1940 के दशक में जब भारत के हिंदुओं और मुसलमानों में कथित सांस्कृतिक अंतर को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाने लगा, तो महात्मा गांधी ने एक बार इसका एक सुंदर जवाब दिया था. इसमें मुहम्मद इक़बाल का भी जिक्र था.

एक अप्रैल, 1940 को सेवाग्राम में ‘हरिजन’ के लिए लिखे गए लेख में महात्मा गांधी कहते हैं:

‘दो राष्ट्रों का सिद्धांत एक झूठ है. भारत के अधिकांश मुसलमान या तो ऐसे हैं जिन्होंने अपना पुराना धर्म छोड़कर इस्लाम ग्रहण किया है या वे इस तरह धर्मांतरण करनेवाले लोगों के वंशज हैं. इस्लाम स्वीकार करते ही वे अलग राष्ट्र के तो नहीं हो गए.

बंगाली मुसलमान वही भाषा बोलता है, जो बंगाली हिंदू बोलते हैं. वही खाना खाता है जो उसके हिंदू पड़ोसी खाते हैं और उसके मनोरंजन के साधन भी वही हैं जो बंगाली हिन्दुओं के हैं. वहां के हिंदू और मुसलमान कपड़े भी एक ही तरह के पहनते हैं. पहनावा-ओढ़ावा और बोलचाल के आधार पर बंगाली हिंदू और बंगाली मुसलमान के बीच भेद कर सकना अक्सर मैंने मुश्किल पाया है.

...जब मैं स्वर्गीय सर अली इमाम से पहले-पहल मिला तो मैं नहीं जान पाया कि वे हिंदू नहीं हैं. उनकी बोल-चाल, उनका पहनावा-ओढ़ावा, तौर-तरीके, खान-पान सब वैसे ही थे जैसे उन अधिकांश हिंदुओं के, जिनके बीच कि मैंने उन्हें देखा. मुझे तो उनके नाम से ही मालूम हो पाया कि वे मुसलमान हैं.

और कायदे-आजम जिन्ना में तो पहचान का यह उपाय भी नहीं है. उनका नाम किसी भी हिंदू का नाम हो सकता है. जब मैं पहले-पहल उनसे मिला, मुझे नहीं मालूम था कि वे मुसलमान हैं. उनका धर्म मुझे उनका पूरा नाम जानने के बाद ही मालूम हुआ. उनकी राष्ट्रीयता उनके चेहरे और उनके तौर-तरीकों से झलकती थी.

पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि अगर महीनों नहीं तो कम से कम कई दिन तक तो मैं स्वर्गीय विट्ठलभाई पटेल को मुसलमान समझता रहा, क्योंकि वे दाढ़ी रखते थे और तुर्की टोपी पहनते थे. हिंदू उत्तराधिकार कानून कई मुस्लिम समुदायों के बीच प्रचलित है.

सर मुहम्मद इक़बाल अपने ब्राह्मण वंश में उत्पन्न होने का उल्लेख बड़े गर्व के साथ करते थे. इक़बाल और किचलू (सैफुद्दीन किचलू), ये दोनों नाम मुसलमानों के भी होते हैं और हिंदुओं के भी. भारत के हिंदू और मुसलमान दो राष्ट्रों के लोग नहीं हैं. जिन्हें ईश्वर ने ही एक बनाया है उन्हें कोई मनुष्य एक-दूसरे से कभी अलग नहीं कर पाएगा.’