‘कवि कुंवर नारायण केवल मनुष्य बनना चाहता है. यही उसका रोग है, यही उसकी समस्या है.’ कोई तिरपन साल पहले ज्ञानात्मक संवेदना के कवि मुक्तिबोध ने तब के युवा कवि के काव्य-संग्रह ‘परिवेश : हम तुम’ पर लिखते हुए कुंवर नारायण को ‘अंतरात्मा की पीड़ित विवेक चेतना’ का कवि कहा था.

मुक्तिबोध को केवल मनुष्य बने रहने की जिद के चलते जो उदास भवितव्य (नियति, प्रारब्ध) झेलना होता है उसका पूरा अहसास था. लेकिन मनुष्य बने रहने का अर्थ क्या है? अपनी इसी समीक्षा में मुक्तिबोध लिखते हैं, ‘एक ओर जबकि कवि यह कहता है –

कि या तो अ ब स की तरह जीना है

या सुकरात की तरह ज़हर पीना है!

तब यह कहकर वह आज की इस अत्यंत गहन मानव-समस्या पर दृष्टिपात कर रहा है. किन्तु (वह) शायद यह भी जानता होगा कि इन ध्रुवों के बीच एक हालत है - ज़हर पीने के पहले सुकरात की तरह जीना.’

अपने युवा कवि की शहीदाना मुद्रा को देख वरिष्ठ कवि का उसे सचेत करना ठीक ही था. ज़हर पीने के पहले का जीवन जीना ज़हर पीने से कहीं मुश्किल है. अपनी समीक्षा का अंत मुक्तिबोध कवि से अपनी इस उम्मीद के साथ करते हैं, ‘चूंकि, स्वभावतः कवि अपने सारे संवेदनशील मनुष्यत्व के साथ जीना चाहता है, अपने क्षणों को सार्थक करना चाहता है, इसलिए उसे जो निधि प्राप्त होती है वह है पीड़ा. और, चूंकि अभी भी उसे बहुत से फैसले करके, उन फैसलों द्वारा बताए रास्तों पर बढ़ना और बढ़ते रहना है, इसीलिए उसे अपनी वर्तमान स्थिति ज्यादा सही या उचित नहीं मालूम होती. मतलब यह कि भीतर भी एक गहरी अनबन है. संभवतः ऐसी ही बातों को ध्यान में रखकर वह कहता है –

आज नहीं,

अपने वर्षों बाद शायद पा सकूं

वह विशेष संवेदना जिसमें उचित हूं.

मुक्तिबोध यह लिखने के बाद यह देखने को जीवित न रहे कि उनके कवि ने कैसा जीवन जिया. लेकिन उनकी शताब्दी वर्ष में अगर अवसर मिलता तो संभवतः संसार से विदा लेते समय कुंवर नारायण उन्हें कहते कि मैंने भाषा के जरिए जीवन को देखा और जिया लेकिन मैंने वह भाषा बनाने में पसीना भी बहाया जो उस विशेष संवेदना की वाहक होगी जिसमें मनुष्य अपना औचित्य देख पाएगा.

यह आश्चर्य नहीं कि ‘आत्मजयी’ और ‘वाजश्रवा के बहाने’ के बाद अपनी काव्य यात्रा के अंतिम पड़ाव में उनका ध्यान भाषा और उसके 1700 साल पहले हुए साधक कुमारजीव की ओर गया.

‘कुमारजीव’ एक अर्थ में ज्ञान का जीवन जीने की ही गाथा है. वह जीवन कैसे जिया जाएगा?

एक शरीर की व्यवस्था में

मेरा जन्म हुआ

यह मेरी बाध्यता थी

मैं उसकी मांगें स्वीकार करता हूं

और अपने शीश को बचाता हूं

जिसे आजीवन अज्ञान के विरुद्ध लड़ते रहना है.’

शीश को बचाने का अर्थ अन्याय से समझौता कर लेना नहीं. जीवन जिया गया इस तरह:

‘मेरी आकांक्षाओं में

न थी विश्वविजय, न टकराहटें

गले में ‘बिकाऊ है’ की तख्ती लटका कर

बाज़ारों में घूमना भी नहीं था

मेरी प्रतिज्ञाओं में,

मैंने सुरक्षित रखा

एक साधारण मनुष्य की तरह

जीने के अपने अधिकार को,

बिल्कुल अपनी तरह परिभाषित किया

दुनिया और सुख के अर्थ को

और उसे जिया सिर ऊंचा रखकर.

कुंवरनारायण कुमारजीव की तरह ही किताबों के बीच जीने वाले व्यक्ति थे. सार्वजनिकता उन्हें कुछ संकुचित ही करती थी. प्रचलित अर्थों में वे राजनीतिक कवि भी शायद न कहे जाएं. लेकिन मनुष्यता के अधिकार की वकालत और उसके भी पहले उसे परिभाषित करना अगर राजनीतिक कर्म है, तो वे राजनीतिक थे. जब ज़रूरी हुआ, वे सड़क पर भी आए. 2002 में गुजरात में मुसलमान विरोधी हिंसा के बाद दिल्ली में लेखकों, कलाकारों के प्रतिवाद का आह्वान करने वालों में वे एक थे.

सारे कवि जीवन के ही कवि होते हैं. लेकिन सबमें मनुष्य और प्रकृति की नियति का बोध समान रूप से गहरा नहीं होता. कहा जा सकता है कि कुंवरनारायण मनुष्य ही नहीं मनुष्यता की नियति के बोध के कवि थे. या शायद यह कहना अधिक मुनासिब होगा कि वे जीवन की समझ के कवि थे. समझ, जो स्वर में स्थिरता भरती है.

कवि या लेखक के दायित्व को समझ लेने के बाद कोई उद्विग्नता नहीं रह जाती. वह दायित्व है सावधान भाषा का सृजन या निर्माण: ‘...अगर मैं अपने शब्दों का चुनाव अत्यंत सावधानी से नहीं करूंगा तो मेरी कोई भी बात या तो दूसरों तक नहीं पहुंचेगी, या गलत पहुंचेगी. कविता भी सबसे पहले इसी तरह की एक कोशिश है सही और सच्चे शब्दों द्वारा आदमी और आदमी के बीच, या आदमियों के साथ, सही और सच्चे रिश्तों की तलाश. उस माध्यम, यानी भाषा के बारे में भी सोचना और सोचते रहना - कविता में भी और कविता के बाहर भी; ज़रूरी है जिसके द्वारा हम अपनी बात सही-सही दूसरों तक पहुंचाना चाहते हैं.’

प्रत्येक कवि का स्वभाव अलग होता है. मुक्तिबोध की भाषा विवेक की उद्विग्नता और आवेग का अनुभव है तो कुंवर नारायण समझ की स्थिरता प्राप्त करना चाहते हैं. इसलिए वे अपनी भाषा को यथासंभव भावुकता से मुक्त करना चाहते हैं और शुष्क बनाना चाहते हैं.

यह एक भाषा इतनी सख्त हो कि यथार्थ का ठीक-ठीक वर्णन ही न करे बल्कि उसकी प्रमाणिक गवाह भी हो: कविता वक्तव्य नहीं गवाह है.

कभी हमारे सामने

कभी हमसे पहले

कभी हमारे बाद

इस भाषा को इसका यकीन है कि सचाई को जाहिर होने से रोका नहीं जा सकता:

कोई चाहे भी तो रोक नहीं सकता

भाषा में उसका बयान जिसका पूरा मतलब है सचाई

जिसकी पूरी कोशिश है बेहतर इंसान

उसे कोई हड़बड़ी नहीं

कि वह इश्तहारों की तरह चिपके

जुलूसों की तरह निकले

नारों की तरह लगे

और चुनावों की तरह जीते

वह आदमी की भाषा में

कहीं किसी तरह ज़िंदा रहे, बस

‘किसी तरह’ का अर्थ किसी भी तरह जी लेना नहीं है. जीवन अर्जित किया जाना है, गढ़ा जाना है. इसके पहले कि आप दुनिया को बदलने की बात करें, पूछा यह जाएगा कि इसकी अर्हता आपने हासिल की है या नहीं:

उसे एक पिचका गुब्बारा देता

जिस पर दुनिया का नक्शा बना होता

और कहता –-

इसमें अपनी सांसें भरो,

इसे फुलाकर

अपने से करोड़ों गुना बड़ा कर लो.

और फिर अनुभव करो़

कि तुम उतना ही उसके अंदर हो

जितना उसके बाहर

धीरे-धीरे एक असह्य दबाव में

बदलती जाएगी

तुम्हारे प्रयत्नों की भूमिका,

किसी अन्य यथार्थ में प्रवेश कर जाने को

बेचैन हो उठेंगी तुम्हारी चिंताएं.

इस कोशिश में नष्ट हुआ जा सकता है या किसी विरल ऊंचाई को भी छुआ जा सकता है. लेकिन इस कोशिश के बिना या इस निवेश के बिना जिया जाने वाला जीवन मनुष्य का नहीं, यह कुंवरनारायण को पता है.

नब्बे की आयु के बाद भी जीवन की आकांक्षा का अंत नहीं होता. सो, किसी भी क्षण यह नहीं कहा जा सकता कि जीवन पूरा जिया जा चुका था. यह ज़रूर कह सकते हैं हम, उनकी कृतियों को देखते हुए कि इन सालों में जीवन रचने के काम में कोई आलस्य नहीं किया कुंवरनारायण ने, तात्कालिकता से घबरा कर या उसके प्रलोभन के कारण अपना मोर्चा छोड़ा नहीं जो कविता का ही था.