पश्चिम बंगाल और ओडिशा के बीच ‘रसगुल्ले की लड़ाई’ अभी खत्म नहीं हुई है. भले रसगुल्ले का जीआई (जियोग्राफिकल इंडीकेशन) टैग का पश्चिम बंगाल को मिल गया हो.

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद मंगलवार की सुबह ट्विटर के जरिए सूचना दी कि रसगुल्ले का जीआई टैग राज्य को मिल गया है. उन्होंने लिखा, ‘हम सबके लिए मिठास भरी ख़बर. हम खुश हैं और हमें फख़्र है कि #बंगाल को रसगुल्ला का जीआई टैग मिल गया है.’ इसके बाद यह माना गया कि रसगुल्ले के मूल की लड़ाई में फैसला पश्चिम बंगाल के पक्ष में हो चुका है. लेकिन यह धारणा सही नहीं है.

जीआई रजिस्ट्रार ऑफिस के सूत्रों के मुताबिक पश्चिम बंगाल ने 2015 में बंगलार रसगुल्ला’ के लिए आवेदन किया था. एक सूत्र के शब्दों में ‘इस बाबत उसने जो दस्तावेज़ और प्रमाण हमें सौंपे हमने उनका अध्ययन किया. इसके बाद ‘बंगलार रसगुल्ला’ के लिए उसे जीआई टैग आवंटित किया है. ओडिशा ने अभी आवेदन नहीं किया है. लेकिन अगर वह आवेदन करता है और प्रमाण देता है तो उसे भी वहां बनाए जाने वाले ‘पहाला रसगुल्ले’ का जीआई टैग दिया जा सकता है.’

यही नहीं. जीआई रजिस्ट्रार ऑफिस के सूत्रों की मानें तो जीआई टैग मिलने का मतलब यह नहीं है कि संबंधित वस्तु की उत्पत्ति उस भौगोलिक क्षेत्र से हुई है. बल्कि किसी वस्तु को किस क्षेत्र में किस खासियत से बनाया जाता है उससे संबंधित है. यानी जीआई टैग काे रसगुल्ले की उत्पत्ति संबंधी विवाद की पृष्ठभूमि में नहीं देखना चाहिए. इसके बाद ख़बर आई है कि ओडिशा भी अपने ‘पहाला रसगुल्ला’ को जीआई टैग दिलाने के लिए आवेदन करने वाला है.

बंगाल और ओडिशा के बीच रसगुल्ले की उत्पत्ति को लेकर 2015 से विवाद चल रहा है. इनमें ओडिशा का दावा है कि रसगुल्ले का पहला अवतार ‘खीर मोहन’ है जिसका प्रसाद पुरी में भगवान जगन्नाथ को लगाया जाता था. बाद में उसी ‘खीर मोहन’ ने रसगुल्ले की शक्ल ले ली. यह आज भी ‘पहाला रसगुल्ले’ के तौर पर प्रचलित है. वहीं बंगाल का तर्क है कि राज्य के विख्यात मिठाई निर्माता नबीन चंद्र दास ने 1868 में पहले-पहल रसगुल्ला बनाया था.