नवंबर के करीब तीन हफ्ते बीतने के बाद देश के अधिकांश हिस्सों में लोगों को ठंडक महसूस होने लगी है. हालांकि, इसके उलट अगले महीने होने वाले गुजरात विधानसभा चुनावों को देखते हुए देश की राजनीतिक फिजा में धीरे-धीरे गर्माहट बढ़ती हुई दिखाई दे रही है.

इस बीच, कांग्रेस ने संसद के शीतकालीन सत्र को बुलाने में हो रही देरी को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधा है. पार्टी का कहना है कि जबसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार का गठन हुआ है, उस वक्त से ही अन्य संवैधानिक संस्थाओं के साथ संसद की गरिमा को भी धूमिल करने की कोशिश की जा रही है. कांग्रेस ने सरकार पर आरोप लगाया है कि गुजरात चुनाव से पहले अर्थव्यवस्था पर परेशान करने वाले सवालों से बचने के लिए संसद का सत्र बुलाने में देरी की जा रही है. गुजरात में नोटबंदी और जीएसटी को लेकर छोटे कारोबारियों के उद्योग-धंधे चौपट होने को लेकर कांग्रेस लगातार सत्ताधारी भाजपा पर निशाना साध रही है. इसके अलावा मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो भाजपा को आशंका है कि विपक्ष पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह के मामले पर भी सरकार को संसद में घेर सकती है.

उधर, बीते गुरुवार को वरिष्ठ भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने गुजरात में केंद्रीय मंत्रियों के घर-घर जाकर चुनाव प्रचार करने पर सफाई देते हुए कहा है, ‘मोदी सरकार के मंत्री केवल ट्वीट नहीं करते बल्कि, जमीन पर भी लोगों के संपर्क में रहते हैं.’शीतकालीन सत्र में देरी के आरोपों पर रविशंकर प्रसाद ने कहा कि इस बारे में संसदीय मामलों की समिति फैसला लेगी और संसदीय कार्य मंत्री अनंत कुमार उसके संपर्क में हैं. बताया जाता है कि फिलहाल गुजरात में आधा दर्जन से अधिक केंद्रीय मंत्री चुनावी अभियान को लेकर अपना-अपना तंबू गाड़ चुके हैं. इसके अलावा मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ गुजरात में 50 से अधिक चुनावी सभाओं को संबोधित करने वाले हैं. वे वहां कुछ रोडशो भी करने वाले हैं.

आम तौर पर शीतकालीन सत्र नवंबर के तीसरे हफ्ते से लेकर क्रिसमस से कुछ दिन पहले तक चलता है. इसकी तारीखों का ऐलान संसदीय मामलों की कैबिनेट समिति सत्र शुरु होने से करीब 15 दिन पहले करती है. बीते साल 16 नवंबर से लेकर 16 दिसंबर तक सत्र बुलाया गया था. इससे पहले 2015 में यह अवधि 26 नवंबर से लेकर 23 दिसंबर तक थी. इसके अलावा सांसदों को प्रश्नकाल में पूछने के लिए अपने सवालों को भी कम से कम 10 दिन पहले दर्ज कराना होता है.

भारत की संसदीय परपंरा में शीतकालीन सत्र के इतिहास पर नजर डालें तो चुनावों को देखते हुए सरकारों द्वारा इसे बुलाने में होने वाली देरी का यह पहला मामला नहीं है. साल 2003 में राजस्थान और दिल्ली में एक दिसंबर को होने वाले चुनावों को देखते हुए सत्र दो दिसंबर से बुलाया गया था. उस वक्त केंद्र में भाजपानीत वाजपेयी सरकार थी.

हालांकि, फिलहाल भाजपा को संसदीय परंपरा की दुहाई देने वाली कांग्रेस भी इस मामले में पाक-साफ नहीं दिखाई देती है. कांग्रेसनीत यूपीए-1 सरकार के वक्त 2008 में भी राजस्थान में चार दिसंबर को मतदान खत्म होने के बाद 10 दिसंबर से सत्र बुलाया गया था. इसके बाद साल 2013 में भी राजस्थान चुनाव के बाद ही पांच दिसंबर से लेकर 18 दिसंबर तक शीतकालीन सत्र बुलाया गया था.

लेकिन इसके अपवाद भी हैं. साल 2002 में वाजपेयी सरकार के वक्त 18 नवंबर से लेकर 15 दिसंबर तक चुनावी प्रक्रिया तय होने के बाद भी संसद 18 नवंबर से 20 दिसंबर तक चली थी. इसके बाद 2007 और 2012 में भी गुजरात चुनाव होने के बाद भी यूपीए सरकार ने संसद का शीतकालीन सत्र बुलाने में देरी नहीं की थी.

इसी साल, संसद के बजट सत्र की अवधि देखें तो इस पर भी उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में होने वाले चुनावों का असर पड़ता हुआ दिखा था. इन राज्यों में फरवरी और मार्च के बीच कई चरणों में चुनाव हुए थे. इस सत्र का पहला हिस्सा 31 जनवरी से शुरू होकर नौ फरवरी तक यानी सिर्फ 10 दिन चला था. इसके बाद इसका दूसरा हिस्सा नौ मार्च से 12 अप्रैल तक चला था. इस बीच चुनाव वाले राज्यों में सबसे अहम माने जाने वाले उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मणिपुर में मतदान हुए थे.

आम तौर पर बजट सत्र को दो हिस्सों में ही बुलाया जाता है. लेकिन इन दो हिस्सों के बीच इतना लंबा अंतराल नहीं होता और सत्र का पहला हिस्सा भी इतना छोटा नहीं होता. साल 2016 के बजट सत्र की तारीखों पर नजर डालें तो बजट सत्र का पहला हिस्सा 23 फरवरी से 16 मार्च तक तक यानी 25 दिन तक चला था. इससे पहले साल 2015 में भी बजट सत्र का पहला हिस्सा 28 दिनों का था. इसके उलट 2017 के बजट सत्र का पहला हिस्सा मात्र 10 दिनों का ही था.

साल 2014 में केंद्र की सत्ता हासिल करने के बाद भाजपानीत केंद्र और राज्य सरकारों पर पूरी ताकत से अपना काम करने के बजाय हमेशा चुनावी मोड में बने रहने का आरोप लगता रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उनके अन्य मंत्री भी चुनावी राज्यों में काफी सक्रिय नजर आते हैं. उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान भी कई केंद्रीय मंत्रियों ने बनारस में अपना-अपना डेरा डाल दिया था. इनमें गृहमंत्री राजनाथ सिंह और वित्त मंत्री अरुण जेटली के साथ-साथ रविशंकर प्रसाद, संतोष गंगवार, जेपी नड्डा और पीयूष गोयल जैसे केंद्रीय मंत्री वहां के घर-घर दस्तक दे रहे थे.

साल 2015 में बिहार चुनाव के दौरान भी खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करीब महीने भर बिहार में ही डेरा डाल दिया था. इस दौरान भाजपा के स्टार प्रचारक के रूप में नरेंद्र मोदी ने ताबड़तोड़ कुल 31 रैलियां की थीं. बिहार चुनाव के दौरान अकेले भाजपा के नेताओं ने ही 850 रैलियां कर डाली थीं. इनमें सात केंद्रीय मंत्री, झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास और पार्टी के कुछ सांसद शामिल थे. मई, 2014 के बाद देश के अलग-अलग राज्यों में हुए चुनाव को देखें तो अब तक कुल मिलाकर इसी तरह का नजारा दिखने को मिला है.

बीते दिनों गुजरात में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सार्वजनिक सभा को संबोधित कर चुके हैं. इसके अलावा उत्तर प्रदेश सरकार के मुखिया आदित्यनाथ भी रोडशो करते हुए दिखाई दिए थे. इसके अलावा यह भी देखा गया है कि कमजोर आधार वाले राज्यों में अपनी जमीन तैयार करने के लिए भी भाजपा तरह-तरह की यात्राओं में अपने मुख्यमंत्रियों और केंद्रीय मंत्रियों को इस्तेमाल करती ही रहती है. बीते महीने केरल की जनरक्षा यात्रा में आदित्यनाथ के अलावा कई वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री भी नजर आए थे.

अगर केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात करें तो द इकनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद से 23 अक्टूबर, 2017 तक उन्होंने कुल 775 बार भाषण दिए हैं. इनमें से 609 भाषण उन्होंने देश में दिए. सरकारी आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई इस रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने हर महीने औसतन 19 भाषण दिए. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तुलना में ये आठ भाषण प्रति माह अधिक है. बीती 10 अक्टूबर को अमित शाह ने अमेठी की एक सार्वजनिक सभा में कहा भी था कि ‘हमने ऐसा प्रधानमंत्री दिया है जो बोलता है.’

भाजपा संवैधानिक पदों पर बैठे अपने नेताओं के अलावा सहयोगी पार्टी के नेताओं को भी चुनावी मकसद के लिए इस्तेमाल करती नजर आती है. डीएनए की रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक गठबंधन में शामिल लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) प्रमुख और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान का नाम भी गुजरात चुनाव के स्टार प्रचारकों की सूची में शामिल किया गया है. बीते हफ्ते वे अहमदाबाद में जाकर भाजपा के लिए चुनाव प्रचार कर भी चुके हैं. माना जा रहा है कि भाजपा उन्हें चुनावी पिच पर उतारकर उना आंदोलन से उपजी दलितों की नाराजगी को दूर करना चाहती है.

संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए. इससे पहले इस साल मानसूत्र सत्र की समाप्ति 11 अगस्त को हुई थी. यानी सरकार के पास अगला सत्र बुलाने के लिए 11 फरवरी, 2018 तक का वक्त है. यानी कि अगर भाजपा शीतकालीन सत्र बुलाने में देरी करती है या इसलिए बुलाती ही नहीं है कि इस साल से आम बजट को एक फरवरी को पेश किया जाने लगा है इसलिए बजट सत्र को जल्दी बुलाया जाता है, तो इससे देश में किसी तरह का संवैधानिक संकट तो खड़ा होता नहीं दिखाई देता. हालांकि इससे संसदीय कामकाज को लेकर सरकार की नीयत पर सवाल जरूर उठते दिखाई देते हैं.

साथ ही, यह नरेंद्र मोदी द्वारा 2014 में जीत के बाद संसद के केंद्रीय कक्ष में कही गई बातों के उलट भी दिखाई देता है. 20 मई, 2014 को उन्होंने भावुक आवाज में संसद को लोकतंत्र का मंदिर बताते हुए कहा था, ‘हम सब लोकतंत्र के इस मंदिर में बैठकर पूरी पवित्रता के साथ सवा सौ करोड़ देशवासियों की आशाओं और आकांक्षाओं को हममें समेटकर बैठे हैं.’ उनका आगे कहना था कि इसे पूरा करने के उन्हें (भाजपा सांसदों को) समर्पण करना होगा. इससे पहले वे संसद की सीढ़ियों पर घुटने टेककर संसद भवन में दाखिल हुए थे. इसके साढ़े तीन साल बाद भाजपा की चुनावी जीत की लालसा के आगे संसदीय परंपरा अब कुछ घुटने टेकती हुई सी नजर आ रही है.