बीते साल यानी 2016 की आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 रुपये और 1000 रुपये के नोट बंद करने की घोषणा की थी. उन्होंने इस घोषणा के चार मुख्य लक्ष्य उस वक्त गिनाए थे - भ्रष्टाचार कम करना, काला धन कम करना, नकली नोटों की समस्या से लड़ना और आतंकवादियों को मिल रहे धन को रोकना. आज नोटबंदी के साल भर बाद यह जानना प्रासंगिक है कि इन चार मोर्चों पर अब तक कितनी प्रगति हो सकी है.

भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार के बारे में वैसे तो कुछ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं रिपोर्ट देती हैं लेकिन भारत में भ्रष्टाचार को समझना हो तो आम लोगों में इसके प्रति जो धारणा है, वही सबसे बड़ा संकेतक मानी जा सकती है. इस नाते कहा जा सकता है कि पिछले एक साल में भ्रष्टाचार के प्रति आम लोगों की धारणा में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है. आम लोगों का मानना है कि उसे जिस तरह के भ्रष्टाचार का सामना पहले करना पड़ता है, वह आज भी जैसा का तैसा ही है.

काला धन

जब नोटबंदी का निर्णय लिया गया तो सरकार के भी कुछ लोग और कई आर्थिक विशेषज्ञ यह मान रहे थे कि उस वक्त जितने 500 और 1000 के नोट चल रहे थे, उसमें से तकरीबन तीन-चार लाख करोड़ रुपये के नोट बैंकिंग तंत्र में आएंगे ही नहीं. इसके आधार पर कहा जा रहा था कि नोटबंदी काला धन के खिलाफ एक बड़ा प्रहार होगा. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. खुद भारतीय रिजर्व बैंक ने बताया कि 15.44 लाख करोड़ रुपये के नोटों में से 99 फीसदी से अधिक उसके पास विभिन्न बैंकों के जरिए वापस आ गए.

जो नोट नहीं वापस आ पाए, उनके लिए इस निर्णय के क्रियान्वयन की खामियों को अधिक जिम्मेदार माना जा रहा है. इनमें बार-बार रिजर्व बैंक द्वारा नियमों को बदलना भी शामिल है. साथ ही नेपाल जैसे पड़ोसी देश में चलन में रहने के बावजूद पुराने भारतीय नोटों को जमा कराने की कोई संगठित सुविधा नहीं दी गई. इस वजह से वहां भी काफी पैसा बचा रह गया. कुल मिलाकर स्थिति यह है कि बहुत कम पुराने नोट बैंकिंग तंत्र से बाहर बचे रह गए. जो पैसे आए हैं उनमें से काले धन की पहचान करके कार्रवाई करने के मामले में अब तक कोई खास प्रगति नहीं दिख सकी है.

नकली नोट

पुराने नोट बंद करने के बाद जब सरकार ने 500 और 2,000 रुपये के नए नोट जारी किए तो यह दावा किया गया कि इन नोटों का नकली नोट बना पाना बेहद मुश्किल काम है. इसके लिए कागज से लेकर तकनीकी जटिलताओं का हवाला दिया गया. लेकिन सच्चाई यह है कि नए नोटों के जारी होने के कुछ ही दिनों बाद से ही इनके जाली नोट भी सामने आने लगे थे.

खुद नकली नोटों के मामलों पर सरकारी स्तर पर निगरानी रखने वाले अधिकारी बता रहे हैं कि अब जो 500 और 2,000 रुपये के नए नकली नोट आ रहे हैं, वे तकनीकी तौर पर काफी एडवांस हैं और इनकी पहचान कर पाना मुश्किल है. जबकि पहले जो नकली नोट थे, उनकी पहचान आसान थी. इस साल अगस्त से अक्टूबर के बीच राजस्व आसूचना निदेशालय ने 500 और 2000 रुपये के 35 लाख रुपये मूल्य के नकली नोट बरामद किए हैं. ये नोट मुंबई, पुणे और बेंगलुरु में बरामद किए गए. रिजर्व बैंक ने नए नोटों में 17 सुरक्षा मानक डाले हैं. जो नकली नोट बरामद किए गए हैं, उनमें भी ऐसे आठ सुरक्षा मानक मौजूद हैं. सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि ज्यादातर नए नकली नोट पाकिस्तान के रास्ते नहीं बल्कि बांग्लादेश के रास्ते आ रहे हैं. कुल मिलाकर स्थिति यह है कि नकली नोटों से इस तरह से लड़ने का नोटबंदी का लक्ष्य पूरा होता नहीं दिख रहा है.

लेकिन नकली मुद्रा से लड़ने के एक दूसरे मोर्चे पर हो सकता है नोटबंदी से कुछ फायदा हुआ हो. एनआईए के एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2015 में किसी भी वक्त करीब 400 करोड़ की नकली मुद्रा चलन में हुआ करती थी. नोटबंदी के बाद इसकी केवल 10 फीसदी नकली मुद्रा ही बैंकों में वापस लौटकर आई. इसका मतलब है कि या तो उतने नकली नोट चलन में ही नहीं थे या फिर उन्हें बैंकों में जमा ही नहीं कराया गया और वे अब इन्हें चलाने वालों के लिए बेकार हो गये.

आतंकवादियों की फंडिंग

प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की घोषणा करते वक्त कहा था कि इससे आतंकवादियों और अलगाववादियों को मिलने वाली फंडिंग मुश्किल हो जाएगी. उस निर्णय के बाद सरकार में प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, वित्त मंत्री और अधिकारियों के स्तर पर यह दावा किया गया कि इस लक्ष्य में सरकार को काफी सफलता मिली है. लेकिन क्या वाकई ऐसा हुआ है?

इसे जम्मू-कश्मीर के आंकड़ों के जरिए समझने की कोशिश की जा सकती है. 2016 में वहां 283 उग्रवादी घटनाएं हुई थीं. इस साल इन मामलों की संख्या बढ़कर 301 पर पहुंच गई. पिछले साल जहां घुसपैठ की 221 कोशिशें हुई थीं, वहीं इस साल इनकी संख्या बढ़कर 336 हो गई. हालांकि, पिछले साल घुसपैठ की 112 कोशिशें कामयाब रही थीं, वहीं इस साल सिर्फ 90 कोशिशें ही कामयाब हो पाईं.

नक्सल प्रभावित इलाकों की बात करें तो यहां पिछले साल 59 सुरक्षाकर्मियों की हत्या के मामले सामने आए थे. इस साल यह संख्या बढ़कर 70 हो गई. हालांकि, कुल नक्सली घटनाओं की संख्या 887 से कम होकर 701 हो गईं. लेकिन कुल मिलाकर इस मोर्चे पर भी नोटबंदी का प्रभाव संदेह के घेरे में ही है.