बीते कुछ दिनों से दिल्ली-एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) में लोगों को सांस लेने में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने वायु प्रदूषण के स्तर को देखते हुए स्वास्थ्य आपात स्थिति का ऐलान कर दिया है. हालात लगातार चिंताजनक बने हुए हैं. दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति के मुताबिक बीते गुरुवार हवा में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम)-10 की मात्रा 1136, जबकि पीएम 2.5 की मात्रा 760 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर (एमजी/मीटर3) तक पहुंच चुकी थी. पीएम-10 का सामान्य स्तर 100 एमजी/मीटर3 है जबकि पीएम 2.5 का 60 एमजी/मीटर3. पीएम हवा में शामिल ऐसे सूक्ष्म कण होते हैं जिनके सांसों के जरिए शरीर में जाने से गंभीर किस्म की बीमारियों जैसे- फेफड़ों का कैंसर, दिल की बीमारी का खतरा पैदा हो जाता है.

बीते गुरुवार को दिल्ली की केजरीवाल सरकार के साथ राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने स्थिति को सामान्य करने की दिशा में कई निर्देशों का ऐलान किया था. सड़कों पर गाड़ियों की संख्या नियंत्रित करने के लिए राज्य सरकार ने 13 से लेकर 17 नवंबर तक एक बार फिर ऑड-इवन योजना को लागू करने का फैसला किया था. हालांकि, इसके दो दिन बाद ही एनजीटी द्वारा योजना के तहत दोपहिया और सरकारी वाहनों के साथ महिला चालकों को छूट देने से इनकार करने के बाद सरकार ने इससे अपने हाथ पीछे खींच लिए. उधर, दिल्ली के परिवहन मंत्री कैलाश गहलोत ने बताया कि राज्य सरकार सोमवार को एनजीटी में समीक्षा याचिका लगाएगी और बीते दो बार की तरह इन सबको को छूट देने की मांग करेगी. इसके तहत इवन तारीख जैसे-2,4 को इवन नंबर और इसी तरह ऑड तारीख जैसे-1,3 को ऑड नंबर की गाड़ियां चलाने का प्रावधान है. इससे पहले इसे 2016 में दो बार (जनवरी और अप्रैल) में लागू किया गया था.

एनजीटी ने दिल्ली-एनसीआर की हवा को सांस लेने लायक बनाने के लिए कई निर्देश भी जारी किए हैं. उसने इस इलाके में सभी तरह के निर्माण कार्यों और औद्योगिक गतिविधियों पर 14 नवंबर तक रोक लगा दी है. साथ ही, 10 साल से ज्यादा पुराने डीजल और 15 साल से ज्यादा पुराने पेट्रोल वाहनों के दिल्ली आने पर पाबंदी लगा दी गई है. इसके अलावा प्रदूषित इलाकों में पानी का छिड़काव और नियमित रूप से सफाई कराने का भी निर्देश दिया गया है. दूसरी ओर, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने भी वायु प्रदूषण के समाधान पर सुझाव देने के लिए सात सदस्यीय समिति गठित की है.

इस बीच, दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय, दिल्ली के मुख्य सचिव और प्रदूषण नियंत्रण की अन्य एजेंसियों को तीन दिन में आपात बैठक कर हालात का आकलन करने का निर्देश दिया है. इसके अलावा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी केंद्र के साथ-साथ दिल्ली, पंजाब, हरियाणा की सरकारों को नोटिस जारी कर दो हफ्ते के भीतर जवाब-तलब किया है.

बीते अक्टूबर से ही दिल्ली में हवा की स्थिति बदतर होती गई है. हालांकि, साल 2016 में जिस तरह की स्थिति पैदा हो गई थी, उससे भी सरकार और पर्यावरण से जुड़ी संस्थाएं कोई सबक लेती हुई नहीं दिखीं. इसके अलावा लोगों की पर्यावरण को लेकर नासमझी भी खुलकर सामने आई. इस साल सुप्रीम कोर्ट ने दीपावली से पहले दिल्ली-एनसीआर में पटाखों को बेचने पर रोक लगा दी थी. इसके बावजूद कई लोगों ने जमकर पटाखे छोड़े.

हवा की गुणवत्ता की लिहाज से चेतावनी स्तर और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले इसके प्रभाव |साभार : सीपीसीबी
हवा की गुणवत्ता की लिहाज से चेतावनी स्तर और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले इसके प्रभाव |साभार : सीपीसीबी

इस बीच, इंडियास्पेंड की एक रिपोर्ट सरकार और पर्यावरण से जुड़ी संस्थाओं की लापरवाही की पुष्टि करती हुई दिखती है. इसके मुताबिक साल 2016 में लोगों को प्रदूषण की मार से बचाने के लिए जो व्यवस्था बनाई गई थी उसकी याद सरकारी मशीनरी को बहुत देर से आई. इस रिपोर्ट के मुताबिक बीती 16 अक्टूबर से अब तक दिल्ली की हवा सामान्य मानक की तुलना में करीब 12 गुना बढ़ गई है. इंडियास्पेंड के मुताबिक बीती आठ अक्टूबर से अब तक हवा की गुणवत्ता (एक्यूआई) आठ बार खराब (201 से 300), 21 मर्तबा गंभीर (301-400) और एक बार आपात स्थिति (500 से ऊपर) घोषित की जा चुकी है. इसके बावजूद बीते मंगलवार तक सरकार और पर्यावरण को साफ रखने के लिए जिम्मेदार संस्थाओं की आंखों में ‘जलन’ महसूस होती हुई नहीं दिखी और हवा को सांस लेने लायक बनाए रखने के लिए बीते साल तय किए कदम नहीं उठाए गए.

दिल्ली में बीते एक महीने के दौरान हवा की गुणवत्ता | साभार : इंडियास्पेंड
दिल्ली में बीते एक महीने के दौरान हवा की गुणवत्ता | साभार : इंडियास्पेंड

बीते साल दो दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए जरूरी कदमों की एक सूची सौंपी थी. इसे ग्रैप (ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान) कहा गया. इस पर तेजी से काम करने की जगह जिम्मेदार संस्थाएं कुंभकर्ण की नींद सोई रहीं. इस साल 12 जनवरी को केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से मंजूरी मिलने के 10 महीने बाद नोडल एजेंसी पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण ने बीती 18 अक्टूबर को इस पर अपनी मुहर लगाई है.

हवा की गुणवत्ता को देखते हुए उठाए जाने वाले कदम (ग्रैप) | साभार : इंडियास्पेंड
हवा की गुणवत्ता को देखते हुए उठाए जाने वाले कदम (ग्रैप) | साभार : इंडियास्पेंड

ग्रैप में वायु की गुणवत्ता का एक नया स्तर ‘आपात’ जोड़ा गया है. इसके मुताबिक लगातार 48 घंटे या इससे अधिक वायु में पीएम 2.5 का स्तर 300 एमजी/मीटर3 और पीएम 10 का स्तर 500 से ऊपर होने पर इस स्थिति का ऐलान किया जाता है. इसके अलावा प्रदूषण नियंत्रण के लिए उठाए जाने वाले कदमों की एक सूची जारी की गई है. इस पर काम करने के लिए अलग-अलग संस्थानों के बीच काम का बंटवारा भी किया गया है. उदाहरण के लिए, जरूरी सेवाओं को छोड़कर दूसरे राज्यों से दिल्ली आने पर रोक लगाने का काम नगर निगमों और दिल्ली-एनसीआर ट्रैफिक पुलिस के हवाले किया गया है. इसके अलावा सार्वजनिक परिवहन की सुविधा में बढ़ोतरी की जिम्मेदारी दिल्ली परिवहन निगम, दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) और राज्य परिवहन निगमों (एनसीआर में) को दी गई है.

हवा की गुणवत्ता बहुत खराब होने पर उठाए जाने वाले कदम और इसके लिए जिम्मेदार पक्ष | साभार : सीपीसीबी
हवा की गुणवत्ता बहुत खराब होने पर उठाए जाने वाले कदम और इसके लिए जिम्मेदार पक्ष | साभार : सीपीसीबी

जानकारों का मानना है कि दिल्ली-एनसीआर में लोग साफ हवा में सांस ले पाएं, इसके लिए सभी पक्षों (सरकारें और संस्थाएं) को साथ आकर काम करना होगा. लेकिन, जमीन पर इस समस्या के समाधान को लेकर स्थिति ठीक इसके उलट नजर आ रही है. दिल्ली-एनसीआर में स्मॉग के बीच उनके द्वारा अपनी जिम्मेदारियों से बचने और ठीकरा दूसरे पर फोड़ने का सिलसिला भी शुरू हो चुका है.

बीते गुरुवार को 20 नए एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशनों का उद्घाटन करते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पड़ोसी राज्यों पर निशाना साधा. उन्होंने कहा, ‘दिल्ली के हर साल एक महीने ‘गैस चैंबर’ बनने की मुख्य वजह पंजाब और हरियाण में फसल के बाकी हिस्से को खेतों में जलाना है.’ इसके साथ ही अरविंद केजरीवाल ने कहा कि इस समस्या के समाधान पर काम करने के लिए सभी राज्यों (दिल्ली और इसके पड़ोसी राज्य) को साथ आना होगा.

उधर, पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने अरविंद केजरीवाल को भी निशाने पर लिया. उन्होंने कहा, ‘अरविंद केजरीवाल अजीब शख्स हैं, स्थिति समझे बगैर सभी मुद्दों पर राय देने लगते हैं’ उनका यह बयान अरविंद केजरीवाल द्वारा धान की पराली को जलाने के बजाए जमा करने की सलाह दिए जाने पर आया. इनके अलावा हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री अनिज विज कहना है कि दिल्ली सरकार को उनके राज्य के किसानों को मुआवजा देना चाहिए क्योंकि, दिल्ली के लोग भी उनके द्वारा उगाया गया अनाज खाते हैं.

यानी सरकारों को इस स्मॉग में अपनी-अपनी जिम्मेदारियां भले न दिखतीं हो, लेकिन दूसरों की कमियां जरूर दिख रही हैं. दूसरी तरफ, आम जनता हर साल की तरह इस साल भी जहरीली हवा को फेफड़ों में भरकर ही अपनी जिंदगी को पटरी पर चलाने की जद्दोजहद में लगी दिखती है.