सन 1981 और 1985 में पटेलों ने आरक्षण के विरोध में आंदोलन चलाया था, लेकिन आज आप आरक्षण लेने के लिए आंदोलन कर रहे हैं. इस बदलाव की वजह?

पाटीदारों को यह जरा सी बात समझने में इतने साल लग गए कि दहेज सिर्फ देने का विरोध किया जाता है, लेने का नहीं! अब्ब्ब...मेरा मतलब कि अब पटेल जान गए हैं कि आरक्षण में जो मलाई वितरण हुआ था, अब वह तो वापस होने से रही. सो अब हम अपने हिस्से की मलाई ही मांग लेते हैं.

लेकिन पटेल तो गुजरात के सबसे संपन्न तबके में आते हैं, फिर उन्हें आरक्षण की क्या जरूरत है?

देखिए, संपन्न लोगों के लिए ही माल-मलाई और सुख-सुविधा के बिना जीना ज्यादा मुश्किल है,...बाकी तो जैसे-तैसे काम चला ही लेते हैं. अब जैसे, पैसे वाला बिना एसी के सफर करने में पागल हो जाएगा, जबकि गरीब के पास बैठने को भी जगह न हो तो वो खड़े-खड़े सफर करने को राजी हो जाता है. अऽअ... मेरे कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि सारे पटेल संपन्न नहीं हैं.

यदि पटेलों को आरक्षण मिल जाता है तो कल समाज के बाकी संपन्न तबके भी आरक्षण की मांग करेंगे. ऐसे में क्या पिछड़ों और कमजोरों को आरक्षण देने की मूल भावना खत्म नहीं हो जाएगी?

आपको मूल भावना की पड़ी है, यहां अमीषा पटेल से लेकर मुनाफ पटेल तक कितने पटेलों के करियर खत्म हो गए! यदि अब भी पटेल समाज को आरक्षण न मिला तो बाकी के काबिल पटेलों के करियर का भी ऐसा ही बैंड बजेगा. अऽअ... मेरा मतलब है कि नेताओं और आप मीडिया वालों का चरित्र कितना दोहरा है. आप लोग अपनी मर्जी से असली पिछड़ों और कमजोरों को हाशिये पर पटककर, संपन्न लोगों को लाइमलाइट में रखने का फैसला कर लो तो वहां किसी की कोई भावना खत्म नहीं होती. और पाटीदारों के आरक्षण मांगने पर ऐसे दिखा रहे हो कि जैसे वे कितना बड़ा गुनाह कर रहे हैं!

अच्छा यह बताइये कि इस बार के गुजरात चुनाव में आपकी क्या खास भूमिका है?

मैं गुजरात चुनाव में लोगों को अपनी जड़ों की तरफ ले आया हूं.

क्या मतलब?

मेरा मतलब यह है कि जाति की जड़ें हमारे देश में अन्य किसी भी जड़ से ज्यादा गहरी और पुरानी हैं. भाजपा ने पुरानी जड़ों की तरफ लौटने का सिर्फ नाटक किया है. पार्टी ने गुजरात में जातिवाद की सदियों पुरानी जड़ों को ज्यादा अहमियत न देकर, उल्टे सांप्रदायिकता की नई जड़ें जमानी शुरू कर दीं! पर मैंने गुजरात चुनाव को धार्मिक ध्रुवीकरण से जातीय ध्रुवीकरण की ओर मोड़ने की जी तोड़ कोशिश की है. यही इस चुनाव की सबसे बड़ी खासियत है.

क्या आपको नहीं लगता कि जातिवाद और आरक्षण के बजाय, विकास को चुनाव का मुद्दा बनाया जाना चाहिए?

मुझे समझ नहीं आ रहा कि जिस देश में आरक्षण जैसा बड़ा मुद्दा हो, वहां विकास को कैसे याद किया जाता है! अऽअ...मेरे कहने का अर्थ यह है कि आरक्षण विकास विरोधी कहां है. हम तो आधे-अधूरे आरक्षण से विकास के मौकों की जो बंदरबांट हुई है, बस उसके सही-सही बंटवारे की बात कर रहे हैं ताकि विकास की क्रीम अगड़ों-पिछड़ों सबको बराबर मिले. वैसे आप तो ऐसे दिखा रही हैं जैसे मीडिया के लोगों को सच में विकास के मुद्दे से बहुत लेना-देना है. जब आप लोग बड़े-बड़े जरूरी मुद्दों को छोड़कर गोरक्षा या हिंदू कट्टरता जैसी फालतू की चीजों को मुख्य मुद्दा बनाते हैं, तब आप लोगों को विकास याद नहीं आता!

अच्छा यह बताइये कि पाटीदार आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता क्या है?

पाटीदार आंदोलन गुजरात चुनाव को भी यूपी, बिहार की तरह; विकास से जाति तक ले आया, इससे बड़ी सफलता और क्या होगी!

कांग्रेस के साथ आपके गठबंधन की क्या गुंजाइश है?

गठबंधन हो या नहीं, मुझे उनसे बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं हैं.

वह क्यों?

वे राजनीति की परीक्षा में एक पप्पू को तो पास करा नहीं सके आज तक, पटेलों को उनका हक क्या ही दिलवाएंगे! अब्ब्ब...मेरा मतलब है कि अभी उनके वकील कपिल सिब्बल से बात होने वाली है, उसके बाद ही कुछ साफ होगा कि क्या स्थिति है.

आपका मुख्य लक्ष्य भाजपा को हराना है लेकिन अमित शाह को लगता है कि कांग्रेस के साथ आपका समझौता भाजपा को जिताने में मदद करेगा. इस पर क्या कहेंगे?

कमाल है, अहमद पटेल से पटखनी खाने के बाद अब तक भी अमित शाह, पटेलों को इतना कम आंक रहे हैं!

गुजरात में पटेल समुदाय सिर्फ 16 प्रतिशत ही है फिर भी पूरे चुनाव में सिर्फ पटेलों का मुद्दा ही हावी है. क्या बाकी के 84 प्रतिशत लोगों के कोई मुद्दे अहम नहीं हैं?

मैं कड़वा पटेल हूं. यदि आप ऐसे कड़वे सवाल पूछने से बाज न आईं तो मैं पूरे खाने... मतलब कि इंटरव्यू का स्वाद बिगाड़ दूंगा!

क्या मतलब, मैं समझी नहीं?

मतलब यह कि गुजराती पटेलों में दो समुदाय हैं. एक लेउवा पटेल, दूसरा कड़वा पटेल. मैं कड़वा पटेल हूं. भाजपा के खाने का स्वाद तो मैं कड़वा कर चुका, सो आपको मुझसे संभलकर सवाल करने चाहिए.

पर पाटीदार तो राज्य का सबसे अगड़ा समुदाय है. उससे ज्यादा तो पिछड़ी जातियों के मुद्दे चुनाव में हावी होने चाहिए थे.

कमाल है, पूरे देश में एक-दो प्रतिशत लोग बाकी के 98 प्रतिशत पर हावी हैं, उस पर आपको कोई आपत्ति नहीं है. मुल्क के सबसे ज्यादा संपन्न लोगों के विकास और मुनाफे के हिसाब से पूरे देश की नीतियां बन रही हैं, उस पर भी आप लोगों को कुछ नहीं कहना. लेकिन संपन्न पाटीदारों के मुद्दा बनने पर आप लोगों को बड़ी दिक्कत है. एक बार जरा आरक्षण मिल जाए, फिर आप लोगों के इस दोगले रवैये के खिलाफ भी आंदोलन करूंगा मैं.

फिर भी चुनाव तो सबके लिए है न. क्या चुनाव में सभी समुदायों के मुद्दे नहीं उठने चाहिए?

जैसे चुनाव सबके लिए है, वैसे ही मैं चाहता हूं कि आरक्षण भी सबके लिए हो! अब्ब्ब मेरा मतलब कि सभी के लिए चाहे हो या न हो, पर पाटीदारों के लिए जरूर हो.

आपका मानना है कि आरक्षण का आधार जाति के बजाय आर्थिक होना चाहिए. यह माहौल बनाने में पाटीदार आंदोलन कितना सफल हुआ?

उतना ही जितना नोटबंदी काले धन को रोकने में सफल हुई!

फिलहाल आपकी सबसे बड़ी मुश्किल क्या है?

मैं 25 साल का नहीं हूं, यही सबसे बड़ी मुश्किल है क्योंकि लोहा अभी जितना गर्म है उतना अगले चुनावों तक नहीं रहेगा. मुझे कांग्रेस को प्रत्याशियों की लिस्ट देनी है और उसमें मेरा ही नाम नहीं होगा... चुनावी मुद्दों के केन्द्र में होकर भी मैं खुद चुनाव नहीं लड़ सकता; इससे बड़ी और क्या मुश्किल होगी भला.

अच्छा यह बताइये कि जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर के साथ मिलकर, आपके तीसरा मोर्चा बनाने की कितनी संभावना है?

मैं पाटीदारों का नेता हूं, न कि अगड़ी-पिछड़ी जातियों की दूरी को पाटने वाला नेता! अब्ब्ब...मेरे कहने का अर्थ सिर्फ इतना है कि हम तीनों मिलकर यदि कोई मोर्चा बनाएंगे तो वो तीसरा नहीं बल्कि पहला मोर्चा होगा. आप पाटीदारों को तीसरे नम्बर पर क्यों धकेलना चाहती हैं!

आखिरी सवाल, क्या आपकी राह जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर से ज्यादा चुनौती भरी है?

देखिये आरक्षण के मसले पर अगड़ी जातियों की वही स्थिति है, जो बिना आरक्षित जगहों पर दलितों और पिछड़ों की है! अब्ब्ब...मेरे कहने का अर्थ सिर्फ इतना है कि हम तीनों के आरक्षण का प्रतिशत...अऽअ मेरा मतलब है कि हम तीनों के रास्ते और लक्ष्य बिल्कुल अलग हैं, सो आपस में कोई तुलना नहीं हो सकती.