पिछले हफ्ते जीएसटी काउंसिल की गुवाहाटी में हुई बैठक में जो फैसला लिया गया वह बीते चार महीनों के दौरान वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव है. इसके तहत करीब 180 वस्तुओं को 28 प्रतिशत कर स्लैब से हटाकर 18 प्रतिशत के स्लैब में डाल दिया गया है. इसके साथ छोटे कारोबारियों के लिए जीएसटी भरने से जुड़ी प्रक्रियाओं को सरल किया गया है. ये दोनों स्वागतयोग्य बदलाव हैं और इनका आर्थिक माहौल पर सकारात्मक असर पड़ेगा. यह बदलाव दिखाता है कि तमाम राज्यों के वित्त मंत्रियों के समूह के रूप में यह संघीय संस्थान यानी जीएसटी काउंसिल उपभोक्ताओं, कारोबारियों और उद्योगों की मांग को लेकर संवेदनशील है.

जीएसटी में बदलाव का एक महत्वपूर्ण संकेत यह भी है कि वित्त मंत्रालय अब इस कर प्रणाली के कारगर होने को लेकर ज्यादा आश्वस्त दिख रहा है. सरसरी तौर पर देखें तो लगता है कि इतनी सारी वस्तुओं को निचली दर में रखने से सरकार को राजस्व का नुकसान होगा. लेकिन हकीकत यह है कि एक सुव्यवस्थित कर प्रणाली आर्थिक गतिविधियां बढ़ाती है और जिससे आखिरकार राजस्व में बढोत्तरी होती है. इस हिसाब से करों की दर कम होना सबके लिए फायदेमंद है. वहीं अगर कर जमा करने की व्यवस्था अगर सरल है तो यह लोगों को कर भरने के लिए प्रोत्साहित करती है.

जीएसटी प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए सुधार आगे भी जारी रह सकते हैं. और ऐसा तब तक होना चाहिए जब तक कि सरकार और कारोबारियों के बीच इसको लेकर एक भरोसा कायम नहीं हो जाता. यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जब जीएसटी लागू हुआ तो इसकी कुछ खामियों और रसीदों के मिलान से जुड़ी समस्याओं के चलते अर्थव्यवस्था पर एक नकारात्मक असर पड़ा और जो अब तक खत्म नहीं हुआ है. कुछ क्षेत्रों में इनपुट क्रेडिट को लेकर भी सरकार के प्रति एक तरह का अविश्वास है. हालांकि कुछ और बार टैक्स रिटर्न जमा होने के बाद उम्मीद की जा सकती है कि यह समस्या दूर हो जाएगी.

प्रतिक्रियाओं के आधार पर ताजा बदलाव के बाद जीएसटी में एक स्थिरता आ चुकी है. इसलिए अब जीएसटी काउंसिल को कुछ बड़े आर्थिक लक्ष्यों को ध्यान में रखकर दरों में बदलाव करने की जरूरत है. मसलन सीमेंट अभी-भी 28 प्रतिशत के स्लैब में है जिसमें लग्जरी वस्तुएं आती हैं. भारत में जिस तरह के बुनियादी ढांचा विकास की जरूरत है उसके हिसाब से सीमेंट इस स्लैब में नहीं होना चाहिए.

इसके साथ ही अब पूरे रियल इस्टेट सेक्टर, पेट्रोलियम पदार्थों, बिजली और शराब को भी जीएसटी के दायरे में लाया जाना चाहिए. यह कर प्रणाली तब सबसे बेहतर तरीके से काम करती है जब आर्थिक गतिविधियों से जुड़े सभी महत्वपूर्ण क्षेत्र इसके दायरे में होते हैं. इसका एक फायदा यह भी है कि इससे उन सभी क्षेत्रों की ऑडिटिंग आसान हो जाएगी जो काला धन ठिकाने लगाने के लिए बदनाम हैं. (स्रोत)