दिल्ली को इस साल प्रदूषण और धुंध के कारण ‘गैस चेंबर’ बनने से बचाया जा सकता था. बशर्ते केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और संबंधित राज्यों की सरकारें ऐसा करना चाहतीं. द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक ऐसा इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि किसानों को पराली व भूसी जलाने से रोकने के एवज में जो मुआवजा दिया जाना था कि उस पर सरकारों में एकराय नहीं बन सकी. वे तय नहीं कर पाईं कि इसका आर्थिक बोझ कितना और कौन उठाए.

केंद्र के एक अधिकारी के मुताबिक इस साल के शुरुआत में सीआईआई-एनआईटीआई के तहत एक कार्यबल का गठन किया गया था. इस टास्क फोर्स ने सिफारिश की थी कि पराली (फसल काटने के बाद बचा हुआ हिस्सा) जलाने से दिल्ली में होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए किसानों को 3,000 करोड़ रुपए का मुआवजा दिया जाए. टास्क फोर्स ने सितंबर के महीने में रिपोर्ट दी थी. रिपोर्ट में पराली के निस्तारण के वैकल्पिक इंतजाम बताए भी गए थे. मसलन- ईंट-मिट्‌टी से बने गुंबदनुमा ढांचे बनाकर उनमें पराली जलाई जाए. इससे पराली-चर पैदा होगा जो खेतों की मिट्‌टी के लिए जैविक खाद का भी काम करेगा. लेकिन किसानों को इस तरह के ढांचे बनवाने के लिए पैसों की जरूरत होगी. लिहाजा यह पैसा उन्हें सरकारों की ओर से उपलब्ध कराया जाना चाहिए.

बताते हैं कि इसके बाद पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश की सरकारों के साथ केंद्र की ओर से नीति आयोग ने रिपोर्ट पर विचार किया. बैठक में केंद्र सरकार के कुछ अन्य अधिकारी भी शामिल थे. सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में राज्यों ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वही मुआवजे का पूरा पैसा उपलब्ध कराए. खास तौर पर पंजाब ने यह बात रखी कि उसके पास किसानों को दी जाने वाली आर्थिक मदद के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है. जबकि केंद्र की दलील थी कि मौजूदा बजट में इस तरह की कोई योजना नहीं है जिसके तहत राज्यों को इस आर्थिक पैकेज के लिए पैसा दिया जाए. और अगर किसी तरह पैसा दे भी दिया जाता है तो दूसरे राज्य भी इसी तरह की मांग करने लगेंगे, लिहाजा राज्यों को अपने स्तर पर पैसे का इंतजाम करना चाहिए. और इस तरह मसला अनसुलझा रह गया.