संजय लीला भंसाली के निर्देशन में बनी ‘पद्मावती’ एक दिसंबर को रिलीज होनी है. लेकिन कई राज्यों में वितरक इसे लेकर हिचक रहे हैं. इनका कहना है कि फिल्म की रिलीज इससे जुड़े ‘विवाद’ का निपटारा होने के बाद हो. इसी वजह से भंसाली को एक वीडियो जारी करना पड़ा जिसमें उन्होंने सफाई दी है कि वे रानी पद्मावती की कहानी से हमेशा प्रभावित रहे हैं और यह फ़िल्म उनकी वीरता और बलिदान को नमन करती है.

पद्मावती के निर्माता-निर्देशक ने वीडियो में यह भी स्पष्ट करने की कोशिश की है कि फिल्म में रानी पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी के बीच ऐसा कोई दृश्य नहीं है जिससे किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे. सिर्फ 20 दिन बाद ही यह फिल्म रिलीज होनी है और जाहिर है कि यह समय फिल्मकार के लिए बेहद कीमती है. इसमें म्यूजिक लॉन्च होना है, एक्टरों के पब्लिसिटी टूर होने हैं, फाइनल एडिटिंग भी इसी बीच होगी और फिल्म के लिए केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) का सर्टिफिकेट भी लिया जाना है. लेकिन यह उदाहरण बताता है कि भारत में कारोबार करना, खासकर जब वो किसी कला से जुड़ा हो, बहुत मुश्किल है.

हमारे यहां सरकारें या राजनीतिक पार्टियां अपने-अपने वोटबैंक के लिए फिल्मों को फुटबाल बना लेती हैं और फिर सुविधा के मुताबिक इस गोल पोस्ट से उस गोल पोस्ट तक उछालती रहती हैं. ऐसा कतई नहीं होना चाहिए. अगर भावनाएं आहत होने का दौर हमारे यहां ऐसे ही चलता रहा तो फिर सिनेमा अपनी चमक खो देगा और आखिरकार भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ बेअसर होने लगेगी.

पद्मावती को लेकर एक संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई है कि रिलीज से पहले इसे वरिष्ठ इतिहासकारों को दिखाया जाए और फिर वे तय करें कि इसमें इतिहास का सही चित्रण है या नहीं. लेकिन यहां यह समझने की जरूरत है कि इतिहास का रूपांतरण करना सिनेमा का अधिकार है. हर फिल्म डॉक्यूमेंटरी नहीं हो सकती. दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित फिल्मकारों में शुमार अकीरा कुरोसावा और ओलिवर स्टोन भी इतिहास के अलग-अलग संस्करणों को सामने लाने के हिमायती रहे हैं.

यहां इस बात का जिक्र करना भी जरूरी है कि कई प्रतिष्ठित इतिहासकारों के मुताबिक रानी पद्मावती का किरदार सन 1550 में एक सूफी कवि ने ईजाद किया था और इसका असल इतिहास से कोई ताल्लुक नहीं है. कुल मिलाकर अदालत को इस फिल्म का मामला सेंसर बोर्ड और आखिर में दर्शकों पर ही छोड़ना चाहिए. (स्रोत)