बीते सोमवार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तमिलनाडु के दौरे पर थे. इस दौरान उन्होंने तमिल भाषा के अखबार ‘दीना थांटी’ की 75वीं वर्षगांठ के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया. प्रधानमंत्री मोदी ने रजनीकांत के साथ-साथ भाजपा विरोधी माने जाने वाले द्रमुक प्रमुख के करुणानिधि और उनके बेटे एमके स्टालिन से भी मुलाकात की. नरेंद्र मोदी ने उन्हें दिल्ली आने का भी न्यौता दिया. इस मुलाकात के बाद द्रमुक ने नोटबंदी का एक साल पूरा होने के मौके पर इसका विरोध करने की योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया.

मीडिया रिपोर्टों की मानें तो नरेंद्र मोदी की इन नेताओं के साथ मुलाकात केवल औपचारिक नहीं थी. राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि भाजपा अब तमिलनाडु की राजनीति में अपनी जगह बनाने के लिए अन्नाद्रमुक (एआईएडीएमके) से आगे की संभावना तलाशना शुरू कर चुकी है. इससे पहले भाजपा नेतृत्व अन्नाद्रमुक के दोनों गुटों से साफतौर पर कह चुका है कि उनके एक साथ आने पर ही उन्हें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल किया जाएगा. तमिलनाडु में लोकसभा की कुल 39 सीटें हैं.

बीते गुरुवार को आयकर विभाग ने चेन्नई स्थित जया टीवी सहित कई कारोबारी संस्थानों के दफ्तर पर छापामारी की. इन पर फिलहाल सत्ताधारी अन्नाद्रमुक से बाहर निकाली गई वीके शशिकला और उनके परिवार का कब्जा है. बताया जाता है कि आयकर विभाग की इस कार्रवाई के पीछे केंद्र सरकार द्वारा कालेधन के खिलाफ सख्त रुख अपनाना है. उधर, पार्टी के नेता टीटीवी दिनाकरण ने इसे राजनीति से प्रेरित बताया है.

देश के कुछ प्रमुख अखबारों ने भी संपादकीय के जरिए इन मुद्दों पर अपनी राय रखी है. साथ ही, उन्होंने इनके पीछे की राजनीति की ओर भी इशारा किया है. दैनिक भास्कर आयकर विभाग की कार्रवाई को सीधे तौर पर नरेंद्र मोदी और द्रमुक नेताओं के साथ मुलाकात से जोड़कर देखता है. उधर, हिंदुस्तान टाइम्स और द टाइम्स ऑफ इंडिया ने भाजपा और द्रमुक के साथ आने पर दोनों के कई हित सधने और इससे तमिलनाडु की राजनीति में होने वाले बदलाव की ओर संकेत किया है.

दैनिक भास्कर ने आयकर विभाग की कार्रवाई को कानून की नजर से तो सही बताया है लेकिन, राजनीतिक लिहाज से अनुचित करार दिया है. बीती 10 नवंबर को अखबार ने अपने संपादकीय में कहा है कि मोदी-करुणानिधि मुलाकात के बाद पड़े ये छापे इनके राजनीतिक निहितार्थों की ओर संकेत करते हैं. इसके आगे शशिकला की फर्जी कंपनियों का जिक्र करते हुए दैनिक भास्कर का मानना है कि तमिलनाडु राजनीति और कारोबार के नापाक गठजोड़ का शास्त्रीय उदाहरण है और जयललिता के बाद की अन्नाद्रमुक की राजनीति इसमें आगे रही है. अखबार के मुताबिक हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि द्रमुक इस मामले में साफ-सुथरी है. आखिर में उसका कहना है कि तमिलनाडु की सरकार पर अपना नियंत्रण कायम रखने के बावजूद शशिकला के प्रभाव को कम करने में भाजपा अब तक नाकाम रही है. ऐसे में तमिलनाडु की राजनीति में अपनी जगह बनाने के लिए वह सभी तरह के तरीके अपना रही है.

उधर, द टाइम्स ऑफ इंडिया भाजपा और द्रमुक के संभावित गठजोड़ को दोनों पार्टियों के आपसी हित पूरे होने की नजर से देखता है. इस बारे में बीते बुधवार को अखबार कहता है कि तमिलनाडु के ताजा राजनीतिक हालात द्रमुक के पक्ष में दिखते हैं. दूसरी ओर, भाजपा को शायद इस बात का भान है कि तमिलनाडु की राजनीति में अकेले चलना उसके लिए फायदे का सौदा नहीं है. अखबार के मुताबिक अगर वह द्रमुक के साथ आती है तो अगले आम चुनाव में बहुमत हासिल न होने पर द्रमुक उसकी मदद कर सकती है. दूसरी ओर, द्रमुक को भी राज्य की सत्ता में आने पर केंद्र की सहायता मिल सकती है और इसके अलावा 2जी घोटाले पर भी फैसला आना बाकी है. अखबार की मानें तो द्रमुक नेताओं के साथ नरेंद्र मोदी की मुलाकात के बाद भाजपा अन्नाद्रमुक को भी सख्त संदेश देती हुई दिखती है.

उधर, हिंदुस्तान टाइम्स का कहना है कि नरेंद्र मोदी और करुणानिधि की मुलाकात को लेकर राजनीतिक मतलब तलाशना काफी जल्दबाजी होगी. इसके साथ ही अखबार ने द्रमुक और अन्नाद्रमुक में उत्तराधिकार को लेकर भी स्थिति साफ करने की कोशिश की है. बीते मंगलवार को संपादकीय में उसका कहना है कि द्रमुक में एके अलागिरि द्वारा थोड़ा विरोध किए जाने को छोड़ दें तो यह साफ है कि इस पार्टी की विरासत एमके स्टालिन में हाथों में ही आनी है. अखबार के मुताबिक इन बातों के अलावा वाजपेयी सरकार के वक्त का अनुभव बताता है कि अन्नाद्रमुक की तुलना में द्रमुक कहीं अधिक विश्वसनीय और कम मांग रखने वाली पार्टी है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि द्रमुक तमिलनाडु स्थित दूसरी पार्टियों से अलग है. अखबार मानता है कि इसका पहला मकसद केंद्र के साथ सबसे बेहतर डील करना रहा है.

इसके अलावा बीते गुरुवार को प्रकाशित संपादकीय में अखबार लिखता है कि वीके शशिकला के कारोबारी प्रतिष्ठानों पर आयकर विभाग की कार्रवाई का असर राज्य की राजनीति पर भी पड़ सकता है. उसके मुताबिक इससे अन्नाद्रमुक में अब भी खासा असर रखने वाला शशिकला खेमा कमजोर होगा.