प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई एक दिन के लिए गए और दो अहम मुलाकातों के बाद वापस लौट आए. उनका डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि से मिलना तो खबरों में छाया रहा लेकिन उनकी एक और मुलाकात के बारे में ज्यादा लोगों को पता नहीं चला. नरेंद्र मोदी ने चेन्नई में करुणानिधि का हाथ पकड़ा तो दक्षिण के सुपरस्टार रजनीकांत से भी उतनी ही गर्मजोशी से मिले.

तमिल भाषा के अखबार ‘दीना थांती’ की 75वीं सालगिरह के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी और रजनीकांत की भी मुलाकात हुई थी. सुनी-सुनाई है कि इस छोटी सी मुलाकात में ही न केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनका हाल-चाल पूछा बल्कि उन्हें दिल्ली आने का न्यौता भी दिया. इसके कुछ घंटे बाद ही चेन्नई के गोपालपुरम इलाके में मोदी भाजपा के विरोधी माने जाने वाले तमिल नेता करुणानिधि से मिले और करुणा के बेटे स्टालिन से भी हाथ मिलाया.

तमिल राजनीति पर नज़र रखने वाले एक पत्रकार की मानें तो ये दोनों मुलाकातें औपचारिकता से कहीं ज्यादा हैं. नरेंद्र मोदी ने करुणानिधि को भी दिल्ली आने का न्योता दिया है और रजनीकांत को भी. इसका एक ही मतलब है, भाजपा की अभी तमिलनाडु में जो स्थिति है वह उम्मीद जगाने वाली नहीं हैं. और 2019 के चुनाव में वह 39 लोकसभा सीटों वाले इस राज्य की अनदेखी नहीं कर सकती. पार्टी का मानना है कि अगले चुनाव में अगर उत्तर या मध्य भारत के किसी हिस्से में हालात ठीक नहीं रहते हैं तो उसकी भरपायी के लिए उसे तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसी जगहों की तरफ देखना ही होगा.

सुनी-सुनाई है कि भाजपा और संघ के नेताओं ने तमिलनाडु में जयललिता के जाने के बाद उपजे हालात पर एक बैठक की थी. इस बैठक में दक्षिण से जुड़े नेताओं को भी बुलाया गया था. बदले हालात में यह राय बनी कि 2019 तक एआईडीएमके बेहद कमजोर हो जाएगी. उस वक्त पलानीसामी और पन्नीरसेल्वम मिलकर भी डीएमके का मुकाबला करने की हालत में नहीं होंगे. इसलिए भाजपा को 2004 से पहले की तरह डीएमके को अपने पाले में लाने और कांग्रेस के पासे से दूर रखने की कोशिश करनी होगी.

जानकारों के मुताबिक कुछ समय पहले तक भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तमिलनाडु में भी भाजपा सरकार स्थापित करने का सपना देख रहे थे. लेकिन संघ के एक नेता किस्सागोई के अंदाज़ में बताते हैं कि देश में तमिलनाडु इकलौता ऐसा राज्य है जो अगले कम से कम दस साल तक किसी भी राष्ट्रीय पार्टी को पूरी तरह कबूल नहीं करेगा. इसलिए यहां के दलों के साथ दोस्ती बनाकर रखना भाजपा की मजबूरी बन गई है.

अब तक भाजपा को सबसे ज्यादा भरोसा रजनीकांत पर था. उसके दो वरिष्ठ मंत्रियों ने बार-बार उनका मन भांपने की कोशिश भी की. लेकिन चेन्नई से हमेशा यह खबर आई कि रजनी कब क्या फैसला करेंगे, शायद वे खुद भी नहीं जानते हैं. इतना जरूर है कि वे सियासत में आए तो भाजपा में शामिल न होकर अपनी ही पार्टी बनाएंगे.

दक्षिण से आने वाले भाजपा के एक वरिष्ठ नेता की कुछ दिन पहले दिल्ली के कुछ पत्रकारों से मुलाकात हुई थी. उन्होंने बताया कि रजनीकांत अभी तक अपना मन नहीं बना पाएं हैं. वे 2019 तक भी ऐसा कर पाएंगे या नहीं, कहना मुश्किल है. ऐसे में भाजपा के सामने दो ही विकल्प है, पहला घटते एआईएडीएमके के साथ रहे या फिर बढ़ते डीएमके से दोस्ती बढ़ाए. भाजपा ने यही हिसाब लगाना शुरू कर दिया है और प्रधानमंत्री मोदी का डीएमके सुप्रीमो करुणानिधि से मिलना इसी हिसाब-किताब की एक अहम कड़ी है. रजनीकांत को भी दिल्ली बुलाने का मतलब एक ही है - एक बार फिर से सर्वोच्च स्तर पर उनका इरादा जानने की कोशिश करना.

तमिलनाडु में डीएमके लगातार दो विधानसभा चुनाव हार चुकी है. जयललिता के गुजर जाने के बाद एआईएडीएमके तीसरी बार सत्ता में वापसी करेगी इसकी उम्मीद बेहद कम है. विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है और ट्रेलर लोकसभा चुनाव में ही दिख जाएगा. इसलिए डीएमके से दोस्ती का आगाज़ हो चुका है.

डीएमके और दिल्ली के बीच इससे पहले तक बातचीत बिलकुल बंद थी. यहां तक कि जून में के करुणानिधि के जन्मदिन पर भी सिर्फ भाजपा के ही किसी नेता को आमंत्रित किया गया था. लेकिन प्रधानमंत्री के करुणानिधि के परिवार से मिलने के बाद अब बातचीत की लाइन खुल गई है. इसका एक नजदीकी फायदा यह हुआ है कि नोटबंदी वाले दिन यानी आठ नवंबर को, डीएमके प्रदेश भर में भाजपा के खिलाफ जो विरोध प्रदर्शन करने जा रही थी, अब पार्टी ने उसे न करने का फैसला किया है.

अगले कुछ महीने तमिलनाडु की सियासत पर नज़र रखनी चाहिए, वहां कुछ ऐसा हो सकता है जिसकी शुरुआत चेन्नई में हो चुकी है.