नोटबंदी के एक साल बाद भी मोदी सरकार के इस फैसले पर बहस जारी है. सोमवार को खबर आई कि नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री रिचर्ड थेलर ने इसे लागू करने के सरकार के तरीक़े को खामियों से भरा बताया है. उनके मुताबिक नोटबंदी एक अच्छा विचार है, लेकिन जिस तरीके से सरकार इसे अमल में लाई उसमें कई खामियां थीं. रिचर्ड थेलर के मुताबिक 2000 रु का नोट लाने से इस पूरी कवायद का मकसद ही अस्पष्ट हो जाता है.

हालांकि सरकार इस तरह की बातों को सिरे से खारिज करती रही है. नोटबंदी की वर्षगांठ के मौक़े पर केंद्र सरकार ने अपने इस ‘ऐतिहासिक और बहुआयामी’ फ़ैसले के कई फ़ायदे गिनाए थे. आठ नवंबर, 2017 के दिन कई अख़बारों में फ़ुल पेज का विज्ञापन छपा जिसमें नोटबंदी से देश को हुए बड़े फ़ायदों के बारे में बताया गया था. सरकार ने दावा किया कि नोटबंदी से आतंकनिरोधी प्रयासों से लेकर नौकरियों के सृजन तक हर चीज़ पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा. 500 और एक हज़ार के नोटों को रद्द करने के फ़ैसले को आतंकवाद और नक्सलवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष में एक निर्णायक क़दम बताया गया. यह भी कहा गया कि नोटबंदी की वजह से कश्मीर में पत्थरबाज़ी की घटनाओं में 75 प्रतिशत तक की कमी आई. नक्सलवाद की वजह से होने वाली घटनाएं भी 20 प्रतिशत तक कम हुईं यह दावा भी किया गया.

सरकार ने यह भी कहा कि नोटबंदी ने देश के वित्तीय तंत्र और अन्य क्षेत्रों की बड़े स्तर पर सफ़ाई करने का काम किया. शेल कंपनियों पर सर्जिकल स्ट्राइक (कार्रवाई), 2.24 लाख कंपनियों को बंद करना, 17 हज़ार करोड़ रुपये का लेन-देन कर रहीं 35 हज़ार कंपनियों के 58 हज़ार बैंक खातों पर कार्रवाई आदि नोटबंदी से निकले बड़े परिणाम बताए गए. सरकार ने विज्ञापन के नीचे एक क्यूआर कोड भी दिया था जिसे स्कैन पर एक यूट्यूब वीडियो खुलता है. यह वीडियो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के यूट्यूब अकाउंट से अपलोड किया गया था. इसमें नोटबंदी के ‘अनगिनत’ फ़ायदे गिनाए गए थे.

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लेकिन इन तमाम फ़ायदों में देह व्यापार और मानव तस्करी में ‘भारी कमी’ का दावा शामिल नहीं था. यह दावा देश के क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने नोटबंदी की वर्षगांठ पर किया था. आठ नवंबर को भोपाल में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा, ‘महिलाओं और लड़कियों की तस्करी के मामलों में भारी कमी आई है. इसके लिए बड़े पैमाने पर नगदी नेपाल और बांग्लादेश चली जाती थी.’ हालांकि इससे जुड़े आंकड़ों के बारे में पूछे जाने पर केंद्रीय कानून मंत्री ने कहा कि उन्हें यह जानकारी गृह मंत्रालय से मिली है.

क़ानून मंत्री ने छोटा दावा नहीं किया. मानव तस्करी भारत की गंभीर समस्याओं में से एक है. इसके ज़रिए न केवल लड़कियों को देह व्यापार में धकेला जाता है बल्कि बाल मज़दूरी और भीख मंगवाने के लिए भी बच्चों की ख़रीद-फ़रोख़्त की जाती है. इन सभी कामों में पैसे का लेन-देन होता है. अगर रविशंकर प्रसाद के बयान पर यक़ीन करें तो नोटबंदी के चलते केवल देह व्यापार ही कम नहीं हुआ होगा बल्कि मानव तस्करी के दूसरों कारणों पर भी इसका ‘भारी’ प्रभाव पड़ा होगा. उन सब में भी कमी आई होगी.

हालांकि क़ानून मंत्री ने जो दावा किया वह नया नहीं था. नोटबंदी के दौरान ही ऐसी ख़बरें आई थीं जिनमें कहा गया था कि इससे देह व्यापार और मानव तस्करी में कमी आई है. इन ख़बरों पर कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग़ैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) ने मिली जुली प्रतिक्रियाएं दी थीं. कुछ का कहना था कि नोटबंदी के बाद देह व्यापार और मानव तस्करी में कमी आई है. लेकिन कइयों ने इससे इनकार किया. उनका कहना था कि नोटबंदी के दौरान लेन-देन के दूसरे तरीक़ों का पूरी तरह इस्तेमाल होने तक ही इस क्षेत्र के अपराधों पर अस्थायी रोक लगी थी. इस संबंध में बच्चों को बाल मज़दूरी से बचाने के काम में वर्षों से लगे नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने कहा था कि शुरू में उन्होंने नोटबंदी से मानव तस्करी में कमी होने की उम्मीद की थी लेकिन अभी तक (जनवरी 2017) कोई महत्वपूर्ण प्रयास देखने को नहीं मिला है.

कुछ का कहना था कि नोटबंदी की वजह से ग़रीब तबक़े की और लड़कियों को देह व्यापार में आना पड़ा. साथ ही पहले से मौजूद महिलाओं को उधार या मुफ़्त में भी काम करने पर मजबूर होना पड़ा. पैसे की कमी वजह से ग्राहक सेक्स वर्कर को पूरी पेमेंट नहीं कर पा रहे थे, इसलिए अपनी सामान्य ज़रूरतों को पूरा करने के लिए महिलाओं को असामान्य रूप से ज़्यादा पुरुषों के साथ सोना पड़ा. यहां यौनकर्मियों के लिए काम करने वाली वकील ललिता की बात उल्लेखनीय है. मई, 2017 की एक रिपोर्ट में वे कहती हैं, ‘अगर एक पुरुष सेक्स की इच्छा रखता है तो वह पैसे की परवाह किए बिना आएगा. साफ़ है कि यह सच नहीं है कि नोटबंदी की वजह से मानव तस्करी कम हुई है. पुरुष तो अभी भी आ रहे हैं.’

कुल मिलाकर संस्थाओं और कार्यकर्ताओं ने माना कि नोटबंदी से मानव तस्करी और देह व्यापार में केवल अस्थायी कमी आई. यह एक संगठित व्यवस्था है जिसमें स्थिति बदलते ही अपराधी अपने तरीक़े बदल लेते हैं. और जैसे ही कैश की किल्लत ख़त्म हुई वैसे ही पहले जैसी स्थिति आ गई. भारत में मानव तस्करी को लेकर अमेरिका के यूएस डिपार्टमेंट ऑफ़ स्टेट (विदेश मंत्रालय) की एक रिपोर्ट इसकी तस्दीक़ करती है. जनवरी 2017 से जून 2017 के लिए तैयार की गई यह रिपोर्ट बताती है कि नोटबंदी का मानव तस्करी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है. इसमें वहीं निरंतरता बनी हुई है जो दिसंबर 2016 तक थी.

2016 की रिपोर्ट.
2016 की रिपोर्ट.
2017 की रिपोर्ट.
2017 की रिपोर्ट.

वेनेसा बूशा मानव तस्करी पर काम करने वाली एक अंतरराष्ट्रीय कार्यकर्ता हैं. इसी साल अक्टूबर में उन्होंने कहा था कि दुनिया में मानव तस्करी के क़रीब चार करोड़ तीस लाख पीड़ित लोग हैं जिनमें से एक करोड़ 70 लाख अकेले भारत में हैं. एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में कुल दो करोड़ सेक्स वर्कर हैं. इनमें से एक करोड़ साठ लाख महिलाएं और लड़कियां ऐसी हैं जिन्हें मानव तस्करी के तहत इस काम में डाला गया है. अगर नोटबंदी से इस धंधे में भारी कमी आई है तो यह सवाल भी उठता है कि सरकार ने अपनी उपलब्धियों में इसे कैसे शामिल नहीं किया. यह कोई संवेदनशील ख़ुफ़िया जानकारी तो होती नहीं. बल्कि यह तो एक ऐसी उपलब्धि है जिसे कोई भी सरकार जोर-शोर से प्रचारित करेगी.

कानून मंत्री के दावे का स्रोत क्या है?

रविशंकर प्रसाद ने मानव तस्करी और देह व्यापार कम होने के बयान के लिए गृह मंत्रालय से मिली जानकारी का हवाला दिया था. गृह मंत्रालय नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी से मिली जानकारी के आधार पर ही अपराध से जुड़ीं जानकारियां साझा करता है. देश में अपराध से जुड़े आंकड़ों के बारे में जानने के लिए मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट पर एनसीआरबी का लिंक दिया हुआ है. क्लिक करने पर एनसीआरबी की वेबसाइट खुलती है.

लेकिन एनसीआरबी की वेबसाइट पर केवल साल 2015 तक के अपराध संबंधी आंकड़े मिलते हैं. इनमें भी अब तक केवल दुर्घटनाओं और आत्महत्याओं के चलते हुईं मौतों, आपराधिक मामलों और जेल सांख्यिकी से संबंधित फ़ाइलें ही उपलब्ध हैं. मानव तस्करी को लेकर अलग से सांख्यिकी बनाने के लिए एनसीआरबी अभी राज्यों से आंकड़े इकट्ठा कर रहा है. फ़िलहाल मानव तस्करी से जुड़े मामलों को आपराधिक सांख्यिकी में ही रखा गया है, वह भी दिसंबर 2015 तक की. 2016 और 2017 की मानव तस्करी से संबंधित सांख्यिकी कब तक उपलब्ध होगी, इस संबंध में एनसीआरबी से संपर्क किया गया था जिसका अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है. ऐसे में रविशंकर प्रसाद का दावा एक बड़ा सवाल छोड़ जाता है.