भारतीय वैज्ञानिकों ने तपेदिक यानी टीबी के खिलाफ जारी जंग में एक बड़ी सफलता हासिल की है. राष्ट्रीय यक्ष्मा अनुसंधान संस्थान (एनआइआरटी) के इन वैज्ञानिकों ने इस बीमारी को दूर करने का एक ज्यादा असरदार और प्रभावकारी टीका बना लिया है.

इंडिया साइंस वायर के मुताबिक इस टीके का नाम ‘वीपीएम 1002’ रखा गया है. इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह तपेदिक के इलाज में प्रयोग हो रहे बीसीजी टीके पर आधारित है. बीसीजी टीका एक ऐसा टीका है जिसे टीबी के इलाज में सबसे ज्यादा प्रभावी माना जाता है लेकिन, इस टीके की सीमा यह है कि यह केवल बच्चों के उपचार में ही प्रयोग किया जा सकता है. युवाओं और वयस्कों पर यह असर नहीं करता. लेकिन, अब इस नयी खोज के बाद इसे ‘वीपीएम 1002’ के रूप में युवाओं और वयस्कों के इलाज में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा.

एनआइआरटी चेन्नई के प्रभारी निदेशक डॉ. श्रीकांत प्रसाद त्रिपाठी ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि यह टीका सरकार से अनुमति के लिए भेजा गया है. उन्हें उम्मीद है कि इस नए टीके को जल्द ही मंजूरी मिल जाएगी और फिर यह आमजन के लिए उपलब्ध होगा. डॉ. त्रिपाठी की मानें तो यह टीका भारत के लिए किसी बड़े वरदान से कम नहीं है क्योंकि दुनिया भर में तपेदिक के सबसे ज्यादा मरीज भारत में ही पाए जाते हैं.

राष्ट्रीय यक्ष्मा अनुसंधान संस्थान के प्रभारी निदेशक डॉ. श्रीकांत प्रसाद त्रिपाठी
राष्ट्रीय यक्ष्मा अनुसंधान संस्थान के प्रभारी निदेशक डॉ. श्रीकांत प्रसाद त्रिपाठी

भारत में टीबी के मरीजों की स्थिति

एक सर्वेक्षण के मुताबिक दुनियाभर में हर साल टीबी के एक करोड़ 40 लाख मामले सामने आते हैं. इनमें से अकेले भारत में ही करीब 28 लाख मामले होते हैं. डॉ त्रिपाठी के मुताबिक साल 2000 में भारत में टीबी के एक लाख की आबादी पर 289 मामले सामने आए थे. इसके बाद तमाम कोशिशों से इसे रोकने में कुछ हद तक सफलता भी मिली है. वे बताते हैं, ‘अब साल 2017 में एक लाख पर 217 मरीज ही बचे हैं. लेकिन, इसके बावजूद विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित लक्ष्य से हम बहुत पीछे हैं, जो 2015 में एक लाख की आबादी पर 55 तय किया गया है.’

टीबी और उसके लक्षण

टीबी के संक्रमण के लक्षण थूक में खून के साथ पुरानी खांसी, बुखार, रात को पसीना आना और वजन घटना माने जाते हैं. अगर शुरुआत में ही इसका अच्छे से इलाज न किया जाए तो यह जानलेवा साबित होता है. विशेषज्ञों के अनुसार फेफड़ों से संबंधित यह रोग आमतौर पर माइकोबैक्टीरियम ट्यूबर्क्युलोसिस बैक्टीरिया के संक्रमण की वजह से होता है. यह संक्रमण फेफड़ों से रक्त प्रवाह के साथ शरीर के अन्य भागों जैसे हड्डियों, हड्डियों के जोड़, आंत, त्वचा और मस्तिष्क के ऊपर की झिल्ली आदि में भी फैल सकता है.

यह रोग कैसे फैलता है

यक्ष्मा, तपेदिक, क्षयरोग और एमटीबी जैसे नामों से जाना जाने वाला यह रोग एक छूत की बीमारी है. जानकारों के मुताबिक किसी रोगी के खांसने, बात करने, छींकने या थूकने के समय उसके थूक की बूंदें हवा में फैल जाती हैं, जिनमें उपस्थित बैक्टीरिया कई घंटों तक हवा में बना रहता है. जब रोगी के आस-पास स्थित कोई अन्य व्यक्ति सांस लेता है यह उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है.