कुछ वक्त पहले एक खबर नजरों से गुजरी थी. पता नहीं कितनी सच है कितनी नहीं. लेकिन खबर अनुसार उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल में एक गंगी गांव है, जहां ‘भगवान की कसम’ खाने मात्र से लोन मिल जाता है! दूर-दराज से लोग यहां उधार लेने आते हैं और यहां गारंटी के तौर पर मकान-जवाहरात गिरवी रखने की जरूरत नहीं पड़ती, बस एक प्राचीन मंदिर में जाकर भगवान की कसम खानी पड़ती है. याद आता है, चूंकि बचपन में मां से बड़ा कोई होता नहीं था, इसलिए कुछ इसी तरह ‘मां कसम’ खाने भर से कई मुसीबतें टल जाया करती थीं!

कहने को तो आज भी कई स्कूलों (सरकारी!) के बच्चे मगन होकर मां कसम खाते हैं लेकिन अंग्रेजीदां होती जा रही शिक्षा व्यवस्था ने पहले जितनी जगह इस खेल के लिए छोड़ी नहीं है. अब तो ‘कट ले’ की जगह ‘फक यू’ ने ले ली है और ‘मां कसम’ की ‘आई स्वैर टू जीसस’ ने. इसलिए जब मराठी भाषा में गुफ्तगू करती यूनिर्वसल ‘आई शपथ’ आंखों के सामने से गुजरती है, तो लगता है जैसे कम से कम करोड़ बचपन को एक रंगीन बायोस्कोप देखने का सुनहरा मौका हाथ लग गया हो.

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मात्र 15 मिनट लंबी इस लघु फिल्म को हाल ही में सम्पन्न हुए प्रतिष्ठित मुम्बई फिल्म फेस्टिवल में भी पुरस्कृत किया गया था और यह एक अबोध बालक की नजर से सयानों की दुनिया देखती है. खास ये है कि 8 वर्षीय इस बालक द्वारा झिझककर उस दुनिया में दाखिल होने को यह लघु फिल्म एकदम ही कमाल अंदाज में दिखाती है.

ये बात सच है, कि बच्चों की शरारतों को काबू में करने वाले नुस्खे वयस्कों ने खुद बच्चे बनकर ही ईजाद किए हैं. इसलिए तो ‘फल खाना बीज मत खाना नहीं तो पेट में पेड़ उग आएगा’, ‘चाय मत पीयो नहीं तो रंग काला हो जाएगा’ जैसी चेतावनियां हम सबके बचपन का हिस्सा रही हैं. ‘मां कसम’ भी ऐसे ही किसी वयस्क दिमाग का ईजाद किया नुस्खा होगा कि अगर मां की झूठी कसम खाई तो वो मर जाएगी. ताकि बच्चे सच बोलें और बात-बात में झूठ बोलने के लालच से दूर रहें. लेकिन बनाने वाले ने भी नहीं सोचा होगा कि कई पीढ़ियों के बाल मन पर इसका प्रभाव कितना गहरा और अलहदा तरीकों से पड़ने वाला होगा.

‘आई शपथ’ की एक खास बात, जिसका कहानी से ताल्लुक कम भले ही लगे लेकिन वो बिना कहे फिल्म को रिच करती है, उन सिकुड़ते घरों को रेखांकित करना है जहां आजकल बच्चे बड़े हो रहे हैं. रहने खाने और खेलने की कम होती जगहों के बीच बड़ों की दुनिया में बिंधे रहने के बावजूद उनके मन की थाह लेने वाले कम हो रहे हैं. कल्पनाओं के बादल आज भी नए-नए शेप ले रहे हैं और ‘मां कसम’ से जुड़ी चेतावनी सच न होने पर बच्चे रातभर करवटें बदल रहे हैं. लेकिन उनके बादलों को सही-सही शक्ल देने वाले स्नेहशील लोग कम हो रहे हैं.

बच्चे बड़े हो रहे हैं और बड़े अपने बचपन से दूर हो रहे हैं. नहीं?