राजस्थान में सात दिन तक चली डॉक्टरों की हड़ताल आखिरकार बीते रविवार समाप्त हो गई. सरकार की ओर से सभी मांगें माने जाने के बाद डॉक्टर काम पर लौट आए. ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि जब सरकार को डॉक्टरों की मांगें माननी ही थीं तो सात दिन तक प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था को भगवान भरोसे क्यों छोड़ा गया. इस मसले पर सरकार का कहना है कि उसने तो पहले दिन ही डॉक्टरों की सभी मांगों को मान लिया था, लेकिन उनके संगठन के पदाधिकारियों ने ही समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए. उधर, डॉक्टरों का कहना है कि यदि उनकी मांगें मान ली गई होतीं तो वे हड़ताल क्यों जारी रखते.

यह पहली बार नहीं है जब वसुंधरा सरकार की सुस्ती की वजह से बेवजह आंदोलन लंबा खिंचा हो. इस साल का यह तीसरा बड़ा आंदोलन था, जिसने सरकार की सुस्ती की वजह से तूल पकड़ा और आखिर में वह उसके लिए सिरदर्द बन गया. सीकर में हुए किसान आंदोलन और गैंगस्टर आनंदपाल सिंह के एनकाउंटर की सीबीआई जांच की मांग को लेकर हुए आंदोलन से भी सरकार समय रहते नहीं निपट पाई. इन तीनों आंदोलनों की गंभीरता को न तो सरकार का खुफिया तंत्र भांप पाया और न ही इनकी समाप्ति के लिए सरकार समय रहते कारगर रणनीति बना पाई. इसका अंजाम यह हुआ कि ये आंदोलन व्यापक स्तर पर फैल गए और इनसे आम जनजीवन भी प्रभावित हुआ. अंतत: सरकार को आंदोलनकारियों की मांगों के सामने झुकते हुए समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

बेवजह का हठ

सूबे के सरकारी अस्पतालों में सेवारत डॉक्टरों का संगठन अपनी 33 मांगों को लेकर पिछले तीन महीने से कार्य बहिष्कार कर रहा था. इस बीच सरकार ने चार नवंबर को संगठन के पदाधिकारियों को वार्ता के लिए बुलाया. इस बैठक में चिकित्सा मंत्री और चिकित्सा सचिव की मौजूदगी में विभाग के अतिरिक्त निदेशक के डॉक्टरों के खिलाफ टिप्पणी करने से माहौल बिगड़ गया. संगठन के पदाधिकारी न सिर्फ बैठक बीच में ही छोडक़र आ गए, बल्कि प्रदेश के सभी डॉक्टरों ने अपने इस्तीफे भी सरकार को भेज दिए. अगले दिन चिकित्सा मंत्री कालीचरण सराफ ने डॉक्टरों को वार्ता के लिए तो बुलाया, लेकिन संगठन के पदाधिकारियों की बजाय अपने चहेते डॉक्टरों को आमंत्रित किया. इस बैठक के बाद सराफ ने बयान दिया कि सरकार ने डॉक्टरों की सभी मांगें मान ली हैं, लेकिन उनके संगठन के पदाधिकारी समझौते पर हस्ताक्षर करने नहीं आ रहे.

दरअसल, डॉक्टरों के संगठन के पदाधिकारियों को यह आशंका हो गई कि सरकार समझौता करने की बजाय ‘फूट डालो और राज करो’ की रणनीति पर काम कर रही है. इसमें उलझने की बजाय वे छह नवंबर से हड़ताल पर चले गए. इससे समूचे प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था चरमरा गई. इस दौरान सरकार पूरी तरह से भ्रमित नजर आई. कभी डॉक्टरों को वार्ता के लिए बुलाया तो कभी उन्हें राजस्थान आवश्यक सेवा कानून (रेसमा) का भय दिखाया. इस बीच चिकित्सा मंत्री कालीचरण सराफ ने हड़ताल को उनके खिलाफ साजिश बताते हुए अपनी ही सरकार के एक कद्दावर मंत्री पर इशारों में निशाना साधा. हैरत की बात यह रही कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने डॉक्टर और सरकार के बीच पनपे गतिरोध को सुलझाने की अपनी ओर से कोई पहल नहीं की. इस दौरान वे अलवर में सियासी समीकरणों को साधने में मशगूल रहीं, जहां जल्द ही उप चुनाव होना है.

इस बीच सरकार ने प्रदेश की लडख़ड़ाती चिकित्सा व्यवस्था को सुधारने के लिए कई वैकल्पिक व्यवस्थाएं कीं, लेकिन वे नाकाफी साबित हुईं. सरकार ने हड़ताल कर रहे डॉक्टरों के खिलाफ सख्ती की रणनीति भी अपनाई. करीब एक दर्जन डॉक्टरों को आवश्यक सेवा कानून (रेसमा) के अंतर्गत गिरफ्तार किया. कुछ डॉक्टरों पर दबाव पर बनाकर उन्हें अस्पतालों में भी भेजा, लेकिन इससे स्थिति नहीं सुधरी. इलाज के अभाव में 25 लोगों की मौत हो गई और हजारों मरीज दर-दर भटकते रहे. सरकार पर इतना दबाव आ गया कि उसे आखिरकार झुकना पड़ा. चिकित्सा मंत्री कालीचरण सराफ ने डॉक्टरों के संगठन के पदाधिकारियों को वार्ता के लिए ही नहीं बुलाया, बल्कि उन्हें आवश्यक सेवा कानून (रेसमा) के तहत गिरफ्तार नहीं करने का आश्वासन भी दिया. सरकार की यह तरकीब काम आई और रविवार देर रात समझौता हो गया.

किसान आंदोलन में किरकिरी

सितंबर के महीने में सीकर में हुए किसान आंदोलन के समय भी सरकार का लचर रवैया सामने आया था. अखिल भारतीय किसान सभा के बेनर तले कर्ज माफी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने सरीखी मांगों को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन 13 दिन तक चला, लेकिन इसकी तैयारी छह महीने से चल रही थी. हैरत की बात यह है कि सरकार के खुफिया तंत्र को इसकी भनक तक नहीं लगी. आंदोलन की शुरूआत में किसानों ने सीकर में महापड़ाव डाला तो भी सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंगी. सरकार ने इस आंदोलन को इस कदर नजरअंदाज किया कि कई दिनों तक आंदोलनकारियों से बातचीत करना भी जरूरी नहीं समझा.

सरकार की इस रणनीति से किसानों का ही नहीं, सीकर के व्यापार व अन्य संगठनों का गुस्सा बढ़ गया. इसका नतीजा यह हुआ कि आंदोलन पूरे जिले में फैल गया. सडक़, बाजार मंडी... सब बंद हो गए. बाकी जिलों में भी यह आंदोलन पैर पसारने लगा. विपक्ष के नेता भी आंदोलन के समर्थन में उतर आए. इतना सब होने के बाद सरकार को आंदोलनकारी किसानों से वार्ता की सूझी. बातचीत में सरकार की ओर से मंत्री समूह के साथ भाजपा प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी ने भी हिस्सा लिया. कई दौर की बाचतीत के बाद आखिरकार समझौता हुआ और आंदोलन समाप्त हुआ. हालांकि इसके अमल पर सरकार फिर से सुस्त हो गई है. समझौते के मुताबिक किसानों का 50 हजार रुपये तक का कर्ज माफ करने के लिए जिस उच्चस्तरीय कमेटी को एक महीने में रिपोर्ट देनी थी, वह अभी तक अन्य राज्यों के मॉडल का अध्ययन ही कर रही है.

एनकाउंटर जो आफत बन गया

आनंदपाल सिंह के एनकाउंटर की सीबीआई जांच के लिए हुए आंदोलन से निपटने में भी सरकार की लेटलतीफी सामने आई थी. इस कुख्यात गैंगस्टर का एनकाउंटर 24 जून को हुआ था. आनंपदपाल के परिजनों और राजपूत समाज के नेताओं ने एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए सीबीआई जांच की मांग की. परिजनों ने सीबीआई जांच के आदेश नहीं होने तक अंतिम संस्कार नहीं करने की जिद पकड़ ली. इसके बावजूद सरकार टस से मस नहीं हुई. गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया ने तो यहां तक कह दिया कि पुलिस ने बहादुरी से मुकाबला करते हुए अपराधी का एनकाउंटर किया है. उनका कहना था, ‘अगर हम इसकी सीबीआई जांच कराते हैं तो उनके मनोबल पर असर पड़ेगा और पुलिस काम नहीं करेगी. अगर लोग एनकाउंटर की सीबीआई जांच करवाना चाहते हैं तो कोर्ट का दरवाजा खुला है वो कोर्ट जाएं.’

सरकार के इस रुख से राजपूतों का गुस्सा बढ़ता गया. 12 जुलाई को आनंदपाल के गांव सांवराद में एक बड़ी सभा हुई. सभा समाप्ति के बाद भीड़ हिंसक हो गई, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हुई और कई पुलिसकर्मी घायल हो गए. सरकार ने सख्ती दिखाते हुए इलाके में कर्फ्यू लगा दिया और आसपास के जिलों में धारा-144 लगा दी. इस बीच मानवाधिकार आयोग ने अंतिम संस्कार के आदेश दे दिए. पुलिस ने अंतिम संस्कार भी करवा दिया, लेकिन राजपूतों का गुस्सा शांत नहीं हुआ. बवाल थमता हुआ नहीं दिखा तो सरकार ने आखिकार 17 जुलाई को सीबीआई जांच की मांग मान ली. यदि सरकार शुरूआत में ही इस मांग को मान लेती तो इतना असंतोष और उपद्रव नहीं होता.