तारीखों का खेल भी निराला है, जो तारीख ‘एन इनसिग्निफिकेंट मैन’ की रिलीज के लिए तय की गई थी, उसी तारीख को सुप्रीम कोर्ट फिल्म के खिलाफ एक याचिका की सुनवाई कर रही थी. यह याचिका फिल्म की रिलीज को रोकने के लिए लगाई गई थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देते हुए ठुकरा दिया.

यह तारीख का पहला कारनामा हुआ. दूसरा, तारीख के उस मायने से जुड़ता है जिसे हम इतिहास के नाम से जानते हैं क्योंकि फिल्म भी एक ऐतिहासिक आंदोलन से निकले एक अलहदा लीडर की कहानी दिखाती है. ‘एन इनसिग्निफिकेंट मैन’ को देखने के बाद आपको शिद्दत से इस बात का एहसास होता है कि अरविंद केजरीवाल का नाम भारतीय राजनीति के इतिहास में ब्लैक एंड बोल्ड लेटर्स में लिखा जाना तय था, और है. लेकिन अब फॉन्ट साइज में कुछ फर्क आ जाएगा.

बीते कुछ समय से जिस ‘पोस्ट-ट्रुथ’ युग की चर्चा गाहे-बगाहे सुनने को मिलती रहती है, उसमें रहते हुए तो हमें यह फिल्म देखने की सख्त जरूरत है. पोस्ट-ट्रुथ यानी वे परिस्थितियां जहां तथ्यों-तर्कों की बजाय भावनाओं (कई बार आहत भावनाओं) में बहकर निर्णय लिया जाता है. और सख्त जरूरत इसलिए कि हम अच्छे से याद कर सकें कि आज से कुछ ही साल पहले हम किन मुद्दों के लिए आंदोलन या विरोध प्रदर्शन करते थे. यह लाइन पढ़ते हुए, आप दाईं तरफ गर्दन मोड़कर पद्मावती पर जारी आंदोलन से लेकर मॉब लिंचिंग तक तमाम घटनाओं को याद कर सकते हैं.

चलिए, इधर-उधर की छोड़कर अब सिर्फ फिल्म की बात करते हैं. तो फिल्म उस मोड़ से शुरू होती है जहां पर अरविंद केजरीवाल भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए राजनीति में आने का फैसला करते हैं. फिल्म का पहला हिस्सा केजरीवाल के विजन, स्वराज लागू करने की व्यावहारिक समस्याओं और चुनाव की तैयारियों को दिखाता है. इसमें योगेंद्र यादव जैसे समझदार और संतोष कोली जैसे जमीनी लोगों ने किस तरह आम आदमी पार्टी को खड़ा किया, इसकी भी झलकियां हैं. कोली के एक्सीडेंट और मौत का सीक्वेंस फिल्म के हिला देने वाले दृश्यों में से एक है. इसे देखते हुए आपको लगता है कि अच्छा होता अगर यह कोई काल्पनिक कथा ही होती.

दूसरा हिस्सा राजनीतिक खींचतान, चुनाव प्रचार और आपसी मतभेदों की शुरूआत दिखाता है. चुनाव प्रचार और उस बीच चलने वाली बयानबाजियों वाले सीक्वेंस की तुलना आप बाहुबली (द बिगनिंग) के उस सीक्वेंस से कर सकते हैं, जब युद्ध के पहले भल्लाल देव सारे अच्छे अस्त्र-शस्त्र अपने कब्जे में ले लेता है लेकिन फिर भी बाहुबली अपनी युक्तियों से उस पर भारी पड़ता है. यहां पर आप हमेशा तुर्रे में रहने वाली दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के मिजाज की झलक देखते हैं. उनका सुर सिर्फ उस आखिरी लाइन में बदलता है जब वे हारने के बाद जनादेश को स्वीकार करने की बात कहती हैं. इन सबके बीच योगेंद्र यादव का लगातार यह कहते रहना कि ‘अब वह वक्त आ गया है जब हमें कुछ भी सोच-समझकर कहना चाहिए,’ आपका ध्यान खींचता है लेकिन यह समझा पाने में नाकामयाब होता है कि केजरीवाल और यादव के बीच के तार कैसे और कहां से खिंच रहे हैं.

निर्देशक जोड़ी खुशबू रांका और विनय शुक्ला ने चार सौ घंटों की फुटेज से करीब 96 मिनट की यह फिल्म बनाई है. किसी स्क्रिप्टेड फिल्म की तरह इसमें हंसाने-रुलाने-चौंकाने वाले संवाद हैं, हिला देने वाले ट्विस्ट हैं तो एक ओर टिककर देखे जाने वाला क्लाइमेक्स भी है. फिल्म की इकलौती और सबसे बड़ी कमी सिर्फ यही है कि यह किसी भी वाकये को एक्सप्लेन नहीं कर पाती है, जिसकी उम्मीद इससे सबसे ज्यादा थी. बावजूद इसके यह फिल्म आने वाली पीढ़ियों के लिए, खासतौर पर राजनीति, मीडिया और सिनेमा के छात्रों के लिए एक जरूरी दस्तावेज जैसी होगी. यह हिंदुस्तान में अपनी तरह की बनी इकलौती फिल्म है, हम इस बात की उम्मीद करते हैं कि यह आखिरी न हो.

चलते-चलते, कई जरूरी-गैरजरूरी बातों के साथ फिल्म बदलाव का इंतजार कर रहे लोगों की उम्मीदों का पुलिंदा भी है, वह बदलाव जो केजरीवाल लाने वाले थे, और वह बदलाव जो उनके बाद अब शायद ही कोई और ला सके. फिल्म जो बात नहीं कहती वह यह है कि अरविंद केजरीवाल एक असाधारण आम आदमी थे और अब वे एक साधारण आम नेता बन चुके हैं.