शुक्रवार को वस्तु एवं सेवा कर परिषद की गुवाहाटी में हुई बैठक में कई अहम निर्णय लिए गए. इसमें कई वस्तुओं पर लगने वाले सेवा कर में कमी की गई. जिन वस्तुओं पर 28 फीसदी जीएसटी लगता था, उनमें से अधिकांश पर अब कम जीएसटी लगा करेगा. साथ ही केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता वाली जीएसटी परिषद ने रेस्टोरेंट के खाना खाने पर लगने वाले 18 फीसदी जीएसटी को कम करके पांच फीसदी करने का भी निर्णय लिया.

इस निर्णय के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली से प्रसन्नता जाहिर की. उन्होंने कहा कि यह सरकार लोगों को मिला-जुलाकर चलने वाली सरकार है और जीएसटी परिषद के इस निर्णय से आम लोगों को फायदा होगा. उन्होंने कहा कि उनकी सरकार जनतापरस्त है और सरकार का हर निर्णय जनता को केंद्र में रखकर लिया जाता है.

इसके पहले भी जब जीएसटी परिषद ने जीएसटी दरों में बदलाव किया था और सेवा देने वाले लोगों को जीएसटी रिटर्न भरने में राहत देने का निर्णय लिया गया था तो उस वक्त भी प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री सहित सरकार के दूसरे मंत्रियों, भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने इसे सरकार की एक बड़ी कामयाबी के तौर पर पेश किया था.

हिमाचल प्रदेश की अपनी चुनावी सभाओं में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार नहीं बल्कि जीएसटी में हो रहे बदलावों का बार-बार जिक्र किया. हिमाचल प्रदेश में चुनाव प्रचार करते वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जीएसटी परिषद की हालिया बैठक के बारे में भी कहा था कि इसमें लोगों को नई सौगात मिल सकती है. वे गुजरात की चुनावी सभाओं में भी वे ऐसा ही कर रहे हैं. वित्त मंत्री अरुण जेटली भी हर मंच पर ऐसी ही बात कर रहे हैं. जीएसटी के क्रियान्वयन का काम आधिकारिक स्तर पर देखने वाले राजस्व सचिव हसमुख अधिया भी इसी तरह की ही बात करते हैं.

कुल मिलाकर जीएसटी परिषद के हर ऐसे निर्णय के बाद एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि सरकार ने आम लोगों को राहत देने के मकसद से कितना बड़ा निर्णय लिया है. अगर थोड़ी सी बारीकी से पूरी स्थिति को देखा और समझा जाए तो ऐसे दावे उतने सीधे भी नहीं लगते.

देश में जीएसटी लागू हुआ इसी साल एक जुलाई से. उस वक्त भी कई आर्थिक जानकार और विपक्ष के कुछ लोग कह रहे थे कि इसे लागू करने के लिए जरूरी तैयारी अभी नहीं हुई है. उनका मानना था कि अभी कुछ समय रुककर पहले पूरी तैयारी की जानी चाहिए फिर जीएसटी लागू होना चाहिए. लेकिन केंद्र सरकार ने इन सुझावों की परवाह न करते हुए जीएसटी लागू कर दिया.

उसके बाद से इसके बुरे नतीजे सामने आने लगे. छोटे व्यापारी परेशान हैं. सेवा देने वाले लोगों के लिए तकनीकी दिक्कतें बढ़ गई हैं. उत्पादन पर बुरा असर पड़ रहा है. इतना सब होने के बावजूद सरकार का राजस्व नहीं बढ़ रहा है. शुक्रवार की बैठक के बाद पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री अमित मित्रा ने कहा कि जीएसटी लागू होने के बाद से सरकार को तकरीबन 90,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है. इसमें केंद्र सरकार को 60,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है और राज्य सरकारों को 30,000 करोड़ रुपये का.

ऐसे में सवाल उठता है कि अगर केंद्र सरकार जीएसटी के ढांचे में या इससे संबंधित कोई और बदलाव करती है तो उसे उसकी उपलब्धि कैसे माना जा सकता है! क्या यह एक सच नहीं है कि ये बदलाव जीएसटी के क्रियान्वयन में दिखाई गई जल्दबाजी और उसकी तैयारी में कमी की वजह से सरकार को करने पड़ रहे हैं! ये बदलाव अगर कुछ बताते हैं तो क्या केंद्र सरकार की अक्षमता और उसके जमीनी हकीकतों से कटे होने की कहानी बयां नहीं करते!

इसी तरह की स्थिति पिछले साल नोटबंदी के निर्णय के बाद भी बनी थी. नोटबंदी के निर्णय के बाद जिस तरह से सरकार बार-बार अपने निर्णय को बदल रही थी, उसके बारे में यही कहा जा रहा था कि वह जनता के हित में ये निर्णय ले रही है. जबकि अब यह सर्वमान्य है कि अगर सरकार थोड़ी सावधानी और तैयारी के साथ नोटबंदी का निर्णय लेती तो पूरा देश एक साथ बैंकों और एटीएम की लाइनों में नहीं लगा होता. उस वक्त भी बहुत लोगों को लगा था - और बाद में आए आंकड़ों से भी यह स्पष्ट हुआ - कि सरकार अपने निर्णयों की नाकामी को छुपाने के लिए बार-बार अपने निर्णय बदल रही थी.