करीब साल भर पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के नाम संबोधन में नोटबंदी का ऐलान किया था. अपने संबोधन में उन्होंने इसके फायदे गिनाते हुए कहा था कि इससे भ्रष्टाचार, कालाधन, आतंकवादी गतिविधियों की ​फंडिंग और जाली नोटों की समस्या पर प्रभावी अंकुश लग जाएगा. इन दावों के वास्तविक परिणामों पर पक्ष-विपक्ष के बीच अब भी जमकर बहस चल रही है.

पिछले एक साल के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से मिल रही रिपोर्टें बताती हैं कि नोटबंदी का विकास दर, निवेश और रोजगार पर काफी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है. प्रधानमंत्री ने तब इन नकारात्मक प्रभावों के बारे में कोई चर्चा नहीं की थी. उन्होंने तब केवल नोट बदलने में होने वाली परेशानियों का ही जिक्र किया था. वैसे नोटबंदी से यह जरूर हुआ कि पिछले एक साल में डिजिटाइजेशन की प्रक्रिया में काफी तेजी आई. नोटबंदी पर प्रधानमंत्री के पहले संबोधन में इसकी भी कोई जिक्र नहीं था.

नोटबंदी के पांच अघोषित नुकसान

1. नोटबंदी का अर्थव्यवस्था की विकास दर पर पड़े नकारात्मक प्रभाव को तो अब हर कोई मान रहा है. अंतर बस इसके परिमाण को लेकर है. विपक्ष का दावा है कि इससे विकास दर लगभग दो फीसदी कम हो गई. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी कई बार यह बात कह चुके हैं. हालांकि सरकार विपक्ष के इस आंकड़े को गलत बताते हुए कह रही है कि जो गिरावट हुई भी है वह तात्कालिक है.

वैसे बहुत से जानकार पिछली कई तिमाहियों की विकास दर के आंकड़े के आधार पर इसके नकारात्मक प्रभाव का आकलन करते हैं. 2016 में जनवरी से सितंबर के बीच की तीन तिमाहियों में अर्थव्यवस्था की विकास दर क्रमश: 7.9, 7.9 और 7.5 फीसदी थी. सरकार को तब उम्मीद थी कि आने वाली तिमाहियों में विकास की दर और तेज होगी. इस बीच नवंबर में नोटबंदी की घोषणा हो गई. इसके बाद की तीन तिमाहियों में विकास दर केवल 7.0, 6.1 और 5.7 फीसदी रही है.

कई जानकार इन आंकड़ों की तुलना करते हुए ही सरकार पर निशाना साध रहे हैं. उनका कहना है कि नोटबंदी के पहले की तीन तिमाहियों की विकास दर का औसत 7.8 फीसदी था, जबकि बाद में यह घटकर केवल 6.3 फीसदी रह गया. आलोचकों का कहना है कि विकास दर यदि पहले जितनी भी होती तो यह 1.5 फीसदी ज्यादा होती. बहरहाल आलोचकों के इस मॉडल के लिहाज से अभी के 170 लाख करोड़ रुपये के जीडीपी आकार के लिहाज से इस साल अर्थव्यवस्था में 2.55 लाख करोड़ रु की कम वृद्धि हो सकती है.

2. सरकार ने नोटबंदी के जिन नुकसानों की चर्चा नहीं की थी उनमें दूसरा सबसे अहम रोजगार रहा है. महाजनों का कोष खत्म हो जाने और बैंकों की खस्ता हालत के चलते इसका सबसे ज्यादा प्रभाव असंगठित क्षेत्र पड़ा. इसमें छोटी विनिर्माण इकाइयां और सेवा क्षेत्र के व्यवसाय सबसे ज्यादा प्रभावित हुए. ग्रामीण अर्थव्यवस्था जो मूलत: खेती पर आ​श्रित होती है, पर भी इसका खासा असर देखने को मिला. छोटे और मध्यम आकार के उद्योग भी इसकी चपेट में आए. बड़े और संगठित क्षेत्रों में रियल एस्टेट सेक्टर पर इसका सबसे ज्यादा नुकसान देखा गया. इन क्षेत्रों में ज्यादातर काम नगदी के दम पर होता है, लिहाजा पूंजी न मिलने से बड़ी संख्या में कारोबार बंद हो गए. एक अनुमान के अनुसार इससे करीब 15 लाख रोजगार खत्म हो गए. जानकारों का मानना है कि अभी सब कुछ सामान्य होने में कई और महीने लग सकते हैं.

3. नोटबंदी से सरकार को कई स्रोतों से मिलने वाले राजस्व पर भी असर पड़ने का अनुमान है. हालांकि आरबीआई ने 2016-17 की अपनी वार्षिक रिपोर्ट में बताया कि नोटबंदी के बाद सरकार को 16 हजार करोड़ रुपये का लाभ हुआ. लेकिन उसी रिपोर्ट में केंद्रीय बैंक का यह भी कहना था कि पिछले साल सरकार को दिए जाने वाले लाभांश में 35 हजार करोड़ रु की कमी हुई और वह घटकर केवल 30 हजार करोड़ रह गया. इसका प्रमुख कारण नए नोटों की छपाई और नोटबंदी के फैसले को अमल में लाना रहा. वहीं सभी बैंकों को अपने एटीएम को पुनर्व्यवस्थित करने, कर्मचारियों के ओवरटाइम के चलते दिए जाने वाले वेतन-भत्तों आदि पर भी खासा खर्च करना पड़ा.

दूसरी ओर सरकार का दावा है कि पिछले एक साल में उसके कर राजस्व में जो बढ़ोतरी हुई है, उसकी मुख्य वजह नोटबंदी है. कई जानकार इसे आधा सच मानते हैं. इनके अनुसार सरकार नोटबंदी नहीं भी करती तो भी विकास दर तेज रहने से सरकार के खजाने में ज्यादा कर राशि आती. उनके अनुसार जीडीपी में 2.55 लाख करोड़ रु की अनुमानित कमी हुई जबकि मौजूदा वित्त वर्ष में कर और जीडीपी का संभावित अनुपात 11.3 फीसदी है. यानी पिछले एक साल में सरकार को लगभग 29 हजार करोड़ रुपये का ज्यादा राजस्व वैसे भी मिल जाता.

वैसे सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि 2012-13 से 2015-16 के बीच के चार सालों में कर राजस्व में हर साल औसतन 13.41 फीसदी की वृद्धि हुई है. 2015-16 में तो यह वृद्धि 16.96 फीसदी की रही. दूसरी ओर नोटबंदी के बाद सरकार का कर राजस्व पिछले साल 17.53 फीसदी बढ़ा. वहीं मौजूदा वित्त वर्ष में इसके करीब 12 फीसदी बढ़ने का अनुमान है. यानी पिछले साल और इस साल कर राजस्व की तेज वृद्धि का अकेला कारण नोटबंदी नहीं अर्थव्यवस्था की बुनियाद का सुधरना है. इसलिए जानकारों का मानना है कि नोटबंदी से आमदनी बढ़ने का मोदी सरकार का दावा आधा सच है.

4. बैंक किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं. सरकार ने शुरू में तो नहीं बल्कि बाद में कहा कि नोटबंदी से बैंकों की सेहत सुधरेगी. लेकिन पिछले एक साल का अनुभव बताता है कि बैंकों की दशा नोटबंदी से और खराब ही हुई. नोटबंदी के पहले ही फंसे हुए कर्ज की मात्रा करीब 10 फीसदी तक पहुंच जाने से बैंक खुलकर कर्ज बांटने से बच रहे थे. वहीं ब्याज दर ज्यादा रहने और नोटबंदी के बाद मांग सुस्त हो जाने से कारोबारी भी कर्ज लेने को लेकर इच्छुक नहीं रहे.

नोटबंदी के दौरान जमा हुई राशि पर बैंकों को ग्राहकों को ब्याज देना पड़ा. अभी देश के सभी बैंकों में करीब 18 लाख करोड़ रुपये जमा हैं. दूसरी ओर नोटबंदी को लागू करने में भी बैंकों को खासा खर्च करना पड़ा. इस दौरान वे अपना सामान्य बैंकिंग कारोबार नहीं कर सके. इससे भी उन्हें नुकसान हुआ. जानकारों के अनुसार इससे बैंकों की दशा सुधरने के बजाय और पस्त ही हुई. यही वजह है कि सभी बैंक अपना नुकसान पूरा करने के लिए ग्राहकों से सेवा और रखरखाव शुल्क के नाम पर कई तरह का चार्ज वसूलने लगे हैं. जानकारों के अनुसार बैंकों की दशा सुधरने में अभी एक से डेढ़ साल का वक्त और लगेगा.

5. केंद्र सरकार का दावा है कि नोटबंदी से महंगाई में कमी हुई जिससे ब्याज में कटौती हुई. लेकिन यह सच नहीं है. पिछले साल नवंबर में खुदरा महंगाई दर 3.63 फीसदी थी जो इस साल सितंबर में 0.35 फीसदी घटकर 3.28 रह गई है. इस बीच पिछले एक साल में आरबीआई ने ब्याज दरों में केवल चौथाई फीसदी की कमी की है. जानकार इन दोनों बदलावों को बहुत बड़ा नहीं मानते. इसके उलट नोटबंदी के बाद किसानों की पस्त हालत के बाद हुए आंदोलन के चलते कर्जमाफी के कई राज्यों के फैसले से महंगाई बढ़ने का खतरा है. राज्यों के राजकोषीय घाटे में वृद्धि होने से भी महंगाई के चढ़ने के अंदेशा है. आरबीआई इसी चलते ब्याज दरों में और कटौती से बच रहा है.

डिजिटाइजेशन में वृद्धि सबसे अहम उपलब्धि

नोटबंदी के बाद जब बैंक और एटीएम पंगु हो गए थे तो लेन-देन के इलेक्ट्रॉनिक तरीकों ने लोगों को नया रास्ता दिया. बैंकों की वेबसाइटों और उनके ऐप्स के अलावा पेटीएम और मोबीक्विक जैसे ई-वैलेट प्लेटफॉर्मों से लेन-देन को तेजी से बढ़ावा मिला. सरकार ने भी भीम, यूपीआई और आधार-पे जैसे नए रास्ते लोगों को उपलब्ध कराए. इस चलते पिछले एक साल में डिजिटल भुगतान में करीब 80 फीसदी की वृद्धि हुई. इसके अलावा लोगों में लेन-देन के इस तरीके के बारे में काफी जागरूकता आई. हाल के एक सर्वे से पता चला है कि अब ग्रामीण इलाके के 63 फीसदी कारोबारी भी डिजिटल भुगतान करने को लेकर इच्छुक हैं. हालांकि वहां ऐसे लेन-देन वास्तव में केवल 11 फीसदी ही हैं. लेकिन इससे यह तो पता चलता है कि इस तरह के लेन-देन को लेकर देश का माहौल काफी अनुकूल हो गया है. हालांकि यह आश्चर्य की बात है कि अब तक नोटबंदी की जो सबसे अहम उपलब्धि नजर आ रही है उसे प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के शुरुआती उद्देश्यों में शामिल नहीं किया था.