13 नवंबर 2017 को मुक्तिबोध के सौ बरस पूरे हो जायेंगे. रायपुर में उनके जन्मशती समारोह में 12-13 नवंबर को लगभग 50 हिन्दी लेखक जुड़कर ‘अंधेरे में अन्तःकरण’ शीर्षक एक आयोजन में उन पर विचार-विनिमय करेंगे और यह तलाश करने की कि उनका आज आशय और अर्थ क्या है.

अज्ञेय-शमशेर-मुक्तिबोध की हमारी बृहत त्रयी में सबसे कम आयु मुक्तिबोध को ही मिली और वे अपने कठिन जीवन के 47 वर्ष भी पूरे नहीं कर सके. आज के मुहावरे में वे युवा ही दिवंगत हुए गो कि उनकी छवि एक बड़े बुजुर्ग की बन गयी. इस त्रयी में सबसे महत्वाकांक्षी अज्ञेय थे और लगभग निराकांक्षी थे शमशेर. मुक्तिबोध में महत्वाकांक्षा का कोई आभास नहीं मिलता. उनके साहित्य-संघर्ष के कई पहलू इस अवसर पर याद आते हैं. पहला यह कि वे जिस तरह की कविता लिखना चाह रहे थे उसका कोई मॉडल उपलब्ध नहीं था. उनके प्रेरणास्रोत तो रूसी उपन्यासकार तोल्यतोय, दोस्तोवस्की आदि थे. यह अटकल भी मैंने पहले लगायी कि उनकी कविताओं को एक अधूरे और असमाप्य उपन्यास की तरह पढ़ा जा सकता है. कविता की रूढ़ियां तोड़ने का उद्यम और उपक्रम बहुतों ने किया है और उन्हीं से हिंदी काव्य-परम्परा बनी है. पर मुक्तिबोध का रूढ़िभंजन इतना मूलगामी और दुस्साध्य था कि उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं हो सकता. इसीलिए में उन्हें कई दशकों से गोत्र-वंश-हीन कवि कहता आया हूं.

मुक्तिबोध में साहित्य, आलोचना, समाज आदि के विषय में अदम्य प्रश्नाकुलता थी. वे दी हुई सचाई को जस का तस स्वीकार करनेवाले, उसे नियति या अनिवार्य माननेवाले कवि नहीं थे. उनकी फ़ैण्टेसी की अवधारणा और व्यवहार इसीलिए विकल्पधर्मी कर्म है: वह वैकल्पिक सचाई का निरूपण है जो दी हुई सचाई में धंसकर उसका अतिक्रमण करता है. ज़ाहिर है यह एक जटिल प्रक्रिया है और इसके नजीजे कई बार जटिल और अबूझ तक हो गये. ऐसे किसी और कवि को याद करना असम्भव है जिसने अभिव्यक्ति के ख़तरे असम्प्रेषणीय हो जाने की हद तक जाकर उठाये पर अपने ‘ईमान की भाफ़’ ठण्डी नहीं होने दी, न ही अपने ‘अन्तःकरण के आयतन’ को संक्षिप्त होने दिया.

यह विस्मय की बात है कि आज जो राजनैतिक-आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियां हैं उनमें मुक्तिबोध की कविता पहले से अधिक सच्ची, अधिक खरी और प्रज्वलित, अधिक प्रासंगिक दिखायी देती है. उनका स्थापत्य बीहड़ है जैसे कि उसमें समाविष्ट सचाई और अनुभव भी. उसका पारा हमेशा ऊंचा चढ़ा हुआ है- वह बुखार में कविता है. उसमें राहत की जगहें कम हैं. पर वह गहरे आत्मालोचन और आत्मसन्देह में बद्धमूल है. वही मुक्तिबोध की कविता का ईमान है. सफलता की अन्धी दौड़ के अधीर समय में मुक्तिबोध की कविता हमें याद दिलाती है कि विफल होकर सार्थक और कालजयी हुआ जा सकता है. हर व्यावहारिक अर्थ में विफल मुक्तिबोध हमारे सबसे बड़े और सार्थक कवियों में से हैं तो इसका सबक यह भी है कि लोकप्रियता और सफलता से दूर सच्ची सार्थकता सम्भव है. यह सार्थकता ही सच्ची उपलब्धि है.

रचा लोकतंत्र

हमने भारत में लोकतंत्र अपनाया है और हमारे संविधान ने भारत को एक गणतंत्र के रूप में स्थापित किया है. राजनीति, आर्थिकी, समाजव्यवस्था, शिक्षा आदि में लोकतंत्र की उपस्थिति, शक्ति या कमज़ोरी, संभावना या निराशा पहचानी जाती रही है. पर हमने इस पर कम विचार किया है इस दौरान साहित्य में भी अपने ढंग से एक भारतीय लोकतंत्र की छाया, आभास, संकेत आदि सब हैं. उसमें लोकतंत्र का प्रश्नांकन, उसकी वैकल्पिक संभावना आदि को भी जगह मिलती रही है. लोकतांत्रिक निराशा और संभावना दोनों को हिसाब में साहित्य लेता आया है. बहुत कुछ उसमें संभव हुआ है क्योंकि वह एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में लिखा जा रहा साहित्य है. स्वयं उसमें कितना-कैसा लोकतंत्र है इस पर बहस होती रही है. अनेक विचार दृष्टियों के बीच द्वन्द्व और संवाद इसी लोकतंत्र के रहते संभव हुए हैं.

राजनीति में यह कहा जाता है कि लोकतंत्र और स्वतंत्रता निरन्तर चौकसी की मांग करते हैं. और वे एकबारगी मिल जाने के बाद अटल या अनिवार्य नहीं हो जाते हैं. साहित्‍य ने अकसर लोकतंत्र और स्वतंत्रता पर चौकसी करने का काम किया है. लोकतंत्र का दुरुपयोग कर स्वयं उसी में और स्वतंत्रता में कटौती की जा सकती है: हमारे समय में यह धड़ल्ले से दिन-दहाड़े हो रहा है. इस समय साहित्य ही वह अन्तःकरण है जो इस कटौती को लक्ष्य और उसका प्रतिरोध कर रहा है. यह अपने आप में एक लोकतांत्रिक वृत्ति है जिसे पोसना ज़रूरी और नैतिक है.

यह भी देखा जा सकता है कि कई ऐसे विमर्श पहले साहित्य में शुरू हुए हैं और फिर वे सक्रिय राजनीति में व्याप गये हैं. इनमें दलितविमर्श और स्त्री विमर्श का ज़िक्र किया जा सकता है. इन विमर्शों के उदय और विस्तार ने स्वयं साहित्य की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिकता में विस्तार किया है. लोकतंत्र एक मूल्य-व्यवस्था भी होता है जिसमें कई मूल्यों के बीच तनाव और द्वन्द्व भी अनिवार्यतः होते हैं. इन मूल्यों का सबसे सजय-सक्रिय बोध अब राजनीति में कम, साहित्य में ही सबसे अधिक बचा है. धीरे-धीरे जिस तरह से राजनीति-बाज़ार -धर्म-मीडिया आदि की दुरमिसन्धि हमारे राजनैतिक लोकतंत्र में हावी हो गयी है उसमें मूल्य-बोध का लगभग ग़ायब हो जाना एक ज़रूरी नतीजा है.

इस लोकतांत्रिक मूल्य-मूढ़ता या शून्यता में मूल्यों की रक्षा करने, उन्हें दृश्य पर सक्रिय रखने की ज़िम्मेदारी साहित्य ही निभाता है, निभा रहा है. जिस तरह के छल-छद्म को अब हर प्रकार की राजनीति में लगभग अनिवार्य माना-बरता जा रहा है उस तरह के छल का पर्दाफ़ाश करने का अप्रिय पर ज़रूरी काम साहित्य ही कर रहा है. इन दिनों जिस तरह की संकीर्णता, असहिष्णुता, नफ़रत, हिंसा और हत्या की राजनीति लगातार फैल रही है उसका सच्चा प्रतिपक्ष साहित्य ही है जहां इन निषेधात्मक मानव-विरोधी परम्परा-विरोधी अन्ततः लोकतंत्र-विरोधी वृत्तियों और तत्वों का कड़ा प्रतिरोध है. लोकतंत्र को कई ख़तरे हैं. उनमें से एक यह भी है कि वह अपने साहित्य की चेतावनियों और आवाज़ों की, उसके प्रतिरोध की अनसुनी-अनदेखी करे. हम एक निर्णायक मुक़ाम पर हैं और बेहद चौकन्नेपन और सजगता की ज़रूरत है. यह लोकतांत्रिक और नैतिक कर्तव्य एक साथ है.

पिछली सदी के सबक

अकसर समाज अपने अतीत से सबक हासिल करने में पिछड़ते रहते हैं जबकि बुद्धिजीवियों का एक ज़रूरी काम ऐसे सबकों पर इसरार करना है. येल विश्वविद्यालय में इतिहास के आचार्य टिमोथी स्नाइडर ने एक छोटी सी पुस्तक लिखी है ‘ऑन टिरेनी’ जिसे बाडले हैड लन्दन ने प्रकाशित किया है. उसमें बीसवीं सदी से बीस सबक बताए गए हैं. हालांकि वे सभी यूरोप के लोकतांत्रिक पतन पर केंद्रित हैं, उनमें से कई हमारे काम के हैं. जैसे कि यह बड़ा सबक कि लोकतंत्र अपराजेय व्यवस्था नहीं है और यूरोप में ही वह कभी फ़ासिज़्म, कभी नाज़ीवाद और कभी साम्यवाद में पतित हुई है जो कि तानाशाही के तीन संस्करण पिछली सदी में रहे हैं.

बीस सबक ये हैं: (1) अग्रिम आज्ञापालन मत करो, (2) संस्थाओं की रक्षा करो, (3) एक दलीय शासन से सावधान रहो, (4) दुनिया के चेहरे के लिए ज़िम्मेदारी लो, (5) व्यावसायिक नैतिकता याद रखो, (6) अर्द्धसैनिक इकाइयों से सशंक रहो, (7) अगर तुम सशस्त्र हो तो विचारशील भी रहो, (8) अलग से नज़र आओ, (9) अपनी भाषा के प्रति सदय रहो, (10) सत्य में विश्वास करो, (11) तहकीक़ात करो, (12) आंखों से आंखें मिलाओ और गपशप करो, (13) शारीरिक राजनीति बरतो, (14) निजी ज़िन्दगी बनाओ, (15) अच्छे लक्ष्यों के लिए योगदान करो, (16) दूसरे देशों के समानधर्माओं से सीखो, (17) ख़तरनाक शब्द सुनो, (18) जब अविचारित आए तो शान्त रहो, (19) देशभक्त रहो, (20) जितना हो सकते हो उतना साहसी होओ.

इन सबकों में से कुछ की चर्चा यहां की जा सकती है. संस्थाएं अपना बचाव खुद करने में समर्थ नहीं होतीं और अगर शुरू से उनका बचाव नहीं किया गया तो वे गिरती जाती हैं. राजनैतिक दल जो राज्य का स्वरूप बदलते और प्रतिद्वन्द्वियों को दबा देते हैं, शुरू से सर्वशक्तिसम्पन्न नहीं होते: वे एक ऐतिहासिक मुक़ाम का लाभ उठाकर अपने विरोधियों का राजनैतिक जीवन असम्भव कर देते हैं. बहुदलीय व्यवस्था को जीवित और सशक्त रखना ज़रूरी है. आज के प्रतीक कल की सचाई बन जाते हैं. स्नाइडर की सलाह है कि स्वस्तिक और घृणा के अन्य संकेतों पर ध्यान देना चाहिये. न तो उन्हें अनदेखा करो, न ही उनके अभ्यस्त हो जाओ. व्यावसायिक नैतिकता को लेकर वे कहते हैं कि जब राजनेता नकारात्मक उदाहरण बन जाते हैं तब व्यावसायिक प्रतिबद्धता ही न्यायसंगत प्रक्रिया बनाए रख सकती है. क़ानून के शासन के आधार पर चोट बिना वकीलों के या कि दिखावे की क़ानूनी कार्रवाई बिना जजों के संभव नहीं होती. सत्ताधारी आज्ञाकारी सिविल सेवक चाहते हैं और यातना शिविरों के संचालक ऐसे व्यापारी चाहते हैं जिन्हें सस्ते श्रम की दरकार हो. ‘अतिवाद’ और ‘आतंकवाद’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल के प्रति सजग रहें और ‘आपातकाल’ तथा ‘अपवाद’ जैसे पदों के प्रति भी. देशभक्त शब्दावली के दुष्ट उपयोग से नाराज़ होना चाहिये. स्‍नाइडर की चेतावनी है कि अगर हममें से कोई भी स्वतंत्रता के लिए मरने को तैयार नहीं है तो हम सब तानाशाही में मरनेवाले हैं.