साल 1991, मार्च का बाइसवां दिन, मुंबई (जो तब बॉम्बे था). टाटा हाउस के सबसे अहम दफ़्तर की सेक्रेटरी एक के बाद एक फ़ोन करके देश भर में फैले अपनी कंपनी के कारोबारी प्रमुखों को एक अहम मीटिंग के समय में तब्दीली की जानकारी दे रही थी. टाटा समूह के मुखिया जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा या जेआरडी का आदेश था कि जो मीटिंग 27 मार्च को होनी थी वह अब 25 मार्च को होगी.

टाटा हाउस के चौथी मंज़िल के सबसे बड़े बोर्डरूम में मीटिंग चल रही थी. टाटा समूह की हर कंपनी के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर आये हुए थे. एसीसी के नानी पालकीवाला, टाटा कैमिकल्स के दरबारी सेठ, ताज होटल्स के अजीत बाबूराव केरकर और टाटा स्टील के उप चेयरमैन रतन टाटा सहित सभी वहां थे. बॉम्बे डाइंग के नुस्ली वाडिया सहित और भी कई डायरेक्टर थे. जो नहीं थे, वे थे जेआरडी के सबसे चहेते और टाटा स्टील के चेयरमैन रूसी मोदी.

जिस तरह के कयास लग रहे थे वही हुआ. जेआरडी ने रतन टाटा का नाम टाटा संस के नए चेयरमैन के तौर पर प्रस्तावित किया. टाटा संस के सबसे बड़े शेयर धारक पालून जी शापूर जी मिस्त्री ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया. रतन टाटा की ताजपोशी हो गयी .

उस दिन के बाद से रतन टाटा और टाटा समूह के बाकी क्षत्रपों के बीच जो जंग हुई उसे किसी भारतीय कारोबारी कंपनी के भीतर चली वर्चस्व की सबसे दिलचस्प जंग माना जाता है. इस जंग का होना भी लाजमी था. क्षत्रप भी एक से बढ़कर एक थे और कुर्सी भी देश के सबसे प्रतिष्ठित समूह की थी.

इस लड़ाई को समझने के लिए तब के हालात पर भी एक नजर डालना बेहतर रहेगा. जेआरडी के समय टाटा संस की समूह की कंपनियों पर पकड़ ढीली थी. किसी-किसी कंपनी में तो उसकी हिस्सेदारी महज दो फीसदी ही थी. बल्कि टाटा की कई कंपनियों में टाटा संस से ज्यादा हिस्सेदारी बिरला समूह की कंपनी पिलानी इन्वेस्टमेंट्स की थी! पालून जी शापूर जी मिस्त्री टाटा समूह के सबसे बड़े शेयर धारक थे. पर समूह की हर कंपनी पेशेवराना अंदाज़ में चलायी जाती थी इसीलिए हर क्षत्रप ‘लार्जर देन लाइफ’ की छवि रखता था. आइये, देखते हैं कैसे रतन टाटा ने इन के ख़िलाफ़ जीत हासिल की.

रतन टाटा बनाम टाटा स्टील के रूसी मोदी

जब रतन टाटा ने कारोबार संभाला उस वक्त टाटा समूह में कुल 84 कंपनियां थीं. सालाना कुल बिक्री थी 24 हज़ार करोड़ रुपये. इसमें टाटा स्टील्स का योगदान लगभग 23 फीसदी था. इसमें कोई शक नहीं कि इसके मुखिया रूसी मोदी देश के सबसे क़ाबिल चेयरमैनों में से एक थे. वे कहा करते थे कि हैरो (इंग्लैंड के सबसे प्रतिष्ठित पब्लिक स्कूल) से इस सदी में सिर्फ तीन ही महान लोग पढ़े हैं- विंस्टन चर्चिल, जवाहरलाल नेहरू और वे खुद. कुछ लोग इसे उनका स्टाइल कहते थे तो कुछ दंभ.

ये वही रूसी मोदी हैं जिन्हें नेहरू और एडविना माउंटबेटन की मोहब्बत का राज़दार भी कहा जाता था. खैर, उस किस्से को यहीं छोड़ते हैं. जेआरडी की पहली पसंद रूसी ही थे जिन्हें टाटा संस का चेयरमैन बनाने के लिए उन्होंने पहला दांव तब खेला जब उन्होंने रूसी को समूह की दुसरे नंबर की कंपनी टेल्को, जो अब टाटा मोटर्स है, का चेयरमैन बनाने का मन बनाया.

दो बड़ी कंपनियों के चेयरमैन बनते ही रुसी टाटा संस के सबसे ताकतवर व्यक्ति हो जाते. इससे उनकी ताजपोशी की राह आसान हो जाती. लेकिन माना जाता है कि यहीं वे ग़लती कर बैठे. ख़बर लीक हो गयी. एक अखबार को दिए इंटरव्यू में बड़बोले रूसी और उनके समर्थक तब मुश्किल दौर से गुज़र रही टेल्को के कायापलट का प्लान साझा करने लगे.

उन दिनों टेल्को कंपनी के तत्कालीन चेयरमैन सुमंत मुलगांवकर की तबियत ठीक नहीं चल रही थी. कहते हैं कि संभावित तख्ता पलट की ख़बर उन तक पहुंची तो वे उखड़ गए. उन्होंने तुरंत चार्ज संभाल लिया और बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स के सामने रतन टाटा को उप चेयरमैन बनाने का प्रस्ताव दिया. प्रस्ताव मंज़ूर हो गया.

जानकारों के मुताबिक जेआरडी चाहते थे कि रतन, सुमंत मुलगांवकर की सरपरस्ती में यह पद न लेकर रूसी के चेयरमैन बनने के बाद उनके नीचे काम करें. उन्होंने रतन को समझाया भी. पर रतन टाटा ने दिलेरी दिखाते हुए जेआरडी और रूसी को मना करके मुलगांवकर की सरपरस्ती में उप चेयरमैन बनना कुबूल कर लिया. वे मुलगांवकर की बेहद इज्ज़त करते थे. टेल्को कंपनी में बतौर उप चेयरमैन उनका काम शानदार रहा. एक वक़्त ऐसा भी आया जब टेल्को टाटा स्टील को पछाड़कर समूह की नंबर एक कंपनी बन गयी. जेआरडी ने मन बदल लिया. अब वे रतन टाटा को पसंद करने लगे थे.

रूसी मोदी ने दूसरी ग़लती तब की जब उन्होंने अपने चहेते आदित्य कश्यप को टाटा स्टील का मैनेजिंग डायरेक्टर नियुक्त कर दिया और इसके लिए बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स की मंजूरी तक नहीं ली. रतन टाटा ने डायरेक्टरों पर अपना प्रभाव दिखाते हुए इस नियुक्ति को खारिज़ करवा दिया और कश्यप की जगह जेजे ईरानी को टाटा स्टील्स का मैनेजिंग डायरेक्टर बनवा दिया. कहते हैं कि रूसी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह को अपनी तरफ मिलाने की कोशिश की जो नाकाम रही.

इसके कुछ दिनों बाद टाटा स्टील की सालाना मीटिंग हुई और कंपनी के नतीजों ने जेजे ईरानी को देश का ‘स्टीलमैन’ और रतन टाटा को ‘बिज़नसमैन ऑफ़ द इयर’ का ख़िताब दिया. मशहूर किस्सा है कि जब रूसी से पुछा गया कि उन्हें क्या मिला तो उनका जवाब था, ‘मुझे साल का सबसे बड़ा बम्बू (बांस) मिला है!!!!’ इसी दौरान रतन टाटा ने समूह की हर कंपनी के कार्यकारी डायरेक्टरों और अन्य के रिटायरमेंट की उम्र 65 साल करवा दी और ग़ैर कार्यकारी पद पर रहने की अधिकतम उम्र 75 वर्ष. इसके तहत चेयरमैन भी आते थे. रूसी मोदी की उम्र अब नज़दीक थी. उन्होंने इसके ख़िलाफ़ भी लामबंदी की पर वे नाकामयाब हुए. उनके जाने का वक़्त तय हुआ 21 मई, 1993. पर किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था.

रूसी मोदी ने तीसरी और अंतिम ग़लती की. एक और अखबार को इंटरव्यू देकर उन्होंने रतन टाटा और टाटा स्टील्स के मैनेजिंग डायरेक्टर जेजे ईरानी पर भारी गड़बड़ियों का आरोप लगाया. आनन-फ़ानन में आपातकालीन बैठक बुलाई गयी. वह दिन था 19 अप्रैल, 1993. बैठक में समूह के क़ानूनी सलाहकार नानी पालकीवाला ने इस पर घोर आपत्ति जताई. वही पालकीवाला जो देश के सबसे बड़े कानूनविदों में से एक हुए हैं. टाटा समूह के पास ऐसे-ऐसे हीरे थे.

रतन टाटा ने भी इस बैठक में रूसी के वक्तव्य पर एतराज जताया. हालात बिगड़ते देख रूसी मोदी हवा में कागज़ लहराकर और ‘मैं ये मीटिंग अब बर्खास्त करता हूं’ कहकर चले गए. रूसी की बदतमीज़ी बर्दाश्त के बाहर थी. तुरंत प्रभाव से रुसी मोदी को बर्खास्त करके रतन टाटा को टाटा स्टील्स का चेयरमैन नियुक्त कर दिया गया. इस तरह से रतन टाटा ने अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंदी को मात दी.

रतन टाटा बनाम टाटा कैमिकल्स के दरबारी सेठ

कम ही लोगों को मालूम है कि टाटा समूह में एक संस्था है जिसका नाम है; टाटा एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेज (टेस). अक्सर इस संस्था से निकले हुए प्रबंधक ही समूह की कंपनियों के सर्वोच्च पद तक जाते हैं. दरबारी सेठ पेशे से कैमिकल इंजिनियर थे और इस संस्था से पढ़े थे.

टाटा कैमिकल्स, टाटा आयल एंड मिल्स कंपनी (टॉमको) और टाटा टी को मुनाफ़े में लाने वाले दरबारी सेठ एक समय पर जेआरडी के ख़ासमख़ास माना जाते थे. सत्तर और अस्सी के दशक में दरबारी सेठ पेट्रोकैमिकल्स के क्षेत्र में आने का प्रयास कर रहे थे पर कामयाबी नहीं मिल रही थी. तभी पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु की लेफ्ट सरकार ने हल्दिया में एक पेट्रोकैमिकल प्लांट लगाने का फ़ैसला किया. इसी दौरान आरपीजी ग्रुप, रिलायंस और अन्य के बीच हुई खींचतान में दरबारी सेठ न जाने कहां से आये और बाज़ी ले गए.

अस्सी के दशक में जेआरडी ने रतन टाटा को भविष्य के लिए रणनीति बनाने को कहा था. रतन ने इसमें कुछ नए व्यवसाय जोड़ने का प्लान दिया था तो कुछ को बेचने का. वे टॉमको कंपनी को हिन्दुस्तान यूनीलीवर को बेचना चाहते थे. दूसरी तरफ कंपनी के मुखइया दरबारी सेठ डिटरजेंट बनाकर यूनीलीवर से दो-दो हाथ करना चाहते थे.

बताते हैं कि रतन टाटा ने दरबारी सेठ से पार पाने की ठान ली. दरबारी सेठ की उम्र भी 65 के पास आ गयी थी तो उनपर रिटायरमेंट की पालिसी की तलवार लटका दी गई. सेठ ने ज़्यादा तीन-पांच नहीं किया और चलते बने. पर कहते हैं कि जाते-जाते उन्होंने रतन टाटा को इस बात के लिए राज़ी कर लिया कि उनकी जगह उनके बेटे मनु सेठ को टाटा केमिकल्स का मैनेजिंग डायरेक्टर नियुक्त किया जाए. ऐसा ही हुआ भी.

रतन बनाम बनाम ताज होटल्स के चेयरमैन अजीत केरकर

अजीत बाबूराव केरकर ने भी रूसी मोदी और दरबारी सेठ की तरह टाटा संस के हस्तक्षेप के बिना अपना साम्राज्य खड़ा किया था. एक होटल से शुरुआत करने वाले केरकर ने ताज होटल्स को देश का नंबर एक होटल समूह बना दिया था. 1997 में ताज ग्रुप के पास लगभग 60 होटल थे और लगभग 525 करोड़ रु का टर्नओवर. केरकर और ताज होटल्स एक दूसरे के पर्यायवाची थे.

बताते हैं कि अति-आत्मविश्वासी केरकर रतन टाटा को होटल व्यवसाय में एक नौसिखिया मानते थे. ऐसा यकीनन था भी. रतन ने ज़्यादातर वक़्त टेल्को, टाटा स्टील्स और नेल्को जेसी कंपनियों में बिताया था. पर कॉर्पोरेट राजनीति में वे केरकर से कहीं आगे थे. महज़ 11 मिनट में उन्होंने अजीत केरकर का साम्राज्य तहस नहस कर दिया था. इसके पीछे उनकी सटीक रणनीति और तकरीबन छह सालों की मेहनत थी जो अंततः एक चिठ्ठी के ज़रिये जीत में तब्दील हुई.

किस्सा है कि जनवरी 1997 में तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम और रतन टाटा के पास एक ख़त आया. इसमें लिखा था कि केरकर और ताज होटल्स के कुछ मुख्य कर्मचारियों ने मिलकर ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से 100 करोड़ रुपये बाहर निवेश किये हैं. यह विदेशी मुद्रा विनियमन एक्ट (फ़ेरा) का उल्लंघन था.

सरकार के हरकत में आने से पहले रतन टाटा ने अपनी टीम को तहकीकात में लगा दिया. यहां भी नानी पालकीवाला उनकी सहायता को आये. उन्होंने बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स के सामने सिद्ध कर दिया कि अजीत केरकर ने ट्रैवल कंपनी कॉक्स एंड किंग्स की हिंदुस्तान की शाखा में निवेश किया है, और इसके लिए उन्होंने ताज होटल के मुद्रा विनियमन विभाग के ज़रिये ट्रैवल कंपनी के शेयर ख़रीदे और फिर अपने परिवार के सदस्यों को सस्ते दाम पर बेच दिए. इससे ताज होटल्स को लाखों का नुकसान हुआ.

रतन टाटा हमला बोलने के लिए तैयार थे. 28 अगस्त 1997 को उन्होंने एक मीटिंग बुलाई जिसमें 65 साल के हो चुके केरकर की जगह अगला चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर चुना जाना था. केरकर इस मीटिंग में नहीं आये. अगली मीटिंग दो सितंबर को रखी गयी. इसमें उनसे इस्तीफ़ा मांग लिया गया. केरकर ने अपने चेहते लेनी मेनेज़ेस को मैनेजिंग डायरेक्टर बनाने का प्रस्ताव दिया जो नामंज़ूर हो गया. तब केरकर ने बोर्ड के सामने 75 साल की उम्र तक ग़ैर-कार्यकारी चेयरमैन बने रहने वाले नियम का हवाला दिया. बोर्ड ने इसे भी ख़ारिज कर दिया. रतन टाटा ताज होटल्स के चेयरमैन बन गए.

बाद में केरकर इस झगड़े को पब्लिक में ले आये तो रतन टाटा ने केरकर पर की गई तहकीकात सार्वजनिक कर दी. वे ख़ामोश हो गए. इस तरह, आख़िरकार, छह सालों तक लड़ने के बाद रतन टाटा, टाटा संस और समूह कंपनियों के सिरमौर बन गए.

2012 में सायरस मिस्त्री रतन टाटा की जगह चेयरमैन बने और महज़ तीन तीन साल बाद ही हटा दिए गए. इस साल पहले ग़ैर पारसी नटराजन चंद्रशेख़रन को समूह का नया चेयरमैन नियुक्त किया गया है. रतन टाटा ने इन दोनों घटनाक्रमों में अहम ज़िम्मेदारी निभाई. कल ही ख़बर आई है कि रतन टाटा पर इसराइल के प्रधानमंत्री को ग़लत तरीके से तोहफे देने का इल्ज़ाम लगा है. कारोवॉर ख़त्म नहीं होता.