प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित नोटबंदी की पहली वर्षगांठ पर इसके नतीजों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहस हुई है. नोटबंदी का एक बड़ा नकारात्मक असर रोजगार पर पड़ा है. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनॉमी (सीएमआईई) का अनुमान है कि इस साल जनवरी से अप्रैल के बीच रोजगार के 15 लाख अवसर खत्म हुए हैं. ऐसा नहीं है कि अर्थव्यस्था को पीछे खींचने में सिर्फ नोटबंदी का योगदान रहा, लेकिन इसकी एक महत्वूर्ण भूमिका तो जरूर थी. फिर इन सभी कारकों के चलते 2016-17 की हर बीतती तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में गिरावट देखने को मिली.

केंद्र सरकार का कहना है कि नोटबंदी अर्थव्यवस्था को औपचारिक (वे आर्थिक गतिविधियां जिनका हिसाब-किताब किसी न किसी सरकारी दस्तावेज में दर्ज होता हो) बनाने की दिशा में बड़ा धक्का था. इस लक्ष्य को हासिल करने पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए. लेकिन अर्थव्यवस्था को इस तरह झटका देकर गति देने के तरीके के अपने कुछ नुकसान भी हैं. उदाहरण के लिए अप्रैल-जून तिमाही में चालू वित्तीय घाटा 0.6 प्रतिशत बढ़कर जीडीपी के 2.4 प्रतिशत के स्तर तक पहुंच गया है. यानी इस दौरान आयात बढ़ा है और घरेलू उत्पादकों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा है. यह चलन ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के लिए भी चुनौती है.

हालांकि इस समय वैश्विक आर्थिक स्थिति सुधार के रास्ते पर है और इससे हमें मदद मिल सकती है. दूसरी तरफ चीन में कपड़ा और फुटवेयर क्षेत्रों में तनख्वाएं बढ़ने से ये उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे हो रहे हैं. इस माहौल में अगर भारत के असंगठित क्षेत्र को बढ़ावा देने वाली कुछ नीतियां बनाई जाएं तो यह चीन द्वारा खाली छोड़े गए बाजार में अपनी जगह बना सकता है. इससे न सिर्फ रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, इस क्षेत्र से जुड़ी फर्में औपचारिक अर्थव्यस्था में भी जगह बना पाएंगी.

इस समय सरकार का ध्यान इन क्षेत्रों के लिए विशेष नीतियां बनाने और श्रम, भूमि, शिक्षा और सरकारी कंपनियों में विनिवेश में सुधार की गति बढ़ाने पर होना चाहिए. भारत क्रांतिकारी उपायों के बदले बाजारोन्मुखी नीतियां अपनाकर न सिर्फ रोजगार के ज्यादा अवसर पैदा कर सकता है बल्कि एक साफ-स्वच्छ अर्थव्यवस्था भी विकसित कर सकता है. (स्रोत)