अमेरिका में फिर गोलीबारी की घटना हुई है. कैलिफोर्निया में हुई इस घटना में पांच लोगों की मौत हो गई. इसी महीने की शुरुआत में टेक्सास में एक हमलावर ने चर्च में गोलीबारी कर 26 लोगों की जान ले ली थी. इससे कुछ ही समय पहले लास वेगस में हुए ऐसे ही एक हमले में 58 लोगों को अपनी ज़िंदगी खोनी पड़ी थी.

अमेरिका में बंदूक रखना उतना ही आसान है जैसे भारत में लाठी-डंडा रखना. यहां 88.8 फीसदी लोगों के पास बंदूकें हैं जो दुनिया में प्रति व्यक्ति बंदूकों की संख्या के लिहाज से सबसे बड़ा आंकड़ा है.

लेकिन क्या हमारे पास बंदूक होने से हमारी रक्षा हो सकती है? जिस अमेरिका ने अपने आप को फौजी कौम की तरह का बना लिया, अपने सभी नागरिकों के हाथ में स्वचालित हथियार दे दिए, क्या वह आज दुनिया का सबसे असुरक्षित किस्म का समाज नहीं बनता जा रहा है?

भारत विभाजन के घोर सांप्रदायिक दौर में गांधी बिहार और बंगाल में निहत्थे घूम रहे थे. अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग संप्रदाय के लोग अपेक्षाकृत अल्पसंख्यक थे. लेकिन जो संप्रदाय जहां बहुसंख्यक था, वह संबंधित अल्पसंख्यक पर अत्याचार कर रहा था. गांधी बिहार पहुंचे तो पटना सिटी के मुसलमानों ने कहा- ‘आप हमें बंदूकों का लाइसेंस दिलवा दीजिए, तभी हम अपनी हिफाजत कर पाएंगे.’ इसी तरह गांधी अविभाजित बंगाल के नोआखाली पहुंचे, तो वहां के हिंदुओं ने भी यही कहा- ‘अब तो हमारी जान बचने का एक ही उपाय है, आप हमें बंदूक का लाइसेंस दिलवा दीजिए.’

17 अप्रैल, 1947 को पटना में लोगों को संबोधित करते हुए गांधी ने कहा था, ‘कुछ मुसलमानों ने कहा है कि हमें राइफल का लाइसेंस मिलना चाहिए. मैं तो चाहता हूं कि किसी के भी पास राइफल न रहे. बंदूक शिकार के लिए हो सकती है, लेकिन यहां तो किसी शेर का डर नहीं. आज तो राइफल भी हिन्दू-मुसलमान एक-दूसरे को डराने या मारने के लिए रखना चाहते हैं. अगर कानून व्यवस्था अच्छी हो, तो राइफल, बंदूक की कोई जरूरत ही नहीं. बाइबिल में लिखा है कि ऐसा जमाना आना चाहिए कि हथियार की जरूरत ही न हो, और उस सामग्री से दूसरी काम की चीजें बनाई जाएं. रामायण में भी लिखा है कि जब श्रीराम से पूछा गया कि आप रावण से कैसे लड़ेंगे, तो श्रीराम ने कहा कि मेरी पवित्रता मेरी रक्षा करेगी, मेरी तपश्चर्या मेरे काम आएगी. मेरे खयाल में तो मुसलमानों को यह सोचना भी न चाहिए कि उनके पास बंदूक रहे तो वे हिन्दुओं के हमले से बच जाएंगे. बल्कि हिन्दुओं को उनसे यह कहना चाहिए कि हमारे रहते हुए आपको कुछ नुकसान नहीं पहुंच सकता.’

29 अप्रैल, 1947 को भी पटना में शांति समिति की बैठक में सद्भावना कार्यकर्ताओं ने गांधीजी से पूछा- ‘बंदूक की मांग में लोग हमसे मदद चाहते हैं, उन्हें क्या जवाब दें?’

गांधी ने कहा- ‘बंदूक की बात के मैं बिल्कुल मुखालिफ हूं. नोआखाली में भी मुखालिफ था. इसका मतलब तो लड़ना है. पुलिस ठीक रहे, हुकूमत ठीक रहे, यह होना चाहिए. मैं तो यह चाहता हूं कि सब भले और शरीफ लोग लाइसेंस वापस कर दें. ...हुकूमत बंदूक न दे, मैं इसपर अटल हूं. सबके हाथ में बंदूक देना पूरे हिन्दुस्तान को फौजी कौम बनाना है. और यह एक दिन का काम नहीं. अगर अहिंसा से आजादी नहीं रहनेवाली, तो फिर वह आजादी बेकार है.’

3 दिसंबर, 1947 को नई दिल्ली में किसी अन्य संदर्भ में बोलते हुए गांधी ने कहा- ‘तलवार को तो कोई छीन सकता है, हथियार को भी छीन लेगा, हाथ को काट डालेगा. लेकिन आत्मा को तो कोई नहीं छीन सकता. वह तो सनातन सत्य है, आज रहेगा, कल रहेगा, परसों रहेगा. बिना आत्मा के शरीर निकम्मा है.’