यह बड़ी ही दिलचस्प स्थिति है कि अब जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ फारुख अब्दुल्ला को उनकी कश्मीर घाटी से जुड़ी टिप्पणी के लिए भाजपा के साथ-साथ अलगाववादियों का भी निशाना बनना पड़ेगा. उन्होंने बीते शनिवार को कहा था कि कश्मीर घाटी भारत का ही हिस्सा रहेगी और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) पाकिस्तान का और इस स्थिति को बदलना मुमकिन नहीं है.

पाकिस्तान कश्मीर घाटी को भारत से अलग करने के लिए बीते 70 सालों से कूटनीतिक प्रयासों से लेकर सैन्य-आतंकी कार्रवाइयां तक करता रहा है. इधर भारत ने 1995 में संसद में एक प्रस्ताव पारित करके कहा था, चूंकि कश्मीर के महाराजा ने पूरी रियासत का विलय किया था इसलिए पीओके देश का अभिन्न अंग है. हालांकि दोनों देशों के इन दावों-कोशिशों से इतर सीधी सच्चाई यह है कि कश्मीर घाटी और पीओके की सांस्कृतिक बुनावट कुछ ऐसी है कि ये क्षेत्र अब किसी दूसरे-तीसरे देश के बजाय उसी देश से जुड़े रहेंगे जिसके साथ वे आज हैं.

इस बात में कोई दोराय नहीं कि व्यावहारिक रूप से कश्मीर घाटी की तकरीबन पूरी आबादी मुसलमान है. धार्मिक, राजनीतिक और वैचारिक आधार पर यहां का पाकिस्तान समर्थक तबका घाटी के पाकिस्तान में विलय की कोशिश करता रहा है. लेकिन यह विकल्प कश्मीरियों के रहन-सहन और परंपराओं के खिलाफ जाता है.

फारुख अब्दुल्ला ने कश्मीर के लिए ‘आजादी’ के विकल्प को भी खारिज किया है. उनका कहना है कि घाटी तीनों तरफ से परमाणु शक्ति संपन्न देशों – भारत, पाकिस्तान और चीन से घिरी है और इसलिए यहां आजाद देश अस्तित्व में नहीं आ सकता. नेशनल कॉन्फ्रेंस के मुखिया का यह तर्क कमजोर जरूर है लेकिन कश्मीर की ‘आजादी’ पर उनकी राय सही है.

अगर इन देशों के पास परमाणु हथियार नहीं होते तो क्या होता? सीधी सी बात है कि तब भी घाटी भारत का ही हिस्सा होती क्योंकि ऐतिहासिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से ऐसा ही है. जहां तक ‘आजादी’ की बात है तो यह कोई स्वभाविक रूप से पनपा विचार नहीं है. यह भारत-पाकिस्तान के बंटवारे का फायदा उठाने वाले लोगों के दिमाग की उपज है. यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि बंटवारा खुद एक औपनिवेशिक तंत्र का नतीजा था. विलय के बाद संवैधानिक संरक्षण ने कश्मीर से जुड़े इन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारकों को और मजबूत ही किया है.

भारत और पाकिस्तान का आधिकारिक रुख जो भी हो लेकिन दोनों तरफ की सरकारों को जमीनी हकीकत का अहसास है. और इसी बुनियाद पर ही परवेज मुशर्रफ की तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी और उनके बाद डॉ मनमोहन सिंह से बातचीत हुई थी. अब चूंकि सीमाएं नहीं बदली जा सकतीं तो इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए तब बातचीत का मसौदा था कि सीमाओं को कैसे अप्रासांगिक बनाया जाए.

हालांकि यह साफ है कि अब्दुल्ला ने कश्मीर को लेकर जो राय जाहिर की है वह राष्ट्रीय स्यवंसेवक संघ-भाजपा के एक धड़े की भी है. इसी बात को आगे बढ़ाते हुए यह जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली संविधान की धारा 370 हटाना चाहता है. ऐसा होते ही इस सूबे की स्वायत्ता खत्म हो जाएगी, साथ ही विलय की शर्त भी खत्म हो जाएगी. आज जब भाजपा सत्ता में है और पूरे बहुमत के साथ है तब इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस समय यही हकीकत है और फिलहाल यही विचार सबसे ऊपर रहेगा. (स्रोत)