इस पुस्तक से :

‘रात को जाने क्या होता है हंसने लगती है / टीन की चादर पर जब बारिश में बजने लगती है

आंखों से जब मैले-मैले आंसू बहते हैं / मेरे कच्चे घर की मिट्टी, गलने लगती है

सारा दिन मैं इस दिल को दफनाता रहता हूं / रात को उठकर ये परछाईं, चलने लगती है

सावन में तो सारा घर ही सिसकियां लेता है / दीवारों से ऐसे सीलन रिसने लगती है

करवट लो तो सारे दर्द आवाजें करते हैं / बूढ़ी रात की हड्डी-हड्डी बजने लगती है

चैन आ जाये जब क़ब्रों में सोनेवालों को / क़ब्र की मिट्टी धीरे-धीरे दबने लगती है

नूर छलककर गिरता है तो ओक लगाता हूं / रात, घड़ोंची पर जब चांद को रखने लगती है.’


ग़ज़ल संग्रह : कुछ तो कहिये

ग़ज़लकार : गुलज़ार

प्रकाशक : वाणी

कीमत : 495 रुपये


कुछ लोग हमारे इर्द-गिर्द ऐसे हैं, जिनका साथ हम बेतहाशा चाहते हैं. जिनसे कई तरह से हम रूबरू होना चाहते हैं, बेवजह जब-तब मिलना चाहते हैं, एकटक देखना चाहते हैं, सुनना चाहते हैं या फिर पढ़ना चाहते हैं. ऐसी ही अनवरत ख्वाहिशों को जगाने वाले इंसानों में से एक हैं; गुलज़ार. गुलज़ार के चाहने वाले उनसे बहुत तरह से मिलते हैं. उनके शेरों में, ग़ज़लों में, कविताओं में, गीतों में, फिल्मों में, पटकथाओं में या फिर सीधे साक्षात्कार में. ‘कुछ तो कहिये’ नाम की किताब में पाठक शेरों, ग़ज़लों और त्रिवेणी (सिर्फ तीन पंक्तियों की कविता) के माध्यम से गुलज़ार से मिलते हैं...और उनसे होने वाली तमाम मुलाकातों की तरह यह मुलाकात भी पाठकों के लिए यादगार बन जाती है.

गुलज़ार के शेरों और ग़ज़लों में, रात और चांद से उनका इश्क साफ नज़र आता है. यह जानना मुश्किल है कि वे रात और चांद के बड़े आशिक हैं, या फिर ये दोनों उनके! बल्कि कभी-कभी तो शक होता है कि कहीं चांद चुपचाप उनके शब्दों की आभा को चुराकर ही तो रात को रौशन नहीं करता! रात और चांद के जिक्र से नुमाया उनके कुछ शेर-

‘नूर छलककर गिरता है तो ओक लगाता हूं / रात, घड़ोंची पर जब चांद को रखने लगती है...

रात ने अपनी थाली में / चांद परोसा लगता है...

चांद बैठा है सिरहाने शब के / रात की नब्ज़ बहुत मद्धम है...

कौन लपकेगा चांद को बढ़कर / रोज़ ये गेंद उछालता है कोई...

बे-सबब मुस्करा रहा है चांद / कोई साज़िश छुपा रहा है चांद...

छू के देखा तो गर्म था माथा / धूप में खेलता रहा है चांद...

चांद ने कल खिड़की पर आ कर दस्तक दी थी / मैंने उठ कर देखा बाहर कोई नहीं था / चिक पर चांदनी से कुछ लिखकर चला गया था!...

तभी तभी मेरी थोड़ी सी आंख लगी थी / चांद ने जब खिड़की पर आकर दस्तक दी थी / क्या तुमने कल, कुछ कहला कर भेजा था?’

इस संग्रह की जिन कुछ ग़ज़लों को गाया जा चुका है, उन्हें पढ़ते हुए बरबस ही उनका संगीत कानों में गूजने लगता है और फिर तुरंत उन संगीतबद्ध ग़ज़लों को सुनने की ख्वाहिश जगती है. गुलज़ार की ग़ज़लों की सबसे बड़ी खासियत है उनमें आने वाले रोज़मर्रा के शब्द. साधारण सी जिंदगी से बेहद जुड़े मामूली शब्दों को गुलज़ार अपने शेरों में कुछ इस तरह से गूंथ देते हैं कि वे शब्द आम न रहकर बेहद खास बन जाते हैं. लगता है जैसे; पेड़, बेल, चूल्हा, उपला, चौखट, मुंडेर, खिड़की, सिंदूर, संदूक, तसला जैसे शब्द उनकी ग़ज़लों में जगह पाकर पक्का इतराते होंगे. ऐसे ही रोर्जमर्रा के शब्दों से भरी एक ग़ज़ल -

‘पोटा-पोटा रोज़ उम्मीद बढ़ती है / बेल जिस तरह मुंडेर पर चढ़ती है

रोज़ एक दिन बजा के तोड़ना / मूंगफली है, ख़ाली भी निकलती है

दौड़-दौड़कर क़दम मिलाता हूं / ज़िन्दगी ये कितनी तेज़ चलती है

कांपती है आस-पास की ज़मीं / आठ-दस की रेल जब निकलती है

धज्जी-धज्जी, खिड़कियों, दरीचों पर / धूप जालों की तरह लटकती है

जाने किस तरफ़ से निकले आफ़ताब / रात कितनी करवटें बदलती है

नटनी की तरह खड़ी है ज़िन्दगी / डगमगाती है कभी संभलती है

या फिर

रोज़ यही लगता है कल के दिन उम्मीद बर आयेगी / शाम होते होते लेकिन फिर दिन का हमल गिर जाता है / रोज़ शफ़क़ पर, अंडे की ज़र्दी दिखती है फैली हुई!’

गुलज़ार का शिकायत का, तंज करने का लहज़ा भी इतना मासूम है कि पढ़कर प्यार आता है. कहीं-कहीं तो लगता है, जैसे वे दुश्मन को बारहा मौका देकर, अपना बना लेने का फन आज़मा रहे हैं. ऐसे ही मिज़ाज की एक ग़ज़ल है -

‘डूबता ही देखकर दौड़े थे साहिल की तरफ़ / रुक गये साहिल पे, मुझको देखकर, डूबा नहीं

दोस्तों कुछ देर ठहरो और साहिल पे ज़रा / एक मौक़ा और देना, मैं अगर डूबा नहीं

डूबने को ज़िन्दगी काफ़ी है कश्ती में मगर / एक तिनका और रख देना, अगर डूबा नहीं’

प्यार के इकरार और इज़हार का अंदाज भी गुलज़ार का सबसे निराला है. वे प्यार या इश्क जैसे शब्दों का इस्तेमाल किये बगैर ही प्यार की तीव्रता जता देते हैं. बल्कि यह कहना ज्यादा मुनासिब होगा कि उनके शेरों, ग़ज़लों या त्रिवेणी में इश्क की तीव्रता और गहराई महसूस करके पाठक अपने प्रेम को शिद्दत से याद करने को मजबूर हो जाएंगे. प्रेम से लबालब भरे कुछ शेर और त्रिवेणी -

‘शाम से आंख में नमी-सी है / आज फिर आपकी कमी-सी है

दफ़न कर दो हमें कि सांस आये / नब्ज़ कुछ देर से थमी-सी है...

तेरे ख़्याल में रहना उदास, अच्छा लगता है / क़रीब रहना तेरा आस-पास, अच्छा लगता है

ये दर्द, दर्द नहीं, एक कैफ़ियत-सी है / ये आंखें सूजी रहें बारह मास, अच्छा लगता है...

ये कटी-फटी हुई पत्तियां, और दाग़ हलका हरा-हरा / है रखा हुआ ये किताब में, मुझे याद है वो ज़रा-ज़रा

कोई चल रहा था अंधेरे में, और हाथ में रौशनी भी थी / वो भी आधी रात सड़क पे यूं, एक प्याला ले के भरा-भरा

मैं हकलाने लगा हूं, हिचकियां ले ले के सारा दिन / मुझे शक है कि सारा दिन तुम मुझे याद करती हो! / सुनो, क्या रात को अब नींद आने लग गयी तुमको?’

गुलज़ार को पढ़ना यूंजैसे कि रूठे हुए हों हम बेवजह ही, और ज़िन्दगी खुद चल के मनाने आ जाए... गुलज़ार को पढ़ना कुछ यूं, जैसे घर से सबके काम पर चले जाने के बाद, अकेले में उस लॉकर को खोलना, जिसमें पहले प्यार के कुछ खत और चंद निशानियां संभाल के रखे हों... गुलज़ार को पढ़ना कुछ यूं, जैसे बुढ़ापे में कुछ और ही ढूंढ़ते हुए अचानक से बेटी की छोटी-छोटी पहली पायल मिलें और खनक जाएं... गुलज़ार को पढ़ना कुछ यूं, जैसे किसी राह से गुजरते हुए अचानक से वो नज़रें टकरा जाएं, जिनमें कभी डूबा गया था... गुलज़ार को पढ़ना कुछ यूं, जैसे उस एक शख़्स का जिंदगीभर इंतज़ार करना,जिससे हमें बेतहाशा शिकायतें करनी थीं, पर उसके सामने आते ही शिकायतें आंखों से बह गईं हों और बस टूट के गले लग गए. यदि इनमें से किसी भी अहसास को आप शिद्दत से महसूस करना चाहते हैं, तो इस गज़ल संग्रह को पढ़ा जा सकता है.