निर्देशक : तनुजा चंद्रा

लेखक : कामना चंद्रा, गजल धालीवाल, तनुजा चंद्रा

कलाकार : इरफान खान, पार्वती, नेहा धूपिया, ब्रिजेंद्र काला, ईशा शरवानी

रेटिंग : 3 / 5

‘करीब करीब सिंगल’ में इरफान का किरदार कुछ ऐसा है कि बकौल फिल्म के एक संवाद, ‘पुराना स्कूटर तो बेच दिया है, लेकिन उसका शीशा रख लिया है.’ गुजरे वक्त के प्रति शायद यही मोह वजह रही होगी कि इस किरदार को लगता है कि उसकी बरसों पुरानी माशूकाएं आज भी उसकी याद में किलपती हैं. इसी वजह से नायिका के चुनौती देने के बाद वो नायिका के साथ ही उनसे मिलने तीन शहरों की यात्रा पर निकल पड़ता है, और जैसा कि इस तरह की फिल्मों में होता है, इस सफर के दौरान ये दोनों प्यार को पाते हैं और खुद को भी खोज पाते हैं.

लेकिन मुद्दे की बात यह है कि खुद पर मोहित सच्चे दिल वाले शायर के इस किरदार में इरफान खान एक बार फिर एकदम लाजवाब हैं. यह उनका ही हुनर है कि जो किरदार आसानी से फूहड़ और लफंगा हो सकता था, उसे वे प्यारा और हद दर्शनीय बना देते हैं. दूर से देखने पर योगी-वियोगी का यह किरदार ‘लाइफ इन अ मेट्रो’ और ‘हिंदी मीडियम’ के किरदारों के बेहद करीब का लगता है, लेकिन करीब जाकर देखो तो बतौर अभिनेता उनका हुनर आंखें चौंधिया देता है. चाहे रंग-बिरंगे कपड़े पहनने और छोटों को बेटा जी बोलने का अंदाज हो. सामने वाले के उन्हें नहीं समझने पर उदास आंखों और आधी मुस्कान से चेहरे को सजा लेना हो. या जब मन चाहा दर्शकों को चहका देना हो.

यकीन मानिए! इरफान खान के अभिनय में खोट निकालने का अब एक ही तरीका बचा है. एक राष्ट्रव्यापी प्रतियोगिता आयोजित कराई जाए और अभिनय में खोट खोज पाने वालों को तगड़ा इनाम देने की घोषणा की जाए. तब जाकर ही शायद एक-आध कमी दुनिया की नजर हो पाएगी!

बहरहाल, ‘करीब करीब सिंगल’ की कहानी यकीनन इम्तियाज अली का ट्रेडमार्क लिए हुए है. ऑनलाइन डेटिंग करते हुए मिले दो अजनबी तपाक से साथ सफर करने को तैयार हो जाते हैं और हिंदुस्तान के खूबसूरत शहरों में विचरते हुए अपने अंदर के विचलन को शांत करते हैं. साथ ही फिल्म में इम्तियाज अली मार्का एक लंबा होटल सीन मौजूद है और फिल्म की कहानी ऊपरी तौर पर रणबीर कपूर की फिल्म ‘बचना ऐ हसीनो’ की भी थोड़ी-सी याद दिलाती है. यह अच्छा है कि तनुजा चंद्रा ऑनलाइन डेटिंग को रोमांटिसिज्म का पैरहन पहनाने में कामयाब होती हैं और वे शुद्धतावादी लोग जो टिंडर वगैरह के माध्यम से प्यार पाने के विचार पर ही नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं, शायद इस फिल्म को देखने के बाद हमारे वक्त की इस जरूरत को लेकर थोड़े कम शंकित रहने लगेंगे.

खूबियों के बीच कुछ कमियों की बात करें तो फिल्म की सबसे बड़ी कमी इसका थर्ड एक्ट है, और खासकर इसमें आने वाला क्लाइमेक्स जो कि काफी निराशाजनक है. कहानी जब राजस्थान छोड़ने को होती है और गंगटोक में सफर करती है तब फिल्म बॉलीवुड के प्रेम-कहानियों से जुड़े स्टीरियोटाइप्स और क्लीशे उपयोग कर बेहद सतही होने लगती है. पूरी फिल्म में जो ठहराव व सहजता शामिल थी, वो यकायक फिल्म को जल्दी खत्म करने की मजबूरी तले दब जाती है और यह आसानी से महसूस हो जाता है. न जाने क्या वजह है, लेकिन अब ऐसा अकसर होने लगा है कि मंजिल आने के पहले पड़ने वाले अंतिम पड़ाव पर आकर हमारी फिल्में भयंकर रूप से आलसी हो जाती हैं.

लेकिन चूंकि बेहतरीन क्लाइमेक्स के न होने का यह मतलब कतई नहीं होता कि संपूर्णता में फिल्म खराब है, इसलिए ‘करीब करीब सिंगल’ करीब-करीब अच्छी फिल्म बनी रहती है. इसकी ‘दूसरी’ मुख्य वजह लेखन है, जो खासतौर पर गजल धालीवाल के लिखे संवादों से खूब निखरता है, और हर शहर के मुख्तलिफ मिजाज और स्वाद को पकड़ पाने का हुनर रखने की वजह से पटकथा को रोचक बनाए रखता है. खान-पान को लेकर भी फिल्म खूब संजीदा रहती है और दशहरी व सफेदा आम को लेकर उसका जो दर्शन है, वो हम जैसे आम के चहेते जानते हैं कि एकदम सच है!

लेखन के अलावा तनुजा चंद्रा के निर्देशन ने भी कई बरस बाद वापस से नैरेटिव फ्लो को पाया है और इससे भी फिल्म को फायदा हुआ है. लेकिन वह ‘पहली’ वजह जो फिल्म को आपके सबसे करीब ले आती है, तकनीकी न होकर इरफान व पार्वती के बीच की अलहदा केमिस्ट्री है. एक तो हमारे यहां 35-40 की उम्र के नायक-नायिका पर रियल सी लगने वाली प्रेम-कहानियां बनती नहीं, और अगर बन भी जाएं तो उन्हें ऐसी यादगार कास्टिंग नहीं मिलती. ‘करीब करीब सिंगल’ की सबसे बड़ी खूबी इन्हीं दो अदाकारों का साथ आना है जिनकी वजह से लेखन, संवाद व निर्देशन को भी वाजिब सहारा मिल पाता है.

खासकर मलयालम फिल्मों की अभिनेत्री पार्वती अपने अभिनय और स्क्रीन प्रेजेंस से अति का प्रभावित करती हैं. अगर इरफान खान इतने चमत्कारिक नहीं होते कि किसी भी रोल को अविश्वनीय ऊंचाइयों पर पहुंचाने का माद्दा रखते, तो यह फिल्म सिर्फ और सिर्फ पार्वती के लिए याद की जाती. बॉलीवुड में नायिका होने के नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाते हुए वे अपने किरदार अनुसार वजन बढ़ाती हैं, कपड़े सामान्य अर्बन कामकाजी महिलाओं वाले पहनती हैं और चेहरे पर मोटा चश्मा व जरूरत पड़े तो चिढ़-चढ़ाकर इतनी आत्मविश्वास से सुंदर अभिनय करती हैं कि आप निहाल तक हो सकते हैं.

क्या वे खुद को विद्या बालन समझती हैं!