अमेरिका में हिंदू धर्म और समाज की दोषपूर्ण छवि दिखाने को लेकर छिड़ा एक दोतरफ़ा आंदोलन अपने अंतिम दौर में पहुंच गया है. कैलिफ़ोर्निया स्टेट बोर्ड ऑफ़ एजुकेशन (एसबीई) स्कूलों के लिए अगले साल से नया पाठ्यक्रम लाने जा रहा है. इतिहास और सामाजिक विज्ञान के विषयों को लेकर हर 10 साल में बदलाव की यह प्रक्रिया होती है. नए पाठ्यक्रम में क्या नए बदलाव करने हैं, इसके लिए बोर्ड का इन्स्ट्रक्शनल क्वॉलिटी कमीशन (आईक्यूसी) सिफ़ारिश करता है. पुराने पाठ्यक्रम में दक्षिण एशिया के इतिहास से संबंधित पुस्तकें भी हैं. इन पुस्तकों में हिंदू धर्म और हिंदू समाज को कथित रूप से ग़लत, भ्रामक तरीक़े से दिखाए जाने को लेकर वहां के कुछ संगठनों ने 2005-06 से आंदोलन छेड़ा हुआ है. ‘हिंदू अमेरिकन फ़ाउंडेशन’ (एचएएफ़), ‘ओबेरॉय फ़ाउंडेशन’ (ओएफ) और ‘हिंदू एजुकेशन फ़ाउंडेशन’ नाम के ये संगठन पाठ्यक्रम में बदलाव की मांग कर रहे हैं.

हिंदू संगठनों का पक्ष

इन संगठनों का कहना है कि मौजूदा पाठ्यक्रम में हिंदू धर्म से संबंधित पुस्तकें पुरानी, अशुद्ध और घिसी-पिटी हैं जिनमें भारतीयों और हिंदुओं की छवि ग़लत तरीक़े से पेश की गई है. संगठन कहते हैं कि पुस्तकें 19वीं सदी के औपनिवेशिक दौर के भारत को चित्रित करती हैं. संगठनों का यह भी दावा है कि स्कूलों में दी जा रही ग़लत जानकारी की वजह से उनके (यानी हिंदू) बच्चों से स्कूलों में ग़लत व्यवहार किया जाता है और उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है.

कुछ समय पहले इन संगठनों ने एक ऑनलाइन याचिका दायर कर लोगों से समर्थन मांगा था. याचिका में कहा गया था, ‘नए ड्राफ़्ट में संवेदनाहीन ढंग से हिंदू देवी-देवताओं को हास्यास्पद तरीके से दिखाया गया है जिससे उनका गलत चरित्र चित्रण हो रहा है. भारत की प्राचीन सभ्यता की उपेक्षा करने के लिए किताबों में आधुनिक दौर की उन तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया है जिनमें झोपड़-पट्टियां और कचरा खाती गाय दिख रही हैं. वहीं, दूसरी प्राचीन संस्कृतियों और धर्मों के बारे में संवेदनशील, सकारात्मक और सौंदर्यपूर्ण ढंग से बताया जाता है.’

हिंदू संगठनों की ऑनलाइन याचिका में दिखाई गई तस्वीर.
हिंदू संगठनों की ऑनलाइन याचिका में दिखाई गई तस्वीर.

इन हिंदू संगठनों के कई सालों से चल रहे इस आंदोलन का प्रभाव यह हुआ कि पिछले साल कैलिफ़ोर्निया एजुकेशन बोर्ड अपने नए पाठ्यक्रम में हिंदू धर्म से संबंधित विषय सूची में कुछ बदलाव करने को राज़ी हो गया. हालांकि संगठन के मुताबिक़ ये बदलाव नाकाफ़ी हैं, लिहाज़ा उनका विरोध जारी है.

दूसरा पक्ष

इस पूरे मामले में दूसरा पक्ष है साउथ एशियन हिस्ट्रीज़ फ़ॉर ऑल (साहफ़ा) नामक संगठन का. अध्यापकों, छात्रों और समुदायों के सदस्यों वाले इस संगठन में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश के सभी धार्मिक समाजों के लोग शामिल हैं. ईश्वर को नहीं मानने वाले यानी नास्तिक भी इस संगठन का हिस्सा हैं. साहफ़ा का कहना है कि हिंदू संगठन अपने धर्म से जुड़े ऐतिहासिक तथ्य ‘छिपाने में हज़ारों डॉलर ख़र्च कर रहे हैं’.

साहफ़ा संगठन के सदस्य
साहफ़ा संगठन के सदस्य

साहफ़ा के मुताबिक़ हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व कर रहे संगठनों के विरोध का एक प्रमुख कारण हिंदू धर्म में जातिवाद की उत्पत्ति है. साहफ़ा का यह भी कहना है कि ये ‘कट्टरपंथी’ हिंदू संगठन नए पाठ्यक्रम में भ्रामक ऐतिहासिक कपोल-कल्पनाओं के ज़रिए अपना धार्मिक एजेंडा चलाना चाह रहे हैं. इनमें ‘पौराणिक सरस्वती नदी को सिंधु घाटी की सभ्यता का हिस्सा बताना, भारत में इस्लाम की शुरुआत इस उपमहाद्वीप पर (मुस्लिम शासकों की) जीत के रूप में दिखाना और ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ बौद्ध और सिख धर्म के संघर्षों से संबंधित विषयों को हटाना’ शामिल हैं.

साहफ़ा का दावा है कि हिंदू संगठन पाठ्यक्रम से उन शब्दों को हटवाना चाहते हैं जो भारत की जातिवादी व्यवस्था की तरफ़ ध्यान खींचते हैं. इनमें जातिवाद की उत्पत्ति के अलावा जाति के नाम पर होने वाले अत्याचार के ख़िलाफ़ सिखों और रविदासियों का अज्ञात संघर्ष और दलित शब्द हटाने जैसी मांगें शामिल हैं. हिंदू संगठनों की तरह साहफ़ा की ऑनलाइन याचिका को भी अच्छा समर्थन मिल रहा है. उसका भी दावा है कि उसकी कई मांगों पर बोर्ड ने सहमति जताई है. उसने मांग की है कि पाठ्यक्रम में बदलाव करते समय बोर्ड ऐतिहासिक सत्यता को ध्यान में रखे.

साहफ़ा की ऑनलाइन पिटिशन की तस्वीर.
साहफ़ा की ऑनलाइन पिटिशन की तस्वीर.

मीडिया कवरेज

भारत में इस मामले को लेकर हुई मीडिया कवरेज में ज्यादातर अमेरिका स्थित हिंदू संगठनों के प्रदर्शनों को जगह दी गई है. साहफ़ा और उसके सदस्यों की मांगें या सुझाव कहीं नहीं दिखते जबकि इस संगठन में सभी धर्मों के लोग शामिल हैं. जिस तरह हिंदू धर्म की छवि को लेकर हिंदू संगठन प्रदर्शन कर रहे हैं, उसी तरह इस्लाम धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाले 15 संगठन भी पाठ्यक्रम को लेकर कई आरोप लगा रहे हैं. इन आरोपों का स्वरूप वैसा ही है जैसा कि हिंदू संगठनों का है. अमेरिका के शीर्ष 15 मुस्लिम संगठनों के एक समूह का कहना है कि कैलिफ़ोर्निया का शिक्षा बोर्ड नए पाठ्यक्रम में ‘इस्लाम-विरोधी सामग्री’ डालने का जिम्मेदार है. बोर्ड को भेजे पत्र में समूह ने कहा है कि इस तरह सामग्री से छेड़छाड़ करने का ख़ामियाज़ा छात्रों, शिक्षकों और पूरे समुदाय को उठाना पड़ता है.

अमेरिका में कैलिफ़ोर्निया और टेक्सास के स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली किताबों के बाज़ार का ख़ासा प्रभाव है. इन राज्यों का पाठ्यक्रम देश के बाक़ी राज्यों के लिए मानक तय करता है. यही वजह है कि साहफ़ा और हिंदू संगठन अपनी-अपनी मांगों को लेकर सालों से प्रदर्शन कर रहे हैं. अब यह तय होने वाला है कि दोनों तरफ़ के इस संघर्ष का परिणाम क्या होगा. अंतिम निर्णय से पहले पुस्तकों को सार्वजनिक समीक्षा के लिए रखा गया था. समीक्षा के बाद सीबीई आठ और नौ नवंबर को निर्णय करने जा रहा है. हिंदू संगठनों और साहफ़ा के प्रदर्शनों के चलते यह देखना दिलचस्प रहेगा कि नए पाठ्यक्रम में कौन सी पुरानी विषय-सामग्री हटाई जाएगी और किन नई चीज़ों को शामिल किया जाएगा.