गुजरात में विधानसभा चुनावों के मद्देनजर राजनैतिक खींचतान चरम पर है. जहां एक तरफ सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लिए अपना जनाधार बचाए रखना प्रमुख चुनौती साबित हो रहा है तो वहीं करीब दो दशकों बाद सूबे में वापसी की उम्मीद लिए कांग्रेस अपने साथ ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ने की कवायद में जुटी है. रस्साकशी के इस खेल में ये दोनों ही संगठन जिस समुदाय पर अपनी नजरें सबसे ज्यादा गड़ाए हुए हैं वह है- पाटीदार. दो साल पहले अनामत आंदोलन के बाद से ही पाटीदार सूबे की राजनीति का प्रमुख केंद्र रहे हैं और माना जा रहा है कि इन चुनावों में समुदाय का झुकाव जिस किसी पार्टी की तरफ जितना ज्यादा रहेगा उसके सत्ता में आने की संभावनाएं उतनी ही बढ़ जाएंगी.

ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि क्या इस बार भी पाटीदार लंबे समय से चली आ रही अपनी राजनैतिक परंपरा के अनुसार किसी एक दल को बहुमत देंगे या फिर इन चुनावों में समुदाय के वोट बंट भी सकते हैं. लेकिन इससे पहले यह भी समझना होगा कि आखिर क्यों भाजपा और कांग्रेस किसी और जाति से कहीं ज्यादा ध्यान पाटीदारों को अपनी तरफ लुभाने या मनाने में लगाए हुए है. यह भी कि कैसे किसी प्रदेश की आबादी का सिर्फ 14-15 फीसदी हिस्सा समेटे कोई भी समुदाय अकेले ही पूरे सूबे की राजनीति का वर्तमान और भविष्य दोनों को प्रभावित कर पाने में सक्षम हो सकता है.

इस सवाल का जवाब जानने के लिए जब हमने प्रदेश के अलग-अलग विशेषज्ञों से बात करने की कोशिश की तो हमारे सामने न सिर्फ पाटीदारों का सामाजिक और आर्थिक ढांचा स्पष्ट हुआ बल्कि गुजरात के राजनैतिक इतिहास की भी कई महत्वपूर्ण जानकारियां भी सामने आईं जो सूबे के मौजूदा हालात समझने में मददगार साबित हो सकती हैं.

पाटीदारों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति

सत्याग्रह से हुई बातचीत में गुजरात के वरिष्ठ राजनीतिकार और समाजशास्त्री अच्युत याग्निक जानकारी देते हुए बताते हैं, ‘गुजरात में पाटीदारों को पटेल या मुखी भी कहा जाता है क्योंकि सदियों से इस समुदाय के लोग (गुजरात में) गांवों के मुखिया रहते आए हैं. पटेल समुदाय मुख्यत: दो उपसमुदायों में बंटा हुआ है- कडुआ और लेऊआ. जहां कडुआ पटेल उत्तर गुजरात में बहुतायात से मिलते हैं वहीं लेऊआ पटेलों की संख्या दक्षिण गुजरात में ज्यादा है.’ याग्निक आगे जोड़ते हैं, ‘पाटीदारों की पकड़ प्रदेश के अधिकतर ग्रामीण इलाकों में आज भी इतनी मजबूत है कि अपने साथ बड़ी संख्या में दूसरे समुदायों के वोटों को भी किसी भी राजनैतिक दल के पाले में या उससे दूर ले जा सकते हैं.’

बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में लेखक और पत्रकार विष्णु पांड्या कहते हैं, ‘पाटीदार आंदोलन में न सिर्फ पटेल बल्कि बड़ी संख्या में दूसरी जातियों के लोग भी शामिल थे जिनमें ऊंची जातियों से ताल्लुक रखने वाले लोगों की संख्या सर्वाधिक थी.’ प्रदेश के कई अन्य राजनीतिकार और पत्रकार भी इस बात का समर्थन करते हुए कहते हैं कि प्रदेश में पाटीदारों की अपनी संख्या भले ही 15 फीसदी हो, लेकिन उनका प्रभाव या दायरा सूबे की राजनीति में इससे कई गुना अधिक है.

पाटीदारों का प्रभुत्व गुजरात में पीढ़ियों से बना हुआ है. सेंटर फॉर डेवलपमेंट अल्टरनेटिव्स, अहमदाबाद (प्रख्यात शोध संस्थान) की डायरेक्टर और वरिष्ठ अर्थशास्त्री इंदिरा हिरबे इसके पीछे सामाजिक के साथ पटेलों की आर्थिक पृष्ठभूमि को भी बराबर का जिम्मेदार मानती हैं. सत्याग्रह से बातचीत में वे बताती हैं कि आजादी के शुरुआती दशक में पटेल मूल रूप से खेती तक ही सीमित रहे. लेकिन इसके बाद (60 के दशक में) उन्होंने उद्योगों पर अपना कब्जा जमाना शुरू किया जिनमें हीरा, रियल एस्टेट, और कपड़े के साथ शिक्षा का क्षेत्र प्रमुखता से शामिल था. एक अनुमान के मुताबिक भारत से निर्यात होने वाले हीरों की कुल संख्या का 80 प्रतिशत गुजराती पटेलों के यहां से आता है. इंदिरा हिरबे कहती हैं, ‘गुजरात में हर साल पैदा होने वाले निजी क्षेत्र के रोजगारों में सर्वाधिक पटेलों की संस्थाओं से होते हैं. इस तरह पटेल एक बार फिर प्रदेश के उन लाखों लोगों को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं जिनकी रोजी का जुगाड़ उनके व्यवसायों से होता है.’

यदि ऐसे ही कुछ नामचीन व्यवसायी पटेलों की बात करें तो इनमें अजंता ग्रुप के मालिक ओधव जी पटेल, निरमा ग्रुप के करसन पटेल, राजकोट की तेल मिलों के पोपट और छगन पटेल, फार्मा इंडस्ट्री के जाने-पहचाने नाम और बैन लैब को शुरु करने वाले दह्याभाई उकानी जैसे न जाने कितने नाम शामिल हैं. पिछले कुछ सालों से दीपावली पर जो सावजी ढोलकिया बोनस के तौर पर अपने कर्मचारियों को कार और फ्लैट देने के लिए सुर्खियां पाते रहे हैं वे भी पाटीदार समुदाय से ही ताल्लुक रखते हैं. पटेलों ने भारत ही नहीं बल्कि विदेश में भी अपना परचम खूब लहराया है. इंदिरा हिरबे बताती हैं, ‘गुजरात से विदेश जाने वाले युवाओं में सबसे ज्यादा संख्या पटेल युवाओं की होती है जिनमें से कई यूके और यूएस में अलग-अलग व्यापार क्षेत्र में बड़ा नाम बन चुके हैं.’

पटेलों का राजनैतिक इतिहास और कांग्रेस से पुरानी नाराजगी

अच्युत याग्निक कहते हैं, ‘सरदार वल्लभ भाई पटेल की वजह से पाटीदार गुजरात की राजनीति में देश की आजादी के बाद से ही प्रभावशाली रहे थे. लेकिन जब 1960 में गुजरात और महाराष्ट्र को अलग-अलग राज्य घोषित किया गया तो सूबे में पटेलों का जातिगत अनुपात भी कई गुना बढ़ गया और उनकी शक्ति भी.’ इस बात की बानगी के तौर पर वरिष्ठ पत्रकार गोपाल काशेटिया लिखते हैं, ‘पिछले करीब तीन दशकों से पाटीदार जिस चेहरे पर अपनी मुहर लगाते हैं वही गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर आसीन होता है. फिर चाहे वो दो बार मुख्यमंत्री रह चुके चिमनभाई पटेल हों या उनके बाद केशुभाई पटेल, दोनों को पाटीदारों का पूरा समर्थन था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इसके अपवाद के तौर पर नहीं देखा जा सकता है.’ विजय रूपाणी से पहले प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकीं आनंदीबेन पटेल और मौजूदा मंत्रिमंडल में उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल सहित करीब आधे दर्जन मंत्री पाटीदार समुदाय से आते हैं. इनके अलावा 182 सीटों वाली विधानसभा में करीब 40 विधायक पटेल हैं.

जानकार बताते हैं कि गुजरात बनने के करीब दो दशक बाद तक पाटीदार कांग्रेस के साथ रहे. हालांकि इस बीच (1974 में) सरकारी तंत्र से आजिज आ चुके प्रदेश वासियों ने ‘नवनिर्माण’ नाम से एक व्यापक आंदोलन छेड़ा था जिसमें पाटीदार बड़ी संख्या में शामिल हुए थे. लेकिन राजनीतिकारों के मुताबिक तब लोगों की लड़ाई सरकार के खिलाफ थी न कि किसी पार्टी विशेष के. लेकिन जब 1980 में गुजरात में माधव सिंह सोलंकी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार सत्ता में आई तो उसने पटेलों को दरकिनार करना शुरू कर दिया. बताते चलें कि माधव सिंह वर्तमान कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष भरतसिंह सोलंकी के पिता और कांग्रेस के दिग्गज नेता थे.

जानकारों बताते हैं कि प्रदेश के तत्कालीन राजनैतिक हालात देखते हुए माधव सिंह सोलंकी ने 1981 में बक्शी आयोग की सिफारिश पर 86 जातियों को ओबीसी में शामिल करने का फैसला करते हुए ‘खाम’ (केएचएएम) सिद्धांत दिया. इसमें ‘के’ का मतलब क्षत्रियों से था, ‘एच’ का हरिजनों से, ‘ए’ यानी आदिवासी और ‘एम’ मुसलमान. पटेलों को इससे बाहर रखा गया. कांग्रेस पाटीदारों से अपने नाते को पूरी तरह से तोड़ चुकी थी और बची-कुची कसर सोलंकी ने अपने मंत्रिमंडल में किसी पटेल नेता को शामिल न करके पूरी कर दी.

आजादी के बाद ऐसा पहली बार हुआ था. लाजमी था कि पटेलों को यह बात बेहद नागवार गुजरी. इसे उन्होंने सीधे तौर पर उनसे भेदभाव के तौर पर देखा. कुछ विश्लेषकों के मुताबिक पाटीदारों को यह डर भी था कि आरक्षण की मदद से कहीं दूसरे समुदाय सरकारी व्यवस्था में उनसे ज्यादा प्रभावशाली न हो जाएं. नतीजन पाटीदार युवकों की नाराजगी आंदोलन के रूप में फूट पड़ी. एक रिपोर्ट के मुताबिक इसमें दर्जनों जानें गयीं. हालांकि इस आंदोलन को जल्द ही दबा दिया गया था. प्रदेश के राजनीतिकारों का कहना है कि खाम सिद्धांत के चलते मिले क्षत्रिय, ओबीसी, आदिवासी और मुसलमानों के वोटों का ही नतीजा था कि 1985 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस माधव सिंह के नेतृत्व में रिकॉर्ड 149 सीटों के साथ प्रदेश की सत्ता में वापस लौटी (बताया जाता है कि कांग्रेस के इसी रिकॉर्ड को तोड़ने के लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने गुजरात विधानसभा चुनावों में 150 सीट जीतने का लक्ष्य तय किया है).

अच्युत याग्निक बताते हैं कि दूसरी बार सत्ता में आने के बाद माधव सिंह सोलंकी ने सार्वजनिक मंचों से पाटीदारों के खिलाफ ऐसी कई बातें कहीं जिन्होंने समुदाय में भयंकर आक्रोश भर दिया. नाराज पटेल राज्यव्यापी आंदोलन पर उतर आए जिसमें 100 से ज्यादा लोग मारे गए. कई लोगों का कहना है कि आरक्षण के विरोध में शुरू हुए इस आंदोलन को बाद में कुछ फिरकापरस्त लोगों ने पहले पाटीदार-ओबीसी और बाद में हिंदू-मुसलमान दंगो की शक्ल दे दी. पाटीदारों का मन हमेशा के लिए कांग्रेस से खट्टा हो चुका था.

यही वह दौर था जब भारतीय जनता पार्टी हिंदुत्व का एजेंडा लेकर प्रदेश सहित देश भर में अपनी जगह तलाश रही थी. विशेषज्ञ बताते हैं कि उस समय आक्रोशित पटेलों का एक समूह कांग्रेस से बगावत कर चुके चिमनभाई पटेल के साथ हो गया जबकि समुदाय के दूसरे समूह के नेतृत्व में प्रदेश की अधिकतर अगड़ी जातियों ने भाजपा को अपना समर्थन दे दिया. इसके चलते 1990 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा और गुजरात में चिमनभाई के नेतृत्व में जनता दल- भाजपा के गठबंधन वाली नई सरकार बनी. तब से पटेलों ने पलटकर कांग्रेस की तरफ नहीं देखा.

हालांकि बाद में चिमनभाई पटेल एक बार फिर कांग्रेस में शामिल हो गए, लेकिन वरिष्ठ पत्रकार बसंत रावत के मुताबिक पाटीदारों ने तब तक केशुभाई पटेल को अपना नेता मान लिया था. नतीजन चिमनभाई को साथ लेकर भी कांग्रेस पटेलों का समर्थन वापस हासिल नहीं कर पाई. 1995 के गुजरात विधानसभा चुनावों में केशुभाई के नेतृत्व में भाजपा भारी बहुमत के साथ सत्ता में इस कदर आई कि 22 साल से लगातार उस पर काबिज है.

लेकिन इन चुनावों से पहले हवाओं ने अपना रुख एक बार फिर बदला है और जो पाटीदार पिछले ढाई दशक से भाजपा के साथ थे, इस बार कांग्रेस की तरफ जाते दिख रहे हैं. खबर है कि पाटीदारों को लुभाने के लिए कांग्रेस इन चुनावों में 20-25 सीटें उन्हें दे सकती है. प्रदेश के एक प्रमुख अखबार के मुताबिक फिलहाल पाटीदार आंदोलन की फंडिंग भी कांग्रेस की तरफ से ही हो रही है. लेकिन जानकारों की मानें तो हो सकता है कि कांग्रेस की तमाम कोशिशों के बाद भी पाटीदारों का एक समूह पार्टी के समर्थन में अपना वोट न दे.

इस बारे में याग्निक कहते हैं, ‘जो पटेल 80 के दशक में युवा थे वे आज बुजुर्ग या अधेड़ हो गए हैं. लेकिन जिस तरह आज का पटेल युवा भाजपा से नाराज है उससे कहीं ज्यादा नाराजगी इन बुजुर्गों के मन में कांग्रेस के लिए है. ऐसे में कांग्रेस चाहे लाख जतन कर ले इस बात की संभावना कम ही है कि वह 50 वर्ष से अधिक आयुवर्ग के पाटीदारों के वोट अपनी तरफ खींच पाएगी.’