हिमाचल प्रदेश में जैसे-जैसे आप व्यास नदी की घाटियों को पीछे छोड़ते हुए सतलुज की घाटियों की ओर बढ़ते हैं, प्रदेश के भूगोल के साथ ही यहां के राजनीतिक माहौल को भी बदलता हुआ देखते हैं. सतलुज के बहाव के विपरीत दिशा में आप जैसे-जैसे पहाड़ियां चढ़ते जाते हैं, वैसे-वैसे प्रदेश के सबसे बड़े नेता का प्रभाव भी बढ़ता जाता है. यह क्षेत्र ‘अप्पर हिमाचल’ कहलाता है और इसे राज्य के छह बार मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र सिंह का गढ़ कहा जाता है. इस क्षेत्र की राजनीति को बहुत हद तक वीरभद्र सिंह का व्यक्तिगत जनाधार प्रभावित करता है. इस क्षेत्र में भाजपा के पास कोई भी बड़ा स्थानीय चेहरा नहीं है. हालांकि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता यहां भी भाजपा के काम आती दिखती है.

‘अप्पर हिमाचल’ में दाखिल होते हुए आपके रास्ते में मंडी नाम का एक बड़ा पड़ाव आता है. राज्य की सत्ता तक पहुंचने वाले रास्ते में भी मंडी एक बड़ा और अहम पड़ाव है. हिमाचल में कांगड़ा के बाद मंडी ही वह जिला है जहां से सबसे ज्यादा विधायक यहां की विधानसभा में पहुंचते हैं. कुल दस विधानसभा सीटों वाले इस जिले में इस बार सबसे चर्चित सीट मंडी सदर की है. यहां कांग्रेस की ओर से चंपा ठाकुर चुनाव मैदान में हैं तो भाजपा की ओर से अनिल शर्मा. चंपा ठाकुर प्रदेश के दिग्गज नेता कौल सिंह ठाकुर की बेटी हैं और अनिल शर्मा केंद्रीय संचार मंत्री रहे सुख राम के बेटे हैं. इन दोनों प्रत्याशियों को राजनीति भले ही विरासत में मिली हो लेकिन आज ये दोनों ही अपनी व्यक्तिगत पहचान बना चुके हैं. चंपा ठाकुर जिला परिषद अध्यक्ष हैं तो अनिल शर्मा लगातार पिछले दस साल से मंडी से विधायक हैं.

मंडी के स्थानीय निवासी नरेश कुमार कहते हैं, ‘इस सीट पर इस बार चंपा ठाकुर की स्थिति ज्यादा मजबूत लग रही है. यहां शहरी वोटर सिर्फ 18 हजार हैं जबकि ग्रामीण वोटर 56 हजार. और गांवों से चंपा ठाकुर आगे रहेंगी क्योंकि वे जिला परिषद् अध्यक्ष हैं और उनकी 28 पंचायतें इस विधानसभा क्षेत्र में आती हैं.’ अनिल शर्मा के मुकाबले आपको चंपा ठाकुर की स्थिति इसलिए भी मजबूत लग सकती है क्योंकि अनिल शर्मा हाल ही में कांग्रेस से भाजपा में गए हैं. लेकिन इन समीकरणों के उलट यहां भाजपा की जीत के कुछ ठोस कारण आपको मंडी शहर में ही दुकान चलाने वाले विनोद शर्मा से जानने को मिलते हैं . वे कहते हैं, ‘अनिल शर्मा के पिता इस सीट से पांच बार विधायक रहे हैं और अनिल शर्मा खुद यहां दो बार से जीत रहे हैं. वो किसी भी पार्टी में रहें, उन्हें यहां हराना नामुमकिन है.’

मंडी से सुंदरनगर की तरफ बढ़ने पर आपको पहाड़ी घाटी में लगभग वैसा ही विस्तार नज़र आता है जैसा कश्मीर की घाटियों में है. खेती के लिए मशहूर इस घाटी के बारे में यहां के स्थानीय किसान टेक सिंह बताते हैं, ‘यहां फसल की अच्छी पैदावार है और इसलिए इस इलाके को मिनी पंजाब भी कहा जाता है.’ यहां के राजनीतिक समीकरणों के बारे में टेक सिंह कहते हैं, ‘हम लोग हमेशा से कांग्रेस को ही वोट करते हैं. हमारे इलाके से हमेशा कांग्रेस ही आगे रही है, इस बार भी ऐसा ही होने वाला है.’ टेक सिंह आपको जो बताते हैं वह बात इस क्षेत्र के राजनीतिक इतिहास के अनुसार बिलकुल सही है. लेकिन कांग्रेस की जीत का यह इतिहास यहां इस बार भी दोहराया जाएगा, इस पर आपको तब कुछ शक होता है जब कुछ ही आगे बढ़ने पर आप पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह की रैली को देखते हैं. इसमें आपको बमुश्किल एक हजार लोग भी नजर नहीं आते.

कांग्रेस की रैलियों के सूनेपन से ठीक उलट भाजपा की रैलियों में यहां जमकर जन-सैलाब उमड़ रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां कहीं भी चुनावी सभा में पहुंच रहे हैं वहां हजारों की भीड़ उन्हें देखने-सुनने दूर-दूर से आ रही है. प्रदेश भाजपा के कार्यकर्ता मनीष बाली बताते हैं, ‘प्रधानमंत्री की जनसभाओं में हमारी उम्मीद से भी ज्यादा लोग पहुंच रहे हैं. उनकी रैलियों में लगभग हर जगह ही पंडाल छोटे पड़ रहे हैं.’ लेकिन वे यह भी स्वीकारते हैं कि कांग्रेस की उन रैलियों में भी इसकी टक्कर की ही भीड़ हो रही है जिनमें खुद वीरभद्र सिंह लोगों को संबोधित करने आ रहे हैं. वे कहते हैं, ‘अप्पर ही नहीं बल्कि लोअर हिमाचल में भी वीरभद्र सिंह की खासी लोकप्रियता है.’

वीरभद्र सिंह की लोकप्रियता ही आपको प्रदेश में कांग्रेस का मुख्य चुनावी हथियार भी नज़र आती है. ‘जन-जन की है यही पुकार, वीरभद्र सिंह सातवीं बार’ जैसे नारे लगाते कार्यकर्ता आपको हिमाचल के लगभग हर शहर में दिखते हैं. इस लोकप्रियता पर अंकुश लगाने के लिए भाजपा वीरभद्र सिंह पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को मुद्दा बनाने के भरसक प्रयास करती भी नज़र आती है. लेकिन कई स्थानीय लोग इन आरोपों को हंसी में उड़ा देते हैं. शिमला निवासी प्रवेश कुमार कहते हैं, ‘राजा साहब सैकड़ों करोड़ के मालिक हैं. उनका बेटा प्रदेश का सबसे अमीर प्रत्याशी है. उनकी पैतृक संपत्ति ही बहुत ज्यादा है. ऐसे में उन पर अगर एक-दो करोड़ की गड़बड़ी के आरोप लगें तो वो आरोप नहीं बल्कि मज़ाक लगता है.’

राजधानी शिमला और उसके आस-पास के इलाकों में वीरभद्र सिंह का जनाधार भले ही मजबूत है लेकिन यहां भाजपा समर्थकों की भी कमी नहीं है. और कम-से-कम इस क्षेत्र में तो लोगों का भाजपा समर्थक होने का सबसे बड़ा कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं. 2014 के मुकाबले भले ही अब प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता में कुछ कमी आई हो, लेकिन अब भी सिर्फ उनके नाम पर ही भाजपा को वोट देने वाले लोगों की यहां एक बड़ी संख्या है. सोलन जिले के कोल्का गांव के निवासी प्रेम सिंह भी ऐसे ही एक व्यक्ति हैं जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर ही भाजपा को वोट देना चाहते हैं. वो कहते हैं, ‘मोदी जी अच्छा काम कर रहे हैं. अगर हिमाचल में भी भाजपा की सरकार बनेगी तो हमारे लिए भी अच्छा ही करेंगे.’

प्रेम सिंह जिस गांव से हैं, वह अर्की विधानसभा क्षेत्र में आता है. इस सीट से वीरभद्र सिंह ही चुनाव लड़ रहे हैं. प्रेम सिंह कहते हैं, ‘मेरा वोट तो भाजपा को है लेकिन इस सीट पर कांग्रेस की जीत पक्की ही है. लेकिन सरकार इस बार भाजपा की ही बनेगी.’ वीरभद्र सिंह राज्य के उन बेहद चुनिंदा उम्मीदवारों में से हैं जिनकी जीत पर स्थानीय लोगों को जरा भी संदेह नहीं है. लेकिन उनके बेटे, विक्रमादित्य सिंह भी जीत दर्ज कर सकेंगे, इसकी उम्मीद क्षेत्रीय लोगों को न के बराबर ही है. विक्रमादित्य सिंह इस बार शिमला (ग्रामीण) की उस सीट से चुनाव लड़ रहे हैं जहां से पिछली बार वीरभद्र सिंह चुनाव जीते थे.

शिमला में दुकान चलाने वाले गौरव कहते हैं, ‘मैं पक्का कांग्रेसी हूं. इस बार भी कांग्रेस को ही वोट दूंगा लेकिन मैं आपको लिख कर दे सकता हूं कि विक्रमादित्य सिंह हर हाल में चुनाव हार रहे हैं. उनकी छवि भी ठीक नहीं है और वो जीतने लायक प्रत्याशी भी नहीं हैं.’ वीरभद्र सिंह की राजनीतिक विरासत के वारिस विक्रमादित्य सिंह के बारे में आपको अधिकतर लोगों की यही राय सुनने को मिलती है. उनकी तुलना अक्सर भाजपा के मुख्यमंत्री पद के दावेदार प्रेम कुमार धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर से होती है और इस तुलना में वे कहीं भी नहीं टिकते.

शिमला (ग्रामीण) के साथ ही शिमला शहर में भी भाजपा कांग्रेस पर भारी पड़ती दिख रही है. बल्कि लोग यह भी मान रहे हैं कि कांग्रेस यहां चौथे नंबर पर भी खिसक सकती है. भाजपा की ओर से इस सीट पर सुरेश भारद्वाज चुनाव लड़ रहे हैं जो पहले भी तीन बार विधायक रह चुके हैं. उनका मुख्य मुकाबला हरीश जनार्था से माना जा रहा है जो कांग्रेस से टिकट न मिलने के चलते निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं. कांग्रेस के कई स्थानीय नेता और कार्यकर्ता भी जनार्था का ही खुलकर समर्थन कर रहे हैं. इनके अलावा शिमला के मेयर रह चुके संजय चौहान को भी मजबूत प्रत्याशी माना जा रहा है जो सीपीआई (एम) से चुनाव लड़ रहे हैं.

देश के अधिकतर राज्यों की तरह ही हिमाचल में भी वामपंथी पार्टियों का प्रदर्शन बेहद खराब ही नज़र आता है. लेकिन शिमला में वाम दलों के दखल को नकारा नहीं जा सकता. इस दखल की शुरुआत साल 1993 में हुई थी जब सीपीआई (एम) के प्रत्याशी राकेश सिंघा ने शिमला विधानसभा सीट से जीत दर्ज की थी. हालांकि कुछ साल बाद एक मामले में दोषी पाए जाने के चलते उनका निर्वाचन रद्द कर दिया गया था लेकिन तब से इस क्षेत्र में वाम दलों का मजबूत हस्तक्षेप रहा है. इसी हस्तक्षेप का नतीजा था कि 2012 में जब पहली बार शिमला नगर निगम में मेयर और डिप्टी मेयर के पदों पर सीधे चुनाव हुए तो इन दोनों ही पदों पर सीपीआई (एम) ने जीत हासिल की.

शिमला के एक होटल मालिक प्रेम अटवाल कहते हैं, ‘मैं वैसे तो भाजपा समर्थक हूं लेकिन संजय चौहान (पूर्व मेयर) और टिकेंद्र पंवार (पूर्व डिप्टी मेयर) की ईमानदारी और उनकी काबिलियत का कायल हूं. लेकिन विधानसभा चुनावों में इन्हें वोट देकर कोई फायदा नहीं क्योंकि सरकार तो कभी इनकी बनेगी नहीं. ये लोग गलत पार्टी में फंस गए हैं. ये अगर कांग्रेस या भाजपा में होते तो आज बहुत आगे होते.’ राज्य में अन्य वामपंथी प्रत्याशियों के बारे में स्थानीय लोग लगभग ऐसी ही राय रखते हैं. लेकिन शिमला जिले की ठिओग विधानसभा सीट पर इस बार सीपीआई(एम) की जीत की उम्मीद कई लोग जता रहे हैं. इस सीट से वही राकेश सिंघा सीपीआई(एम) के प्रत्याशी हैं जो 1993 में भी शिमला से विधानसभा चुनाव जीते चुके हैं.

राज्यों में जब चुनाव होते हैं तो चुनाव प्रचार के आखिरी दिनों में सभी पार्टियाँ अपना पूरा जोर झोंक देती हैं. लेकिन शिमला का माहौल ऐसा है कि आपको यह एहसास भी नहीं होता कि चुनाव प्रचार के आखिरी दो दिन ही रह गए हैं. बल्कि चुनावों का एहसास भी आपको कम ही होता है क्योंकि शिमला के मुख्य बाजारों में इक्के-दुक्के झंडों-पोस्टरों और बैनरों के अलावा आपको कोई भी चुनावी हलचल नज़र नहीं आती. झंडों-पोस्टरों और पार्टियों के अन्य प्रतीकों (पार्टी के रंगों के मफलर, टोपी आदि) से अगर आप लोगों का रुझान भांपने की कोशिश करते हैं तो यहां भाजपा आपको कांग्रेस से आगे नज़र आती है.

हिमाचल के इन चुनावों में एक गौर करने वाली बात यह भी है कि पार्टी ने भले ही प्रेम कुमार धूमल का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए घोषित कर दिया है, लेकिन भाजपा के चुनाव प्रचार में हर तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही चेहरा बनाया जा रहा है. दिलचस्प यह भी है 2014 के बाद पहली बार ही भाजपा ने किसी राज्य में मुख्यमंत्री का नाम चुनावों से पहले घोषित किया है. भाजपा की इस बदली हुई रणनीति को दो तरीकों से देखा जा रहा है. कुछ लोगों का मानना है कि भाजपा का यह अच्छा फैसला है क्योंकि इससे स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं में उत्साह रहता है. लेकिन कई लोग यह भी मान रहे हैं कि ऐसा इसलिए भी हो सकता है कि हार की स्थिति में उसका ठीकरा स्थानीय नेतृत्व के सर फोड़ा जा सके.

हमीरपुर से चुनाव ड्यूटी में शिमला आए एक सरकारी अधिकारी कहते हैं, ‘भाजपा इस बार भले ही कांग्रेस से कुछ आगे है लेकिन उनमें एक डर भी है. पिछले एक साल में मोदी जी की लोकप्रियता कम हुई है और इसका एहसास भाजपा को भी है. धूमल का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए घोषित करना भाजपा के इसी डर को दिखाता है. वर्ना धूमल तो इतना बड़ा नाम भी नहीं हैं कि उनकी स्वीकार्यता पूरे हिमाचल में हो. अप्पर हिमाचल में तो हो सकता भाजपा के इस कदम से उन्हें नुकसान ही हो. उनके मुकाबले तो यहां जेपी नड्डा शायद ज्यादा स्वीकार्य होते.’

अप्पर हिमाचल में अमूमन वीरभद्र सिंह की लोकप्रियता के चलते कांग्रेस को मजबूत माना जाता है. लेकिन स्थानीय लोगों से पूछने पर आप पाएंगे चार में से तीन लोग इस बार प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने की ही संभावना जता रहे हैं. जीत का अंतर कितना होगा, इस सवाल पर लोगों के कई मत जरूर हैं. कम लोग हैं जो कहते हैं कि ‘मोदी लहर इस बार भी चलेगी और भाजपा बड़ी जीत दर्ज करेगी.’ इनसे भी कम लोग हैं जो मानते हैं कि कांग्रेस दोबारा सत्ता हासिल कर सकती है. जबकि अधिकतर लोगों का मानना है कि इस बार चुनाव परिणाम एकतरफा नहीं होंगे और जीत भले ही भाजपा की हो लेकिन वह कुछ ही सीटों के अंतर से होगी.