मंगलवार को रूसी क्रांति के ठीक सौ साल पूरे हो गए. इस मौके को पूरे विश्व के कम्युनिस्ट विचारक गर्मजोशी से याद कर रहे हैं लेकिन रूसी सरकार इसे लेकर उदासीन बनी रही. वहां के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने तो इस अवसर पर आयोजित किसी भी कार्यक्रम में भाग नहीं लिया. पुतिन के प्रवक्ता ने बताया कि राष्ट्रपति के लिए आज का दिन सामान्य कामकाज का ही दिन रहा और वे अपनी पूर्व निर्धारित बैठकों में व्यस्त रहे. रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी के पूर्व एजेंट पुतिन 1991 तक कम्युनिस्ट पार्टी के नेता रहे हैं, पर उसके विघटन के बाद उन्होंने उससे दूरी बना ली. जानकारों के अनुसार वे रूस के विघटन के लिए कम्युनिस्ट पार्टी को जिम्मेदार मानते रहे हैं.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार आज राजधानी मॉस्को के ऐतिहासिक लाल चौक पर सैन्य परेड का आयोजन किया गया लेकिन राष्ट्रपति ने इसमें शिरकत नहीं की. समारोह का सरकारी टेलीविजन पर सीधा प्रसारण तक नहीं हुआ. वहीं इस परेड में 1917 के ऐतिहासिक बोल्शेविक क्रांति के बजाय द्वितीय विश्वयुद्ध में सोवियत रूस की भागीदारी का जश्न मनाने पर ज्यादा जोर रहा. ​दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान 1941 में सोवियत सेना ने आज ही के दिन युद्धग्रस्त इलाके की ओर कूच किया था.

इससे पहले 1917 में सात नवंबर के ​ही दिन रूस में व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में दुनिया में पहली बार कहीं कम्युनिस्ट पार्टी का शासन स्थापित हुआ था. जार के शासन को हटाकर मजदूरों की सत्ता कायम करने वाली इस क्रांति को ‘बोल्शेविक क्रांति’ का नाम दिया गया. तब से आज तक पूरी दुनिया के कम्युनिस्टों के लिए यह घटना प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है. वैज्ञानिक समाजवाद के प्रतिपादक कार्ल मार्क्स के सिद्धांतों को वास्तविक धरातल पर उतार कर लेनिन भी इसके साथ इतिहास में अमर हो गए. यह क्रांति आज भी पूरी दुनिया के साम्यवादी नेताओं के लिए अनुकरणीय बनी हुई है.

इस क्रांति का महत्व इसलिए भी है कि कभी कमजोर देश के रूप में जाने जाने वाला सोवियत रूस कुछ साल बाद ही दुनिया के शक्तिशाली देशों में शामिल हो गया था. ​दूसरे विश्वयुद्ध के बाद तो सोवियत रूस का दबदबा इतना बढ़ गया कि पूरी दुनिया संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके साथ दो खेमों में बंट गई. हालांकि 1991 में कई टुकड़ों में बंटने के बाद रूस से साम्यवाद का वह प्रभाव लगातार कमजोर होता चला गया.