हाल में स्विट्ज़रलैंड से एक ऐसी ख़बर आई है जो कालाधन रखने वालों को राहत देने और उस पैसे को अपने यहां वापस लाने की कोशिश में लगी कई देशों की सरकारों के लिए निराशा का सबब बन सकती है. स्विस बैंकों के वकीलों ने वहां के सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि वह स्विट्ज़रलैंड के बैंकिंग गोपनीयता क़ानून की व्याख्या करे. ऐसा इस क़ानून के दायरे (शक्ति) को और बढ़ाने के मक़सद के तहत किया गया है. अगर यह प्रयास कामयाब रहा तो कालेधन की वसूली में अहम भूमिका निभाने वाले व्हिसल-ब्लोअर्स यानी बैंक के पूर्वकर्मियों को सज़ा देना आसान हो जाएगा, फिर चाहे वे दुनिया में कहीं भी रह रहे हों.

व्हिसल-ब्लोअर्स बैंक से संबंधित जानकारियों को दूसरे देशों की सरकारों से साझा करते हैं. वे कालेधन की वसूली में एक अहम कड़ी रहे हैं. हाल में स्विस बैंक की निजी बैंकिंग कंपनी ‘जूलियस बायर’ में काम कर चुके रुडॉल्फ़ एल्मर ने यह कहकर सनसनी पैदा कर दी थी कि उनके पास भारतीय राजनीतिज्ञों, फ़िल्मी सितारों और क्रिकेटरों के स्विस बैंक खातों की जानकारियां हैं. हालांकि स्विटज़रलैंड में चल रही क़ानूनी लड़ाई के चलते उन्होंने इन लोगों के नाम नहीं बताए. एल्मर ने बताया कि उन पर चल रहे केस के सिलसिले में तीन महीनों में फ़ैसला आने वाला है. उन्होंने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फ़ैसला सुनाया तो वे अपने पास रखीं जानकारियां भारत सरकार को बता देंगे.

पिछले साल इस मामले में स्विस वकीलों की याचिका पर ऊपरी अदालत ने फ़ैसला सुनाते हुए कहा था कि बैंक का गोपनीयता क़ानून एल्मर पर लागू नहीं होता, क्योंकि वे मूल बैंक (स्विस बैंक) के कर्मचारी नहीं थे, बल्कि उसके सहायक कैरीबियन बैंक जूलियस बायर के कर्मचारी थे. इस पर वकीलों ने दलील दी थी कि अगर वे गोपनीयता क़ानून को उन लोगों पर लागू नहीं कर सकते जिनका देश के बाहर स्विस बैंक से जुड़े दूसरे बैंकों से संबंध है तो इससे गोपनीयता क़ानून के होने का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा. वकीलों ने कहा कि इसके दूरगामी (नकारात्मक) परिणाम होंगे जिन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता. अब ख़बर है कि स्विटज़रलैंड का सुप्रीम कोर्ट इस मामले की लिखित सुनवाई को लेकर विचार कर रहा है. बीती नौ जून को उसने एल्मर की तरफ़ से लिखित प्रतिक्रिया मांगी थी जो उनके वकील ने दाख़िल करा दी थी. संभावना है कि कोर्ट अगले साल इस पर फ़ैसला सुना सकता है.

कई मानते हैं कि इस कवायद के जरिये बैंक अपने पूर्व कर्मियों को डराने का प्रयास कर रहे हैं. स्विटज़रलैंड के बैंक गोपनीयता क़ानून के मुताबिक़ कर्मचारियों को ग्राहकों से जुड़ी जानकारी को गोपनीय रखना होता है, लेकिन बीते दशक में बैंक के लोगों ने अन्य देशों की सरकारों से जानकारियां साझा की हैं. इसीलिए बैंकों के वकीलों का कहना है कि गोपनीयता क़ानून के तहत बैंक के प्रति कर्मचारियों के कर्तव्य का दायरा बढ़ाया जाए और इनमें उन लोगों को भी शामिल किया जाए जो स्विस बैंकों और उनके अधीन शाखाओं से ख़राब संबंध होने के चलते (नौकरी छोड़कर) चले गए. बैंक के खातों की जानकारी साझा करने को लेकर एल्मर की दो बार गिरफ़्तारी हो चुकी है और वे क़रीब सात महीने जेल में रहे हैं. एल्मर कहते हैं कि उनके ज़रिए एक उदाहरण पेश करने की तैयारी है कि बैंक की जानकारी साझा करने वाले कर्मियों से और उनके परिवारों के साथ क्या हो सकता है.

एल्मर के इस बयान को भारत में कालेधन के मुद्दे से जोड़कर देखें तो यह एक संभावना लगती है. वकीलों की दलीलें भी इस संभावना को मज़बूत करती हैं. उनका कहना है कि दुनियाभर में स्विस बैंकों से संबंधित जगहों से निकाले गए कर्मचारियों को संदेश देने की ज़रूरत है. रुडॉल्फ़ एल्मर के संदर्भ में वकीलों ने कहा, ‘अपने करियर से निराश और कड़वाहट से भरे एक पूर्व बैंकर ने ख़ुद को क़ानून के दायरे से बाहर माना और (बैंक का) काफ़ी ज़्यादा नुक़सान किया.’ बैंक केवल अपने कर्मचारियों को ही नहीं बल्कि उसके लिए काम करने वाले ठेकेदारों, वकीलों और सलाहकारों को भी वांछित क़ानूनी दायरे में लाना चाहते हैं. यानी अन्य देशों की सरकारें न तो बैंककर्मियों से जानकारी ले पाएंगी और न ही उसके लिए काम करने वाले बाहरी लोगों से.

बैंकों के इस क़दम से टैक्स चोरी (यानी कालेधन) को लेकर सख़्त रहे पश्चिमी देशों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. इस मामले में अमेरिका का रुख़ काफ़ी सख़्त रहा है और स्विस बैंकों को सबसे ज़्यादा उसी ने परेशान किया है. बैंकों के वकीलों की अपील उसके प्रयासों पर अंकुश लगा सकती है. यूरोप के कई सांसद भी इसे लेकर चिंतित हैं. कोर्ट ने अगर बैंकों के पक्ष में सुना दिया तो जानकारी साझा करने को लेकर व्हिसल-ब्लोअर्स में भय पैदा हो सकता है और वे (ब्रिटिश सांसद) व्हिसल-ब्लोअर्स के लिए एक स्वतंत्र माहौल बनाने के पक्ष में हैं. हालांकि व्हिसल-ब्लोअर्स को सुरक्षा देने को लेकर इन देशों का रवैया ढीला ही रहा है.

भारत के लिए भी इस ख़बर का अपना महत्व है, लेकिन सरकार और मीडिया में इसे लेकर ख़ास हलचल देखने को नहीं मिल रही. वर्तमान और पिछली सरकारों पर यह आरोप लगता रहा है कि वे व्हिसल-ब्लोअर्स और उनकी जानकारियों पर गंभीरता नहीं दिखातीं. नवंबर 2015 में एचसीबीसी बैंक की जिनेवा शाखा में पैसा रखने वाले भारतीयों की जानकारी देने वाले व्हिसल-ब्लोअर हर्व फ़लसियानी ने कहा था कि भारत के अधिकारी उनकी जानकारी का पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर रहे. उनका यह भी कहना था कि व्हिसल-ब्लोअर को सुरक्षा नहीं दी जाती और उनकी सेवाओं का उचित तरीक़े से इस्तेमाल नहीं हो पाता. इसी सिलसिले में कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने व्हिसल-ब्लोअर क़ानून को अधिसूचित नहीं करने के लिए केंद्र सरकार की आलोचना की थी. उन्‍होंने कहा था कि सरकार कानून के प्रावधानों को कमज़ोर करने का प्रयास कर रही है.

कुछ समय पहले वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी (जो हाल में वकालत से संन्यास ले चुके हैं) ने कालेधन को लेकर मौजूदा केंद्र सरकार पर कई आरोप लगाए थे. पीएम नरेंद्र मोदी को भेजे पत्र में उन्होंने लिखा था, ‘2008 में जर्मनी की सरकार ने 1400 गुप्त खातों की जानकारी हासिल करने वाले लिचेंस्टाइन बैंक के एक कर्मचारी को 30 अरब रुपये से भी ज़्यादा की रिश्वत दी थी. स्विस बैंक असोसिएशन और जर्मन सरकार ने घोषणा की थी कि उस लिस्ट में कई ‘भारतीयों’ के नाम हैं. जर्मन सरकार ने यह जानकारी बिना किसी शर्त और क़ीमत के खुले तौर पर शेयर करने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन मौजूदा सरकार ने इसका फ़ायदा नहीं उठाया.’

एक और ख़बर के मुताबिक़ मोदी सरकार द्वारा गठित ‘मल्टी-एजेंसी ग्रुप’ ने कालाधन रखने वालों के ख़िलाफ़ अभी तक एक भी एफ़आईआर दर्ज नहीं कराई है. वित्त मंत्रालय से आरटीआई के ज़रिए यह जानकारी मांगी गई थी. जवाब में वित्त मंत्रालय ने कहा कि इस मामले में संबंधित क़ानून के तहत एफ़आईआर कराने का कोई प्रावधान नहीं है.

स्विस बैंकों की अपील और कालेधन को लेकर भारत की सरकारों के ढुलमुल रवैये के अलावा एक और चीज़ कालेधन की वसूली की मुहिम को ख़ासी प्रभावित कर सकती है. इस साल जून में आई एक ख़बर के मुताबिक़ स्विट्ज़रलैंड ने पुष्टि करते हुए कहा कि वह बैंकों के वित्तीय लेन-देनों को लेकर अन्य देशों से स्वचालित रूप से जानकारियां शेयर करेगा. इसका मतलब भारत को किसी विशेष वित्तीय ट्रांज़ेक्शन को लेकर स्विट्ज़रलैंड के अधिकारियों को पूछना नहीं पड़ेगा. भारतीयों द्वारा स्विस बैंकों में किए गए लेन-देनों के बारे में सरकार को अपनेआप ही पता चल जाएगा.

लेकिन इस डील में एक दिक़्क़त है. 19 जून, 2017 को इकनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है यह डील सितंबर 2019 से प्रभाव में आएगी, और तब तक कई भारतीय खाताधारक अपना काला पैसा स्विस बैंक के खातों से निकालकर दूसरी जगहों पर भेज चुके होंगे. यानी भविष्य के लिहाज़ से तो यह डील कारगर लगती है, लेकिन यह कालेधन को लेकर अभी तक हुए हंगामों को शांत करती नहीं दिखती.

भारत में कालेधन की ‘घरवापसी’ एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा है. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपीए सरकार को हटाने में इसने अहम भूमिका निभाई. भारतीय जनता पार्टी और उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने अपने कैंपेन में इस मुद्दे को ख़ूब ज़ोर-शोर से उठाया था. लेकिन मई 2014 के तीन साल से भी ज़्यादा समय बाद भी इस मोर्चे पर अभी तक कोई ठोस और ऐतिहासिक परिणाम देखने को नहीं मिला है. उलटा कालाधन रखने वालों को अपने काले पैसे का 50 फ़ीसदी हिस्सा बतौर टैक्स चुकाकर बाक़ी पैसे को सफ़ेद करने का मौक़ा दिया गया है. ऊपर से अब स्विस खातों में उतनी रक़म नहीं है जितनी पहले हुआ करती थी. क्योंकि बताया जाता है कि बीते सालों में स्विस बैंक के भारतीय ग्राहकों ने पकड़े जाने के डर से अपना पैसा दूसरे स्रोतों में लगा दिया या निवेश किया है. स्विस बैंकों के वकील जिस नुक़सान की बात कर रहे हैं, शायद यह उनमें से एक हो. अब अगर स्विस बैंक अपने गोपनीयता क़ानून को लेकर चल रही क़ानूनी लड़ाई में सफल रहता है तो ‘बचे-खुचे’ कालेधन को भारत लाना सदा के लिए एक सपना ही बन कर रह सकता है.