हमारी फिल्मों और साहित्य ने हमें पहली नजर के प्यार का कॉन्सेप्ट सिखाया है. हमारे प्यार की फिलॉसफी में प्रेमी के रंग-रूप, गुण-अवगुण, ओहदा, सामाजिक हैसियत का कोई खास रोल नहीं होता. अगर कोई ये सब चीजें देखभाल कर प्यार करता है, खासतौर पर लड़कियां, तो उन पर मतलबी या मटेरियलिस्टिक होने का ठप्पा लग जाता है. ऐसा माना जाता है कि उनका प्यार सच्चा नहीं है.

लेकिन अब जब 21वीं सदी अपना 17वां साल खत्म करने जा रही है तो प्रेम के दर्शन में दर्शनीयता (या कहें प्रदर्शन) भी अपनी जगह बना चुकी है. हम लड़कियां भी आंख मूंदकर हमें मिलने वाले हर किसी से प्रेम कर लेने में यकीन नहीं करतीं. अब अक्ल-शक्ल-शरीर से लेकर सेलरी और कई बार जाति जैसी चीजें भी चेकलिस्ट में शामिल हो गई हैं. यानी वे सारी बातें जो प्रेमी या बॉयफ्रेंड को किसी के भी आगे पेश करने लायक बनाती हैं.

लड़कियां बॉयफ्रेंड चुनते हुए क्या सोचती हैं, यह बात बहुत हद तक सामाजिक-आर्थिक स्थिति, परवरिश और पढ़ाई-लिखाई या कहें कि उनके दिमागी स्तर पर भी निर्भर करती है. जैसे किसी छोटे से कस्बे में रहने वाली लड़की के लिए पैसा न के बराबर महत्व रख सकता है, वहीं दिल्ली जैसे महानगर की लड़की के लिए यह पहली चीज हो सकता है. पढ़ी-लिखी लड़कियां जो करियर को महत्व देती हैं वे बॉयफ्रेंड चुनते हुए उसका प्रोफेशन भी देखती हैं, जबकि घर बसाने का सपना देखने वालियां परिवार और रिश्तेदारों में इंटरेस्ट लेती हैं. कई बार वे यह सबकुछ एक साथ भी चाहती हैं. यानी हमारे लिए बॉयफ्रेंड चुनना रूबिक्स क्यूब सॉल्व करने से कम नहीं है.

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन कर रही संजना चक्रवर्ती सीधे सपाट शब्दों में कह देती हैं, ‘मेरा बॉयफ्रेंड मुझे प्यार करे, मेरे लिए ईमानदार रहे, करियर ठीक-ठाक रहे उसका और थोड़ा स्मार्ट और इंटेलिजेंट हो. बस इतना ही चाहिए.’ संजना के बस इतना ही चाहिए में लिस्ट के सारे पॉइंट्स चेक हो जाते हैं. रीवा, मध्यप्रदेश की प्राची मिश्रा सत्याग्रह से बातचीत करने के दौरान बहुत देर तक यह मानती ही नहीं कि वे बॉयफ्रेंड जैसी किसी चीज के बारे में सोचती हैं. सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रही प्राची हमारे - अगर बॉयफ्रेंड चुनना ही हो तो - की शर्त का जवाब देते हुए संजना वाली लिस्ट दोहराती हैं और इसमें दो बातें औऱ शामिल करती हैं. वे कहती हैं, ‘पहली, कि उसे मेरी बातें बिन कहे समझ जाना चाहिए और दूसरी कि वह मुझे और मेरे परिवार को सम्मान दे.’ इन सब शर्तों को पूरा करने के साथ बॉयफ्रेंड एक मजबूत इमोशनल सपोर्ट होना चाहिए जो हम लड़कियों की पहली जरूरत है.

अलग-अलग प्राथमिकताओं के बावजूद ज्यादातर लड़कियां यह देखती हैं कि लड़का उन्हें कितना महत्व देता है, कितना ख्याल रखता है और उनसे या किसी और लड़की से मिलने पर किस तरह से पेश आता है. लड़कियों के लिए पहले ही दिन से यह बात मायने रखती है कि बॉयफ्रेंड, मैरिज मटेरियल है या नहीं, उसे अपने किसी भी दोस्त या रिश्तेदार के सामने बेझिझक ले जाया जा सकता है या नहीं. इसके लिए सबसे जरूरी चीज है कि उसका व्यवहार अच्छा हो और एटिट्यूड थोड़ा कम हो.

एटिट्यूड वाली बात हमसे एनआईटी जमशेदपुर से मास्टर्स कर रही शर्वरी वागले भी कहती हैं. मजाकिया लहजे में वे बताती हैं कि उनके हिसाब से उनके बॉयफ्रेंड ढूंढने की पहली शर्त अब यह होगी कि वह पिछले वाले जैसा बिल्कुल न हो. केयरिंग, मैच्योर और उनके प्रोफेशन का होने के अलावा शर्वरी चाहती हैं कि बॉयफ्रेंड उनके माता-पिता का आदर करता हो, भगवान में विश्वास करता हो और साथ ही देशभक्त भी हो. परंपराओं को मानने वाले मराठी परिवार में पली शर्वरी बेहद मासूमियत से कहती हैं कि लड़के का मराठी होना भी जरूरी है, पर क्यों, इसका कोई ठोस कारण वे नहीं बता पातीं.

सरनेम पूछकर या जाति देखकर बॉयफ्रेंड बनाने से जुड़ा एक अनुभव मेरे पास भी है. कॉलेज के दौरान मैं कभी किसी को नहीं बता पाई कि मेरा भी बॉयफ्रेंड है, जो मुसलमान है. इसके अलावा मैंने कई बार अपने आस-पास की लड़कियों को यह कहते सुना है - ‘यार, वो मुझे बहुत अच्छा लगता है लेकिन फलां जाति का है, हमारा कुछ नहीं हो सकता तो बात बढ़ाने का क्या फायदा’ या ‘हां, हम फोन पर तो बात कर लेते हैं लेकिन मिलते नहीं क्योंकि लड़का ठाकुर है.’

हो सकता है, बहुत से लोगों को यह एक चौंकाने वाली बात लग रही हो लेकिन मैं सोचती हूं कि छोटे शहरों-कस्बों के कंजर्वेटिव-मध्यवर्गीय परिवारों में पली लड़कियों के लिए यह एक बड़ी चुनौती और शर्त होती है. भले ही उन्हें बॉयफ्रेंड से शादी नहीं करनी है लेकिन फिर भी साथ में चाट खाने या फोन पर बात करने के लिए भी लड़के का कुछ स्टैंडर्ड होना चाहिए जो सबसे पहले जाति से शुरू होता है. दूसरी जाति मे हुए अफेयर को ही यहां की लड़कियां शॉर्ट टर्म रिलेशनशिप कहती और मानती हैं.

पैसों की बात करें तो हर भारतीय लड़की ईमानदारी से यह स्वीकार करती है कि वह अपने बॉयफ्रेंड में यह जरूर देखती है कि उसमें पैसे कमाने की क्षमता कितनी है. अगर आज भले ही वह न कमा रहा हो तो कितनी संभावना है कि वह भविष्य में उनका जीवन स्तर ठीक-ठाक चलाने लायक कमा लेगा? रिलेशनशिप में जाते हुए लड़कियां यह भी जरूर सोचती हैं कि उन्हें इसके लिए नौकरी करने की जरूरत होगी या नहीं. अगर वे खुद पहले से नौकरी करती हैं तो चाहती हैं कि बॉयफ्रेंड की सेलरी उनसे ज्यादा हो और यह बात गांव-कस्बे की लड़की से लेकर लिबरल-मॉर्डन-मेट्रो सिटी में रहने वाली लड़कियों पर बराबरी से लागू होती है, कुछ अपवादों से इंकार नहीं है. हां, शार्ट टर्म रिलेशनशिप में लड़कियां केवल लड़के की जेब देखती हैं, वहां पर कंगाली हो तो वे फैमिली बैकग्राउंड जानना चाहती हैं, नहीं तो राम-राम कर लेती हैं.

दिल्ली के गार्गी कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य की छात्रा नूतन शर्मा बड़ी साफगोई से बताती हैं, ‘बॉयफ्रेंड (या गर्लफ्रेंड भी) हमेशा एक फैशन स्टेटमेंट की तरह होता है. उसे सामाजिक परिभाषाओं में फिट होना चाहिए. जिसे लोगों से मिलवाया जा सके, जिसके बारे में दोस्तों को बताया जा सके. इसके लिए उसका रिच, हैंडसम, इंटेलिजेंट और फनी होना निहायत जरूरी है.’ हालांकि इसके बाद नूतन बॉयफ्रेंड और प्रेमी को अलग-अलग कर देती हैं. नूतन का यह वर्गीकरण भी बहुत हद तक सही है. लड़कियों (और कुछ हद तक लड़को का भी) का एक तबका ऐसा भी है जो बॉयफ्रेंड, प्रेमी और पति में अलग-अलग खासियतें चाहता है. उदाहरण के तौर पर बॉयफ्रेंड फनी हो, प्रेमी समझदार और पति जवाबदार होना चाहिए. तीनों का कॉम्बिनेशन एक साथ मिलना मुश्किल होता है इसलिए जबावदार पति मिलने तक फनी बॉयफ्रेंड और समझदार प्रेमी जिंदगी में आते-जाते रहते हैं. हालांकि कई बार अगर लड़के के पास ढेर सारे पैसे हैं तो बाकी सारे बातें किनारे धरी रह जाती हैं.

रंग-रूप का जो पैमाना लड़कियां चुनते हुए सबसे पहले आता है, लड़कों के मामले में यह सबसे आखिर में आता है. प्राची और संजना की टिप्पणी पर गौर करें तो उनका कहना है कि लड़के का स्मार्ट होना जरूरी है. थोड़े सा फैशनेबल बाल, कपड़ों और सही चाल-ढाल के साथ कोई भी औसत रंग-रूप-गठन का लड़का स्मार्ट लग सकता है. इस मामले में भी अलग-अलग कारणों बॉयफ्रेंड चुनती हैं. अगर कोई लड़की बहुत सुंदर है तो वह यह भी चाह सकती है कि उसका बॉयफ्रेंड उसकी टक्कर का हो और यह भी कि उससे कम सुंदर हो, जिससे हर जगह सेंटर ऑफ अट्रैक्शन वही बनी रहे.

इसके उलट नोएडा में रह रही मीडिया प्रोफेशनल कंचन शुक्ला अपने सांवले रंगरूप के कारण खुद को कम सुंदर मानती हैं, लेकिन चाहती हैं कि उनका बॉयफ्रेंड उनसे कम सुंदर हो जिससे उन्हें कोई कॉम्प्लेक्स न हो, वहीं नूतन भी सांवले रंग की हैं, लेकिन उनका कहना है कि बॉयफ्रेंड के मामले में उन्हे रणवीर कपूर से कम कुछ भी नहीं चलेगा. यह सही है कि ये सभी लड़कियां शारीरिक संरचना देखकर प्रभावित जरूर होती हैं. इसके बावजूद बॉयफ्रेंड में रंग-रूप के पैमाने पर क्या चाहिए, कह पाना मुश्किल है.

इतना सब सोचने के बावजूद ज्यादातर मौकों पर लड़कियां अपने लिए गलत लड़के चुनती हैं, ऐसा शोध बताते हैं. सवाल-जवाबों की वेबसाइट कोरा डॉट कॉम पर इस सवाल का जवाब यह है कि अच्छे लड़के आस-पास मौजूद तो होते हैं लेकिन वे अक्सर हमारा ध्यान खींच पाने से चूक जाते हैं. खैर, शोध और चर्चाएं कुछ भी कहते हों, लेकिन हम अब अपने चुने की जिम्मेदारी भी लेती हैं और स्वीकार करती हैं कि बॉयफ्रेंड चुनते हुए हम अब दिल ही नहीं दिमाग और आंखें भी खुली रखती हैं. बराबरी पर खड़े होने के बावजूद हमें प्यार करने वाले, हमारा ख्याल रखने वाले और हमारे दिल की बात सुनने वाले उस साथी की हमें हमेशा जरूरत है. इसके बदले न सिर्फ हम खुद बल्कि सारी दुनिया उस एक के कदमों में बिछा सकती हैं. और हां, हमारा फेमिनिज्म इसके आड़े कभी नहीं आता.

चलते-चलते, फिल्म दम लगा के हईशा का वो गाना याद दिला देते हैं जिसके बोल है - सोबर, स्वीट, हाई इनकम ढूंढेंगे... नॉट टेम्परेरी, परमानेंट ढूंढेंगे.