओं में जातिगत आधार पर देखें तो अंडरट्रायल कैदियों में 21.6 फीसदी दलित और 12.4 फीसदी आदिवासी हैं. उधर, इनकी देश की आबादी में कुल हिस्सेदारी करीब 23 फीसदी है.

एनसीआरबी के मुताबिक कुल अंडरट्रायल कैदियों में से 80,528 अनपढ़ हैं. 1,19,082 दसवीं पास हैं जबकि 58,160 बारहवीं और 16,365 स्नातक पास हैं. स्नातक से अधिक पढ़ाई करने वाले कैदियों की संख्या 5,225 है. इन कैदियों की उम्र देखें तो 48 फीसदी 18 से 30 साल के बीच के हैं. इसके अलावा 30 से 50 साल के अंडरट्रायल कैदियों की संख्या 41 फीसदी है. इन आंकड़ों को देखने से यह साफ होता है कि जिस उम्र में ये अपनी जिंदगी बनाने के साथ-साथ देश के विकास में योगदान दे सकते थे, उस उम्र में ये न्यायिक प्रक्रिया में देरी का दंश झेल रहे हैं.

जेल में काटे गये वक्त के आधार पर अंडरट्रायल कैदियों का प्रतिशत| साभार : एनसीआरबी
जेल में काटे गये वक्त के आधार पर अंडरट्रायल कैदियों का प्रतिशत| साभार : एनसीआरबी

2015 में इससे बीते साल की तुलना में अंडर ट्रायल कैदियों की संख्या में 0.3 फीसदी की मामूली गिरावट दर्ज की गई. हालांकि, कई ऐसे राज्य हैं जहां इनकी संख्या में बढ़ोतरी देखी गई है. इनमें मध्य प्रदेश (11 फीसदी), पश्चिम बंगाल (9.2 फीसदी) और महाराष्ट्र (8.9 फीसदी) शामिल हैं. दूसरी ओर, पंजाब में ऐसे कैदियों की संख्या में 15.7 फीसदी गिरावट दर्ज की गई है. इसके बाद तमिलनाडु में यह आंकड़ा 13.1 फीसदी और बिहार में 12.6 फीसदी है. राज्यवार देखें तो 2015 के अंत तक अंडरट्रायल कैदियों की सबसे अधिक संख्या उत्तर प्रदेश (62,669), बिहार (23,424), महाराष्ट्र (21,667) और मध्य प्रदेश (21,300) में है.

एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है कि अंडरट्रायल कैदियों में से 35.2 फीसदी (करीब एक लाख) ऐसे हैं जिन्हें जेल में आए कम से कम तीन महीने हो चुके हैं. दूसरी ओर, जेल में जिंदगी के तीन साल से पांच साल तक वक्त काट चुके ऐसे कैदियों की संख्या 11,451 है. सुनवाई पूरी होने के इंतजार में पांच साल से अधिक वक्त बिताने वालों का कैदियों का आंकड़ा 1.3 फीसदी (3,599) है. उत्तर प्रदेश (1364) और पश्चिम बंगाल (294) की जेलों में पांच साल से अपनी सुनवाई पूरी होने का इंतजार कर रहे कैदियों की संख्या सबसे अधिक है.

एनसीआरबी की रिपोर्ट देखें तो न्यायिक व्यवस्था की देरी का दंश केवल आरोपित को ही नहीं बल्कि, उनके बच्चों को भी सहना पड़ रहा है. आंकड़ों के मुताबिक 1149 महिलाओं के साथ उनके 1310 बच्चे भी बंद जेल की हवा खाने को मजबूर हैं. इसके अलावा 3795 विदेशी भी भारत में अपनी सुनवाई पूरी होने के इंतजार में हैं.