निर्देशक : रत्ना सिन्हा

लेखक : कमल पांडेय

कलाकार : राजकुमार राव, कृति खरबंदा, मनोज पाहवा, गोविंद नामदेव, नवनी परिहार

रेटिंग : 2.5/5

बीते दिनों बॉलीवुड में महिला फिल्म निर्देशकों ने सबसे ताजा कहानियों और बेहतरीन ट्रीटमेंट के साथ कुछ देखने लायक फिल्में बनाईं. क्रिटिक्स के साथ आम दर्शकों ने भी इन्हें हाथों-हाथ लिया. शादी में जरूर आना से एक और महिला निर्देशक रत्ना सिन्हा ने बॉलीवुड में एंट्री की है और अपनी पहली फिल्म से बता दिया है कि वे भी मनोरंजक के साथ सार्थक या कहें तो ‘मीनिंगफुल’ सिनेमा बनाने का इरादा रखती हैं. यहां पर यह जानना दिलचस्प है कि इस शुक्रवार रिलीज हुई दोनों फिल्मों का विषय प्यार-रिलेशनशिप-शादी है और दोनों की ही निर्देशक महिलाएं हैं. दूसरी फिल्म तनुजा चंद्रा निर्देशित करीब-करीब सिंगल है.

अब ‘शादी में जरूर आना’ पर पहुंचें तो कानपुर-लखनऊ के आस-पास घूमती इस कहानी की शुरूआत रिश्ते के लिए लड़का-लड़की देखने-दिखाने से शुरू होती है. इस क्रम में फिल्म के दोनों मुख्य किरदार आपस में मिलते हैं और फिर जैसा कि आमतौर पर फिल्मों में होता है, वे एक-दूसरे को मना करने का इरादा करके जाते हैं लेकिन पसंद कर बैठते हैं. इसके बाद फिल्म रोमांटिक गानों के बजाय कुछ ईमानदार प्रेम दृश्य दिखाती है. इन्हें देखकर कोई भी अरेंज मैरिज करने वाला जोड़ा इनसे खुद को जोड़ सकता है. फिल्म इन सबके साथ इश्क और सरकारी नौकरी की, दोनों की चाह को लेकर चलने वाली उधेड़बुन को भी दिखाती है, जो अब भी छोटे शहर के लोगों की जिंदगी का हिस्सा है. हालांकि यह सब अच्छा लगने के बावजूद, बीच-बीच में ट्विस्ट के नाम पर चलने वाली लंबी-चौड़ी खींचतान आपको पकाती भी खूब है.

फिल्म का दूसरा हिस्सा मानो – प्यार, जंग और फिल्म में सब जायज है - कहते हुए रोमांच की कुछ किस्तें पेश करता है. तब तक फिल्म लव और रिवेंज स्टोरी होने में इतनी भ्रमित हो चुकी होती है कि मतलब की बात सलीके से कहने का मौका भी चूक जाती है. इसके बाद रही-सही कसर क्लाइमैक्स का लंबा इंतजार पूरी कर देता है. आखिरकार, फिल्म एक ऐसे अंत को प्राप्त होती है जो बतौर सिनेमाप्रेमी आप नहीं चाह रहे होते हैं.

अभिनय की बात करें तो राजकुमार राव इस फिल्म में बंबइया फिल्मों के हीरो वाला हर करतब करते नजर आए हैं. यानी वो सब, जिसके लिए वे जाने नहीं जाते. वे नाचते-गाते हैं, कभी टशन तो कभी अदाएं दिखाते हैं, यहां तक कि हीरोइन के लिए मार-पीट भी करते हैं. कई बार ऐसा लगता है कि वे शाहरुख खान बनने की हर शर्त पूरी कर देना चाहते हैं. हालांकि यह सब करते हुए भी वे ही हैं जो स्क्रीन पर आंखें टिकाए रखने की सबसे बड़ी वजह बनते हैं. राज-रीबूट और गेस्ट इन लंदन से पहचानी गई कृति खरबंदा पूरी फिल्म के दौरान बेहद खूबसूरत लगती हैं. अभिनय भी वे ठीक-ठाक करती हैं, लेकिन राजकुमार राव के साथ गैर-रूमानी दृश्यों में फीकी सी पड़ जाती हैं.

अब तक टीवी की दुनिया से ताल्लुक रखने वाली रत्ना सिन्हा का एक परिचय यह भी है कि वे फिल्म निर्देशक (तुम बिन, रा-वन फेम) अनुभव सिन्हा की पत्नी भी हैं. रत्ना ने इस फिल्म से बतौर निर्देशक डेब्यू किया है. शादी पर आजादी को वरीयता देने वाली नायिका की कहानी दिखाती उनकी पहली फिल्म भले ही पूरी तरह न सध पाई हो, लेकिन उनके हुनर और संभावनाओं की झलक तो दे ही देती है.

फिल्म के संगीत, सिनेमैटोग्रॉफी और लोकेशंस की बात करें तो हर चीज आपका ध्यान खींचती है. लेकिन पटकथा के झोल और निर्देशन में हुई कुछ गलतियां इस रंगीन कहानी को मजबूती से वह बात कहने से रोक देती हैं, जिसे कहने के उद्देश्य से इसे बनाया गया था. फिर भी बराबर खूबियों-खामियों के साथ ‘शादी में जरूर आना’ कुल मिलाकर एक औसत मनोरंजक फिल्म बन जाती है. आप इस शादी में शामिल होकर निराश नहीं होंगे.