क्या हम ऐसे विश्वविद्यालय बना रहे हैं या क्या हमारे पास पहले से ऐसे विश्वविद्यालय हैं जिनसे समाज को फर्क पड़ता हो? यह प्रश्न पंकज चंद्रा की किताब ‘बिल्डिंग यूनिवर्सिटीज दैट मैटर’ के मूल में है. किताब का उपशीर्षक ‘व्हेयर आर इंडियन यूनिवर्सिटीज गोइंग रॉन्ग’ यह स्पष्ट कर देता है कि दरअसल हमारी उच्च शिक्षा से गहरी निराशा ही पहले प्रश्न को जन्म देती है. क्या इसमें यह निहित है कि हम ऐसे विश्वविद्यालय बना ही नहीं सकते?

पंकज चंद्रा अपनी किताब में दुनिया भर के विश्वविद्यालयों के बनने और बाद में बने रहने की कहानी पर नज़र डालते हैं और समझने की कोशिश करते हैं कि क्यों ऑक्सफ़ोर्ड या हार्वर्ड लंबे समय तक अपनी श्रेष्ठता बनाए रख पाते हैं और क्यों भारत में श्रेष्ठ माने जाने वाले संस्थान पचीस बरस गुजरते न गुजरते अपनी चमक खोने लगते हैं. ऐसा नहीं कि हमारे पास ऐसे संस्थान बिलकुल नहीं. इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस या टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च जैसी संस्थाएं हैं और इससे यह मालूम होता है कि यह नहीं कि भारत में इसकी क्षमता या संभावना ही नहीं. लेकिन क्यों ये अपवाद बने रहने को अभिशप्त हैं?

यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है, जैसा पंकज अपनी पुस्तक में विस्तार से बताते हैं, कि श्रेष्ठता यदि अपवाद हो तो उसका अपने भव्य अकेलेपन में टिके रहना बहुत कठिन होता है, अगर असंभव न हो तो भी. क्योंकि शिक्षा में श्रेष्ठता की संस्कृति विकसित करनी होती है और इसके लिए नीचे से लेकर ऊपर तक कई स्तरों और जगहों पर प्रयास करने होते हैं. श्रेष्ठता का संबंध अपने जीवन की गुणवत्ता को लेकर कुछ महत्वाकांक्षाओं से भी है - क्या समाज औसतपन की ज़िंदगी से संतोष कर लेता है या वह शिक्षित होकर ऊंची ज़िंदगी जीना चाहता है?

सरकार का यह कहना कि वह विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय बनाने को संकल्पबद्ध है एक खोखला जुमला लगता है, वह इसलिए कि जो विश्वविद्यालय अभी हैं उनके साथ उसके व्यवहार से श्रेष्ठता के सिद्धांत को लेकर उसकी प्रतिबद्धता में यकीन नहीं जगता.

पंकज चंद्रा का कहना है कि श्रेष्ठ संस्थाएं सिर्फ इच्छा या कुछ व्यक्तियों से नहीं बल्कि कुछ सांस्थानिक प्रक्रियाओं और संस्कृति के प्रति सावधानी के चलते ही विकसित हो पाती हैं. दूसरे, किसी भी ऐसी संस्था के लिए पहली शर्त उसकी पूर्ण स्वायत्तता है. समाज, जिसकी तरफ से सरकारें काम किया करती हैं यकीन करे कि विश्वविद्यालय अपनी देखभाल खुद कर सकते हैं और उनके कामकाज और उनकी ज़िंदगी में कोई दखल न दे. स्वायत्तता को पुरस्कार या मेहरबानी और सुविधा न मानकर अनिवार्यता माना जाना चाहिए. अगर अभी विश्वविद्यालय को यह कहा जाए कि पहले वह साबित करे कि वह स्वायत्तता के लायक है फिर उसे यह दी जाएगी तो यह गाड़ी को घोड़े के आगे बांधने जैसी बात है.

मसलन, जब नालंदा विश्वविद्यालय के निर्माण का ऐलान हुआ तो शुरू से ही कहा जाने लगा कि वह एक विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय होगा. लेकिन यह मालूम हुआ कि कुलपति के चयन से लेकर पाठ्यक्रम तक के निर्माण में उसने विश्व स्तर पर स्वीकृत प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया, बल्कि श्रेष्ठ पुरुषों की अनौपचारिक निर्णय क्षमता पर विश्वास किया. फल यह है कि आज वह विश्वस्तरीय वेतन के बावजूद किसी भी मामूली राज्यस्तरीय विश्वविद्यालय के बराबर ही माना जा रहा है. अध्यापक और छात्र, दोनों ही उसे छोड़कर जा रहे हैं.

भारत में इसीलिए यह असंभव लगता है. पंकज केंद्रीय विश्वविद्यालयों के साथ-साथ राज्यों के विश्वविद्यालयों पर भी नज़र डालते हैं और निजी विश्वविद्यालयों की भी पड़ताल करते हैं. उनका निष्कर्ष यह है कि प्रायः हर जगह सरकारी या मालिकों की गैरज़रूरी दखलंदाजी दिखलाई पड़ती है.

विश्वविद्यालय के घटक कौन-कौन से हैं और उनका एक-दूसरे के साथ क्या रिश्ता है? छात्र, शिक्षक और विश्वविद्यालय को चलाने वाले प्रशासक स्पष्ट रूप से दिमाग में उभरते हैं. छात्र किसी विश्वविद्यालय को क्यों चुनते हैं? आम तौर पर इसका उत्तर होना चाहिए कि वे विभिन्न विश्वविद्यालयों की तुलना करते हैं और देखना चाहते हैं कि अध्ययन-अध्यापन के लिहाज से कौन बेहतर है. हाल में एक ऐसे मित्र से बात हो रही थी जो शिक्षा के निजीकरण के विरुद्ध हैं. उनकी बेटी ने दिल्ली विश्वविद्यालय की जगह अशोका यूनिवर्सिटी को चुना. यह वे किंचित अफ़सोस के साथ बता रहे थे. इस विश्वविद्यालय से उनका गहरा रिश्ता रहा है लेकिन वे अपनी बेटी से बहस की हालत में भी न थे. अगर छात्र और अभिजन किसी सार्वजनिक संस्था से किनारा करने लगें तो मान लेना चाहिए कि उसके दिन पूरे होने वाले हैं.

पंकज यह पूछते हैं कि आखिर विश्वविद्यालय किसका है. चूंकि शिक्षक इनमें से सबसे लंबे वक्त तक परिसर में रहते हैं, वे स्वाभाविक रूप से उसके संबंध में किसी भी निर्णय में अपना पहला अधिकार मानते हैं. लेकिन भारत में यह किसी को अस्वाभाविक नहीं लगता कि विश्वविद्यालय के कुलपति के चुनाव में उसके शिक्षक समुदाय की कोई राय ली ही नहीं जाती. उसी प्रकार अधिकतर राज्यों में विश्वविद्यालय को इसका अधिकार नहीं कि वह अपने शिक्षक का चुनाव खुद कर सके. यह काम लोक सेवा आयोग जैसी संस्थाएं किया करती हैं. यह तो और भी असंभव है कि विश्वविद्यालय अपने छात्र का चुनाव करने का तरीका खुद तय कर सकें.

अगर हम दुनिया के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में कुलपति के चुनाव की प्रक्रिया को देखें तो वहां छात्र, शिक्षक और पूर्व छात्र तीनों ही अपनी भूमिका निभाते हैं. भारत में कुलपति के चयन का काम वैसे लोग करते हैं जिनका उस विश्वविद्यालय से कोई लेना-देना ही नहीं रहा है. मानो उस विश्वविद्यालय की उस वक्त की आवश्यकता को समझने और उसके मुताबिक़ प्रशासक चुनने पर विचार करना आवश्यक ही न हो!

पंकज को यह जानकर और भी ताज्जुब होगा कि भारत के अग्रणी माने जाने वाले विश्वविद्यालय में कई विभागों में शोधार्थी यह तय नहीं कर सकते कि उनके निर्देशक कौन होंगे और न शिक्षक ही अपने शोधार्थी का चयन कर सकते हैं.

पंकज यह ठीक कहते हैं कि स्वायत्तता के सिद्धांत की स्वीकृति के साथ यह समझना भी आवश्यक है कि विश्वविद्यालय एक संगठन है. उसमें अलग-अलग घटक होंगे और उनकी अपनी जगह निश्चित होगी, भूमिका भी. मसलन छात्र और अध्यापक अगर दीवारों के रंग और ईंट का प्रकार भी तय करना चाहेंगे तो इसका अर्थ यह है कि वे पूरी तरह से भ्रमित हैं. हां! पाठ्यक्रम क्या हो, यह प्रशासन अगर शिक्षक समुदाय को अलग रखकर तय करेगा तो फिर वह अपराध कर रहा है. भारत के विश्वविद्यालय जगत में काफी कुछ गड़बड़ी इन घटकों की अपनी-अपनी भूमिका को लेकर अस्पष्टता के चलते भी है.

पंकज इस प्रसंग में सांस्थानिक प्रक्रियाओं पर विशेष ध्यान देने को कहते हैं. ये लिखित और अलिखित दोनों ही होती हैं और इनके प्रति ईमानदारी की अपेक्षा सभी पक्षों से है. अकसर विश्वविद्यालय अपनी संस्कृति का हवाला देते हैं. अगर हरेक विश्वविद्यालय के संचालन की एक ही प्रक्रिया होगी तो फिर उनकी संस्कृति में विशिष्ट क्या है!

पंकज का बहुत भरोसा छात्र और शिक्षक राजनीति पर नहीं है. वे उसे भी भारत की उच्च शिक्षा के पतन का कारण मानते हैं. इस पर बहस हो सकती है कि क्या यही मुख्य कारण हैं या ये आनुषंगिक हैं? क्या बनारस हिंदू विश्वविद्यालय या इलाहाबाद विश्वविद्यालय के नष्ट होने का कारण छात्र राजनीति है या कुछ और! इनमें प्रमुख है शिक्षकों के चयन की प्रक्रिया. इस चयन को लेकर सबसे अधिक समय और सावधानी चाहिए लेकिन पांच मिनट से पंद्रह मिनट के इंटरव्यू में अध्यापक ही नहीं कुलपति तक का चयन कर लिया जाता है. इससे संस्थान की अपने मुख्य कर्तव्य, यानी शिक्षण और शोध की गुणवत्ता के प्रति गंभीरता का पता चलता है.

ज़्यादातर विश्वविद्यालय संसाधनहीन हैं, हर मामले में. विभाग और कॉलेज शिक्षकों से खाली हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय सात साल से अस्थायी शिक्षकों के सहारे चल रहा है. इससे शिक्षण में किसी निरंतरता की संभावना नहीं रहती और न अध्यापक संस्था को अपना ही पाते हैं. पुस्तकालय में नई किताबों की खरीद नहीं होती. विश्वस्तरीय पत्रिकाओं के दर्शन राज्यों के कॉलेज के अध्यापकों को भी नहीं होते, न तो विज्ञान के अध्यापक उन उपकरणों के बारे में सोच भी सकते हैं जिन्हें जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय के छात्र इस्तेमाल करते हैं.

शिक्षण के बारे में भी राज्य और खुद शिक्षक समुदाय के भीतर की समझ पर बहस होना ज़रूरी है. शिक्षण और शोध के बीच एक आत्यंतिक रिश्ता है और इसलिए स्नातक स्तर के अध्यापकों का शोध के लिए अवकाश और साधन पर उतना ही हक है, यह समझना नीति निर्माताओं के लिए कठिन है. यह मान लिया गया है कि अध्यापन का ज्ञान के सृजन से कोई रिश्ता नहीं है.

पंकज चंद्रा की किताब निजी और उच्च शिक्षा के संसार भर के अनुभवों के सहारे यह कहती है कि भारत में श्रेष्ठता को हासिल करने के लिए विश्वस्तरीय प्रक्रियाओं को अपनाने की आवश्यकता है. विश्वविद्यालय के प्रसंग में किसी भी प्रकार के राष्ट्रवादी संकुचन से नुकसान ही होगा.