मनमोहन सिंह की सरकार में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को ‘सुपर प्रधानमंत्री’ कहा जाता था. यानी वह शख़्स जो सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री को भी दिशा-निर्देश दे सकता था. अब समाचार चैनल टाइम्स नाउ ने एक ऐसी ख़बर दी है जिससे यह कही-सुनी सी बात मजबूत होती दिखती है. ख़बर के मुताबिक सोनिया गांधी ने जून 2004 में तहलका के ख़िलाफ़ चल रही जांच रुकवा दी थी.

ख़बर में बताया गया है कि साल 2001 में समाचार वेबसाइट तहलका डॉट कॉम पर प्रकाशित/प्रसारित एक स्टिंग ऑपरेशन में भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को एक लाख रुपए की नगद रिश्वत लेते दिखाया गया था. यह पैसा उन्होंने सरकार से एक रक्षा सौदा कराने के नाम पर किया था. उस वक़्त केंद्र में प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार थी और समता पार्टी के प्रमुख जॉर्ज फर्नांडिस रक्षा मंत्री थे. यह मामला सामने आने के बाद 2001 में ही वाजपेयी सरकार ने एक आयाेग बनाकर इस मामले की जांच शुरू करा दी.

आयोग की कमान पहले जस्टिस के वेंकटस्वामी के हाथ में थी. लेकिन मार्च 2003 में उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया. इसके बाद जस्टिस एसएन फूकन की अगुवाई वाले आयोग को जांच की ज़िम्मेदारी दी गई. टाइम्स नाउ के मुताबिक इसी बीच 2004 में केंद्र में यूपीए (कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) की सरकार बन गई. तभी तहलका के संपादक तरुण तेजपाल ने पहले सीधे तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखा. इसमें उन्होंने जांच से राहत देने की मांग की. पर मगर उनकी मांग पर चार महीने तक कोई सुनवाई नहीं हुई.

ख़बर के मुताबिक इसके बाद 20 सितंबर 2004 को तेजपाल ने सीधे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखा और उनसे भी यही अपेक्षा की कि उन्हें सरकार की कथित प्रताड़ना से राहत दी जाए. बताते हैं कि सोनिया गांधी ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के अध्यक्ष की हैसियत से अपने लैटरहैड पर 25 सितंबर 2004 को एक पत्र लिखा. इसमें तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम को निर्देश दिया कि तहलका के पत्र पर ‘प्राथमिकता के साथ कार्रवाई’ की जाए. इसके बाद सरकार ने तहलका के ख़िलाफ़ ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) और सीबीडीटी (केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड) आदि जांच वापस ले ली. इसके अलावा फूकन आयोग की अंतिम रिपोर्ट आने से पहले ही मामला सीबीआई को सौंप दिया गया.